3.4. वीरः वीरेण पूज्यते - Veer: Veeren Pujyate - Class 10 - पद्य-खंड - Rajeev Prakashan
- May 16
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Updated: 5 days ago

पाठ का प्रकार: संस्कृत खंड (एकांकी / नाटक)
पाठ का नाम: वीरः वीरेण पूज्यते (वीर के द्वारा वीर पूजा जाता है)
विषय: भारतवीर पुरुराज और यवनराज सिकंदर का ऐतिहासिक संवाद।
पात्र: अलक्षेन्द्र (सिकंदर), पुरुराज (भारतीय राजा), आम्भीक (तक्षशिला का राजा/देशद्रोही), यवन सेनापति।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य (Quick Exam Facts)
विषय | विवरण |
मुख्य प्रसंग | बन्दी होने पर भी पुरुराज द्वारा सिकंदर के सामने अपनी निर्भीकता और राष्ट्रप्रेम का परिचय देना। |
वीरता की परिभाषा | बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः । उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता ।। |
सिकंदर का प्रस्ताव | सिकंदर ने मित्रता की सन्धि का प्रस्ताव रखा था, जिसे पुरुराज ने ठुकरा दिया। |
भारत की परिभाषा | उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।। |
एकांकी का अंत | पुरुराज की निर्भीकता से प्रभावित होकर सिकंदर उन्हें मुक्त कर देता है और मित्र बना लेता है। |
1. पाठ परिचय (Lesson Introduction)
स्थान: सिकंदर का सैन्य शिविर, जहाँ सिकंदर और आम्भीक बैठे हैं। सेनापति बन्दी पुरुराज को लेकर प्रवेश करता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: यह पाठ सिकंदर के आक्रमण के समय राजा पुरुराज के अदम्य साहस और भारत की राष्ट्रीय एकता की भावना को रेखांकित करता है।
राष्ट्रप्रेम की भावना: पुरुराज सिकंदर को स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि भले ही भारत में कई राज्य और शासक अलग-अलग हों, लेकिन आंतरिक रूप से भारत एक अखंड राष्ट्र है।
2. पाठ का सारांश (Bilingual Summary)
हिन्दी:
यवनराज सिकंदर के शिविर में बन्दी रूप में लाए जाने पर भी राजा पुरुराज निर्भीक रहते हैं। वे सिकंदर को याद दिलाते हैं कि "सिंह तो सिंह ही है, चाहे वह वन में हो या पिंजरे में।" सिकंदर जब उनकी मैत्री सन्धि को अस्वीकार करने का कारण पूछता है, तो पुरुराज कहते हैं कि अपने राज्य की रक्षा और राष्ट्रद्रोह से मुक्ति ही उनका लक्ष्य था। वे अखंड भारत का संदेश देते हुए गीता का उपदेश सुनाते हैं। अंततः पुरुराज के वीर भाव को देखकर सिकंदर नतमस्तक हो जाता है, उनके बन्धन खोल देता है और उन्हें अपना सच्चा मित्र स्वीकार करता है।
English:
Even when brought as a captive to the camp of the Greek King Alexander (Alakshendra), King Pururaj remains completely fearless. He reminds Alexander that "A lion is a lion, whether in the forest or in a cage." When Alexander asks why he rejected the peace treaty, Pururaj responds that defending his kingdom and avoiding treason against his nation was his priority. He emphasizes the unity of India and quotes the essence of the Gita. Ultimately, moved by his heroic spirit, Alexander releases him and embraces him as a true friend.
