4.1.वन्दना - (Vandana) - Class 9 - संस्कृत-खंड - Rajeev Prakashan
- May 5
- 3 min read
Updated: May 6

पाठ का प्रकार: संस्कृत पद्य विषय: ईश्वर की स्तुति और प्रार्थना
Quick Reference Facts
मंत्र/श्लोक | मुख्य भाव |
प्रथम श्लोक | ओज, बल, वीर्य और तेज धारण करने की प्रार्थना |
द्वितीय श्लोक | असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने की प्रार्थना |
तृतीय श्लोक | सभी ओर से अभय (निडरता) और कल्याण की कामना |
चतुर्थ मंत्र | ब्रह्म को साक्षात् सत्य मानकर रक्षा की प्रार्थना |
पंचम श्लोक | सत्यस्वरूप परमात्मा की शरण में जाने की स्तुति |
1. मंत्रों का ससन्दर्भ हिन्दी अनुवाद (Translation)
श्लोक 1: "तेजोऽसि तेजो मयि धेहि... ओजो मयि धेहि।।"
सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक के 'संस्कृत-खंड' के 'वन्दना' नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद: (हे ईश्वर!) आप तेज स्वरूप हैं, मुझमें तेज धारण कराओ। आप पराक्रम स्वरूप हैं, मुझमें पराक्रम धारण कराओ। आप बल स्वरूप हैं, मुझमें बल धारण कराओ। आप ओज (प्राणशक्ति) स्वरूप हैं, मुझमें ओज धारण कराओ।
श्लोक 2: "असतो मा सद् गमय... मृत्योर् मामृतं गमय।।"
सन्दर्भ: पूर्ववत्।
अनुवाद: मुझे असत्य (बुरे कार्यों) से सत्य (अच्छे कार्यों) की ओर ले चलो। मुझे अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
श्लोक 3: "यतो यतः समीहसे... अभयं नः पशुभ्यः।।"
सन्दर्भ: पूर्ववत्।
अनुवाद: (हे देव!) आप जिस-जिस से चाहते हैं, उस-उस से हमें निडर (भयरहित) कर दीजिए। हमारी प्रजा का कल्याण कीजिए और हमारे पशुओं को अभय प्रदान कीजिए।
श्लोक 5: "सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं... त्वां शरणं प्रपन्नाः।।"
सन्दर्भ: पूर्ववत्।
अनुवाद: सत्य का व्रत धारण करने वाले, सत्य में तत्पर रहने वाले, तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) में सत्य रहने वाले, सत्य के उत्पत्ति स्थान, सत्य में ही स्थित रहने वाले, सत्य के भी सत्य और ऋत (निश्चित नियम) व सत्य रूप नेत्र वाले, हे सत्यस्वरूप परमात्मा! हम आपकी शरण में प्राप्त हुए हैं।
2. महत्वपूर्ण शब्दार्थ (Glossary)
धेहि: धारण कराओ।
मयि: मुझमें।
तमसः: अंधकार या अज्ञान से।
अमृतं: अमरत्व।
समीहसे: चाहते हो या इच्छा करते हो।
शन्नः: (शम् + नः) हमारा कल्याण।
ऋतं: यथार्थ या नैतिक व्यवस्था।
प्रपन्नाः: प्राप्त हुए हैं (शरण में)।
3. संस्कृत में प्रश्नोत्तर (Questions in Sanskrit)
प्रश्न (क): तेजविषये भक्तस्य का इच्छा अस्ति? (तेज के विषय में भक्त की क्या इच्छा है?) उत्तर: भक्तस्य इच्छा अस्ति यत् ईश्वरः तस्मिन् तेजः धेहि (धारण कराओ)।
प्रश्न (ख): भक्तः कुत्र गन्तुं वाच्छति? (भक्त कहाँ जाना चाहता है?) उत्तर: भक्तः असतः सद् प्रति, तमसः ज्योतिः प्रति, मृत्योः च अमृतं प्रति गन्तुं वाच्छति।
प्रश्न (ग): भक्तः ईश्वरं किं याचते? (भक्त ईश्वर से क्या माँगता है?) उत्तर: भक्तः ईश्वरं अभयं, कल्याणं, तेजः, वीर्यं, बलं, ओजः च याचते।
प्रश्न (ङ): ईश्वरस्य के नेत्रे स्तः? (ईश्वर के कौन से दो नेत्र हैं?) उत्तर: ईश्वरस्य ऋत-सत्यौ (ऋत और सत्य) नेत्रे स्तः।
4. व्याकरण-बोध (Grammar)
सन्धि-विच्छेद:
तेजोऽसि: तेजः + असि (पूर्वरूप/विसर्ग सन्धि)
मामृतम्: मा + अमृतम् (दीर्घ सन्धि)
ज्योतिर्गमय: ज्योतिः + गमय (विसर्ग सन्धि)
सत्यात्मकम्: सत्य + आत्मकम् (दीर्घ सन्धि)
विभक्ति एवं वचन:
पशुभ्यः: चतुर्थी/पंचमी विभक्ति, बहुवचन।
ब्रह्मणे: चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
सत्ये: सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
त्वाम्: द्वितीया विभक्ति, एकवचन।
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