2.5. ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से - Irshya - Class 10 - गद्य-खंड - Rajeev Prakashan
- May 15
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Updated: 6 days ago

पाठ का प्रकार: गद्य-खंड (निबंध)
लेखक का नाम: रामधारी सिंह 'दिनकर'
विधा: मनोवैज्ञानिक एवं विचारात्मक निबंध
शीर्षक: ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से
परीक्षा-उपयोगी तथ्य (Quick Exam Facts)
विषय | विवरण |
लेखक | रामधारी सिंह 'दिनकर' (आग और राग के कवि) |
जन्म वर्ष | सन् 1908 ई. |
जन्म स्थान | सिमरिया, जिला-बेगूसराय (बिहार) |
प्रमुख सम्मान | पद्मभूषण, साहित्य अकादमी ('संस्कृति के चार अध्याय' हेतु), ज्ञानपीठ ('उर्वशी' हेतु) |
मुख्य विधा | कविता, निबंध और आलोचना |
भाषा | ओजपूर्ण, सारगर्भित और व्यावहारिक खड़ीबोली |
विचारधारा | मानवतावादी एवं सुधारात्मक |
1. लेखक परिचय (Author Introduction)
जन्म एवं शिक्षा: 'दिनकर' जी का जन्म सन् 1908 ई. में बिहार के सिमरिया गाँव में हुआ था। इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातक (BA) किया। वे ग्रामीण परिवेश से जुड़े होने के कारण जमीन से जुड़े साहित्यकार थे।
साहित्यिक एवं राजनैतिक जीवन: आप राज्यसभा के सदस्य रहे और भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। भारत सरकार के हिंदी सलाहकार के रूप में भी आपने सेवाएँ दीं। आपकी रचनाओं में राष्ट्रवाद और क्रांति का स्वर मुखर है।
प्रमुख रचनाएँ:
काव्य: कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, रेणुका, हुंकार, परशुराम की प्रतीक्षा।
गद्य: संस्कृति के चार अध्याय, शुद्ध कविता की खोज, अर्धनारीश्वर, वट-पीपल।
निधन: सन् 1974 ई. में।
2. पाठ का सारांश (Bilingual Summary)
हिन्दी:
'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' निबंध में लेखक ने ईर्ष्या (जलन) जैसे मानवीय विकार का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। लेखक का मानना है कि ईर्ष्या एक 'अनोखा वरदान' है, क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने पास मौजूद सुखों का आनंद लेने के बजाय दूसरों की उपलब्धियों को देखकर दुखी रहता है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि ईर्ष्या की बड़ी बेटी 'निंदा' है। ईर्ष्या से बचने का एकमात्र उपाय मानसिक अनुशासन और अपनी कमियों को रचनात्मक तरीके से पूरा करना है।
English:
In the essay 'Irshya, Tu Na Gayi Mere Man Se', Dinkar provides a psychological analysis of envy. He describes envy as a 'strange boon' because an envious person, instead of enjoying their own blessings, suffers by comparing themselves with others. The author points out that 'criticism' is the offspring of envy. The only way to overcome this vice is through mental discipline and finding creative ways to fulfill one's own deficiencies.
3. केंद्रीय भाव / मूल संदेश (Central Idea / Theme)
इस पाठ का मूल संदेश 'मानसिक संतोष और आत्म-सुधार' है। लेखक यह समझाना चाहते हैं कि ईर्ष्या मनुष्य के चारित्रिक पतन का कारण बनती है और उसकी रचनात्मकता को नष्ट कर देती है। सुखी जीवन के लिए दूसरों से तुलना करने के बजाय 'स्वस्थ स्पर्धा' (Healthy Competition) को अपनाना चाहिए।
4. गद्यांश - ससन्दर्भ व्याख्या (Critical Passages)
महत्वपूर्ण अंश 1: "ईर्ष्या का काम जलाना है; मगर, सबसे पहले वह उसी को जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है।"
(क) सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' शीर्षक से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।
(ख) प्रसंग: लेखक ईर्ष्या के आत्मघाती स्वभाव का वर्णन कर रहे हैं।