3. केंद्रीय भाव / मूल संदेश (Central Idea / Theme)
इस पाठ का मूल संदेश 'वीरता और प्रखर राष्ट्रप्रेम' है। यह पाठ सिखाता है कि सच्ची वीरता केवल जीतने में नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों (बन्धन या मरण) में भी अपने स्वाभिमान और देश के प्रति निष्ठा को बनाए रखने में है।
4. महत्वपूर्ण गद्यांश - ससन्दर्भ अनुवाद (Critical Passages)
महत्वपूर्ण अंश 1: "सिंहस्तु सिंह एव, वने वा भवतु पञ्जरे वा... वीर भावो हि वीरता ।।"
सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के 'संस्कृत खंड' के 'वीरः वीरेण पूज्यते' पाठ से लिया गया है।
हिन्दी अनुवाद: पुरुराज कहते हैं— "हे यवनराज! सिंह तो सिंह ही होता है, चाहे वह वन में हो या पिंजरे में।" सिकंदर कहता है— "किन्तु पिंजरे में पड़ा हुआ सिंह कोई पराक्रम नहीं दिखाता।" पुरुराज उत्तर देते हैं— "पराक्रम दिखाता है, यदि उसे अवसर मिलता है। हे यवनराज! बन्धन हो अथवा मरण हो, जय हो अथवा पराजय हो, दोनों ही स्थितियों में वीर पुरुष समान रहता है, क्योंकि वीर के भाव को ही वीरता कहते हैं।"
महत्वपूर्ण अंश 2: "एकम् इदं भारतं राष्ट्रम्... तव मैत्रीसन्धे अस्वीकरणे हेतुः।"
सन्दर्भ: पूर्ववत्।
हिन्दी अनुवाद: पुरुराज कहते हैं— "यह भारत राष्ट्र एक है और यहाँ बहुत से राज्य तथा बहुत से शासक हैं। तुम अपनी मैत्री सन्धि से उन्हें विभाजित करके भारत को जीतने की इच्छा रखते हो। आम्भीक इसका प्रत्यक्ष प्रमाण (देशद्रोही) है। हमारी आन्तरिक विविधता के बावजूद हम सब एक हैं, क्योंकि 'उत्तरं यत् समुद्रस्य...'।"
5. शब्दार्थ (Glossary)
शब्द | अर्थ | विलोम |
बन्धनगतः | कैद किया हुआ / बन्दी | मुक्तः |
वाचालः | बहुत बोलने वाला | मूकः |
उभयत्र | दोनों जगह | एकत्र |
हन्तव्यः | मारने योग्य | रक्षणीयः |
सन्ततिः | सन्तान / प्रजा | --- |
अभिमतम् | विचार / सम्मति | --- |
6. सही या गलत (True or False)
कथन 1: पुरुराज सिकंदर के सामने भय से काँपने लगे।
उत्तर: गलत। कारण: वे निडर होकर सिंह के समान बात कर रहे थे।
कथन 2: 'वीर भावो हि वीरता' पुरुराज का कथन है।
उत्तर: सही।
कथन 3: आम्भीक सिकंदर का मित्र और भारत का शुभचिंतक था।
उत्तर: गलत। कारण: आम्भीक एक राष्ट्रद्रोही था।
7. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answers - संस्कृत में)
प्रश्न 1: पुरुराजः कः आसीत्?
उत्तर: पुरुराजः एकः भारतवीरः (एकः राजा) आसीत्।
प्रश्न 2: अलक्षेन्द्रः कः आसीत्?
उत्तर: अलक्षेन्द्रः यवनराजः (सिकन्दरः) आसीत्।
प्रश्न 3: वीरता किं कथ्यते? (या वीरभावः कः?)
उत्तर: वीर भावो हि वीरता कथ्यते।
8. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answers - 5 अंक)
प्रश्न: सिकंदर के सामने पुरुराज ने अपनी देशभक्ति और भारत की एकता को किस प्रकार प्रतिपादित किया?
उत्तर: पाठ के संवादों के आधार पर पुरुराज ने निम्न तर्क दिए:
राष्ट्र की अखंडता: पुरुराज ने कहा कि भले ही हमारे यहाँ बहुत से राज्य (बहूनि राज्यान्) हों, पर हमारा राष्ट्र एक है।
सांस्कृतिक एकता: उन्होंने भौगोलिक सीमा बताते हुए कहा कि जो समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में स्थित है, वह भारत देश है और हम सब उसकी सन्तानें (भारती सन्ततिः) हैं।
सन्धि का विरोध: उन्होंने सिकंदर की मैत्री सन्धि को 'भारत को तोड़ने की चाल' बताया और देश की रक्षा के लिए इसे ठुकराना अपना कर्त्तव्य माना।
9. व्याकरण - पाठ पर आधारित (Grammar)
सर्वनाम शब्द (विभक्ति एवं वचन):
तव: षष्ठी विभक्ति, एकवचन।
त्वयि: सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
मम: षष्ठी विभक्ति, एकवचन।
अव्यय पद अलग करें:
पाठ में आए मुख्य अव्यय: तत्र, कथम्, नूनम्, वापि, च।
समास-विग्रह:
भारतवीरः: भारतस्य वीरः (तत्पुरुष समास)।
मैत्रीसन्धिः: मैत्र्याः सन्धिः (तत्पुरुष समास)।
10. UP Board परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण श्लोक (अनुवाद हेतु)
श्लोक 1:
"बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः ।
उभयत्र समो वीरः वीर भावो हि वीरता ॥"
अनुवाद: बन्धन हो या मृत्यु, जीत हो या हार, दोनों ही स्थितियों में वीर पुरुष समान रहता है; क्योंकि वीर की भावना ही वीरता है।
श्लोक 2:
"उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ॥"
अनुवाद: जो समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में स्थित है, वह भारत नाम का देश है, जहाँ की सन्तानें (प्रजा) भारतीय हैं।
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