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    1.4. रे थांब जरा आषाढघना - Re Thamba Jara Ashadhghana - Class 11 -Yuvakbharati

    • 1 day ago
    • 5 min read


    कवि: बा. भ. बोरकर | विधा: निसर्ग कविता


    १. शब्दार्थ और मुहावरे (Glossary with English Context)

    क. शब्दार्थ (Word Meanings)

    शब्द (Word)

    अर्थ (Hindi)

    अर्थ (English Context)

    आषाढघना

    आषाढ़ मास के बादल

    Clouds of the month of Ashadh


    दिठि

    दृष्टि / नज़र

    Sight / Vision


    पाचू

    पन्ना (रत्न)

    Emerald


    प्रवाळ

    मूँगा (रत्न)

    Coral


    पदविन्यास

    पदचिह्न / कदमों के निशान

    Footprints


    वासरमणि

    सूर्य

    Sun


    पिसोळी

    तितलियाँ

    Butterflies


    विधुवदना

    चंद्रमा का मुख (पानी में प्रतिबिंब)

    Moon-faced (Reflection of moon)


    आसर

    आश्रय / ओट

    Shelter / Cover


    हितगूज

    मन की बात / सुख-संवाद

    Heart-to-heart talk


    २. परिचय और सारांश (Introduction & Summary)

    कवि परिचय: बा. भ. बोरकर (१९१०-१९८४) एक श्रेष्ठ कवि और पद्मश्री से सम्मानित साहित्यकार हैं। निसर्ग और प्रेम उनकी कविताओं के मुख्य विषय रहे हैं ।


    केंद्रीय भाव (Central Idea - Bilingual):


    हिन्दी: कवि आषाढ़ के बादलों से क्षण भर के लिए रुकने का आग्रह करते हैं ताकि वे बादलों द्वारा रचित प्रकृति के अद्भुत और जादुई सौंदर्य को जी भर कर देख सकें ।


    English: The poet requests the Ashadh clouds to pause for a moment so that he can admire the enchanting natural beauty created by the rain and engage in a dialogue with various elements of nature.


    सारांश (Summary): 'रे थांब जरा आषाढघना' एक निसर्ग प्रधान कविता है। कवि आषाढ़ के बादलों से प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी मूसलाधार बारिश को थोड़ी देर के लिए रोक दें। यदि बादल रुकते हैं, तो कवि पन्ने (पाचू) जैसी हरी-भरी फसलों, मूँगे (प्रवाळ) जैसी लाल मिट्टी में चलते हल, और इंद्रनील रत्नों जैसे बाँस के झुरमुटों को देख सकेंगे ।


    वे बादलों द्वारा प्रकृति पर की गई जादूगरी का अनुभव करना चाहते हैं। कवि चाहते हैं कि आकाश खुले और सूर्य की कोमल सुनहरी धूप इस भीगी हुई प्रकृति पर बिखरे । वे तितलियों के पंखों पर चमकते रत्नों के रंगों को देखना चाहते हैं और रात के अंधेरे में चमकते काजुओं के साथ मन की बातें करना चाहते हैं । यह कविता आषाढ़ के बादलों की 'करुणा' और उनसे निर्मित चैतन्यमय वातावरण का सुंदर चित्रण है ।


    ४. HSC पद्य आकलन (Poetry Pattern)

    कृति १: पद्यांश आकलन (2 Marks)


    प्रश्न १: कवि ने आषाढ़घना से कौन-से कार्य करने को कहा है?


    • १. घड़ी भर के लिए रुकना (थांबणे)


    • २. आकाश को खोलना (उघड गगन)


    • ३. बादलों की ओट करना (कर आसर)


    • ४. सूर्य के घर को खुला करना (खुलें कर वासरमणि-घर)


    प्रश्न २: आषाढ़घना के रुकने पर प्रकृति में क्या बदलाव होंगे?