(ग) व्याख्या: ईर्ष्या अग्नि के समान है। जिस प्रकार आग पहले उसी पात्र को गर्म करती है जिसमें वह रहती है, वैसे ही ईर्ष्या सबसे पहले उसी व्यक्ति के शांति और सुख को नष्ट करती है जिसके मन में वह पैदा होती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों का अहित करने से पहले स्वयं आंतरिक रूप से जलता रहता है।
(घ) साहित्यिक विशेषता:
भाषा: ओजपूर्ण और सूत्रात्मक।
भाव: मनोवैज्ञानिक सत्य का उद्घाटन।
महत्वपूर्ण अंश 2: "ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है।... वह ईर्ष्या करना कम कर देगा।"
(क) सन्दर्भ: पूर्ववत्।
(ख) प्रसंग: ईर्ष्या के निवारण के उपाय।
(ग) व्याख्या: लेखक के अनुसार ईर्ष्या कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। यदि मनुष्य फालतू बातों और दूसरों की निंदा के बजाय अपने अभावों को रचनात्मक ढंग से पूरा करने की जिज्ञासा जगा ले, तो वह इस मानसिक विकार से मुक्त हो सकता है। अनुशासन ही मन को भटकने से रोकता है।
5. शब्दार्थ / शब्द-संपदा (Glossary)
शब्द | अर्थ | पर्यायवाची | विलोम |
ईर्ष्या | दूसरों की उन्नति देखकर जलन | डाह, द्वेष | प्रेम / सहानुभूति |
उद्यम | परिश्रम / कोशिश | मेहनत, प्रयास | आलस्य |
अनायास | बिना किसी प्रयास के | अचानक, सहसा | सायास |
दंश | डंक मारना / चुभन | डंक, चुभन | --- |
कुंठित | मंद / जिसकी धार खत्म हो | निस्तेज | प्रखर |
अपावन | अपवित्र | अशुद्ध | पावन / पवित्र |
6. सही या गलत (True or False)
कथन 1: रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ था।
उत्तर: गलत। कारण: उनका जन्म बिहार के बेगूसराय जनपद में हुआ था।
कथन 2: 'उर्वशी' के लिए दिनकर जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
उत्तर: सही।
कथन 3: लेखक के अनुसार ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम 'निंदा' है।
उत्तर: सही।
7. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answers - 2 अंक)
प्रश्न 1: ईर्ष्या को 'अनोखा वरदान' क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि जिस मनुष्य के हृदय में यह घर कर लेती है, वह उन वस्तुओं से आनंद नहीं उठा पाता जो उसके पास हैं, बल्कि दूसरों की वस्तुओं को देखकर दुखी होता है।
प्रश्न 2: ईर्ष्यालु व्यक्ति का स्वभाव कैसा होता है?
उत्तर: वह अपनी उन्नति के लिए प्रयास करने के बजाय दूसरों को हानि पहुँचाने को ही अपना श्रेष्ठ कर्तव्य समझने लगता है।
प्रश्न 3: ईर्ष्या से बचने का सबसे मुख्य उपाय क्या है?
उत्तर: मानसिक अनुशासन और अपनी कमियों को रचनात्मक तरीके से पूरा करने की जिज्ञासा जगाना।
8. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answers - 5 अंक)
प्रश्न: रामधारी सिंह 'दिनकर' की गद्य शैली की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: दिनकर जी एक ओजस्वी गद्यकार हैं:
विषय का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: 'ईर्ष्या' जैसे निबंधों में आपने मानव मन की गहराइयों को बहुत सूक्ष्मता से पकड़ा है।
तार्किक और सशक्त भाषा: आपकी भाषा प्रवाहपूर्ण खड़ीबोली है, जिसमें तत्सम के साथ-साथ उर्दू के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग है।
सूत्रात्मकता: आप छोटे-छोटे वाक्यों में बड़े विचार (जैसे- ईर्ष्या की बड़ी बेटी निंदा है) व्यक्त करने में निपुण हैं।
सुधारात्मक दृष्टिकोण: आपकी शैली केवल समस्या नहीं बताती, बल्कि उसका समाधान (मानसिक अनुशासन) भी प्रस्तुत करती है।
9. व्याकरण - पाठ पर आधारित (Grammar)
उपसर्ग अलग करें:
उपवन: उप + वन
अपव्यय: अप + व्यय
निदान: नि + दान
सुकर्म: सु + कर्म
प्रत्यय पहचानें:
मौलिक: मूल + इक
रचनात्मक: रचना + आत्मक
भौतिक: भूत + इक
शब्द युग्म का अर्थ:
ईर्ष्या: जलन (भाव)
ईर्ष्यालु: जलन करने वाला (व्यक्ति)
10. UP Board परीक्षा हेतु अपेक्षित प्रश्न
व्याख्या हेतु: "मगर, ईर्ष्या का यही अनोखा वरदान है... जहाँ नहीं जाना चाहिए था।"
लघु उत्तरीय: 'संस्कृति के चार अध्याय' के लिए दिनकर जी को कौन सा पुरस्कार मिला? (उत्तर: साहित्य अकादमी पुरस्कार)।
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