    • १. मकई के दाने दूध से भर जाएंगे


    • २. फूलों के डंठल शहद से भर जाएंगे


    • ३. पक्षियों का कंठ मधुर गान से भर जाएगा


    • ४. घास की पत्तियों पर रोमांच (शहारा) आ जाएगा


    कृति २: पद्य विश्लेषण / रसास्वादन (Appreciation - 6 Marks)

    • शीर्षक: रे थांब जरा आषाढघना


    • रचनाकार: बा. भ. बोरकर


    • केंद्रीय कल्पना: आषाढ़ के बादलों से कुछ पल रुकने का आग्रह ताकि प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लिया जा सके 。


    • रस/अलंकार: इस कविता में शांत रस और श्रृंगार रस का मिश्रण है। इसमें रूपक (जैसे कोमल पाचूंची शेते) और मानवीयकरण अलंकार (जैसे लाजुन या जाईच्या लेकी) का उत्कृष्ट प्रयोग है ।


    • प्रतीक विधान: पाचू, प्रवाळ, इंद्रनीळ जैसे रत्नों के प्रतीकों से प्रकृति की बहुमूल्यता को दर्शाया गया है 。


    • भाव पक्ष: कवि की संवेदनशीलता और प्रकृति के प्रति उनका अगाध प्रेम शब्दों में झलकता है 。


    • कला पक्ष: नादमयता और शब्दों का माधुर्य इस कविता की विशेषता है। कवि ने संस्कृतनिष्ठ और ग्रामीण दोनों प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है ।


    कृति ३: लघूत्तरी प्रश्न (Short Answer - 2 Marks)


    प्रश्न: "काळोखाचीं पीत आंसवें, पालवींत उमलतां काजवे" इन पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट करें। उत्तर: कवि कहते हैं कि रात के घने अंधेरे में जब काजुए वृक्षों की कोमल पत्तियों के बीच चमकते हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे अंधेरे के दुख भरे आंसुओं को पीकर प्रकाश फैला रहे हों । कवि इन चमकते काजुओं के साथ एकांत में संवाद (हितगूज) करना चाहते हैं ।


    ७. व्याकरण (Grammar Corner with Explanations)


    समानार्थी शब्द (Synonyms):


    • १. आषाढघन: आषाढ़ के बादल


    • २. वासरमणि: सूर्य (Sun)


    • ३. खग: पक्षी (Birds)


    • ४. विधु: चंद्रमा (Moon)


    लिंग परिवर्तन (Gender Change):

    • १. लेकी: लेक (एकवचन) / मुलगा (पुल्लिंग)


    • २. वासरमणि: (पुल्लिंग शब्द)


    ८. पिछली बोर्ड परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Board Questions)


    प्रश्न १: कवि ने आषाढ़ के बादलों को 'करुणा' का प्रतीक क्यों माना है? उत्तर: बादल जब बरसते हैं, तो धरती तृप्त होती है, चारों ओर हरियाली छा जाती है और जीवन का पोषण होता है। बादलों का यह परोपकारी स्वभाव उनकी करुणा को दर्शाता है, जिससे सारी सृष्टि चैतन्यमय हो जाती है ।


    प्रश्न २: "कोवळ्या नव्या हळदुव्या उन्हा" का प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ता है? उत्तर: जब बादलों की ओट से कोमल सुनहरी धूप निकलती है, तो वह बारिश से धुली हुई प्रकृति पर एक जादुई चमक बिखेर देती है। यह धूप नए उत्साह और रंगों का संचार करती है, जिससे प्रकृति और भी आकर्षक लगने लगती है ।


    प्रश्न ३: कवि काजुओं के साथ 'हितगूज' (मन की बात) क्यों करना चाहते हैं? उत्तर: रात के शांत वातावरण में चमकते काजुए कवि को साथी जैसे लगते हैं। वे प्रकृति के रहस्यों और अपनी अनुभूतियों को इन छोटे प्रकाश-पुंजों के साथ साझा करना चाहते हैं, जो उन्हें सजीवता का अनुभव कराते हैं ।


    प्रश्न ४: कविता में प्रयुक्त रत्नों के नाम और उनके संदर्भ स्पष्ट कीजिए। उत्तर: १. पाचू (पन्ना): हरी-भरी फसलों के लिए । २. प्रवाळ (मूँगा): लाल मिट्टी के लिए । ३. इंद्रनीळ (नीलम): बाँस के झुरमुटों के लिए । ४. रत्नकळा: तितलियों के पंखों की चमक के लिए ।


    प्रश्न ५: 'जाईच्या लेकी' के माध्यम से कवि ने क्या मानवीय भाव व्यक्त किया है? उत्तर: यहाँ कवि ने जाई के फूलों का मानवीकरण किया है। वे कहते हैं कि जाई के फूल शरमाकर (लाजुन) बादलों को छिप-छिपकर देख रहे हैं । यह एक किशोर लड़की की लज्जा और कौतूहल जैसे मानवीय भावों को दर्शाता है 。


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