16. आओ, मिलकर बचाएँ - Aao Milkar Bachaye - Class 11 - Aroh
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लेखिका: निर्मला पुतुल
1. लेखिका परिचय (Literary Profile)
साहित्यिक विशेषताएँ (Literary Traits): निर्मला पुतुल का जन्म झारखंड के एक आदिवासी (संथाल) परिवार में हुआ। उनका जीवन और लेखन दोनों ही संघर्ष की उपज हैं। उनकी कविताओं के केंद्र में आदिवासी समाज की विसंगतियाँ, कड़ी मेहनत के बावजूद बदहाली, कुरीतियाँ और पुरुष वर्चस्व जैसे मुद्दे हैं। वे अपनी जड़ों से जुड़ी हुई कवयित्री हैं जो अपनी संस्कृति को बचाने के लिए संकल्पित हैं।
प्रमुख रचनाएँ (Key Works): नगाड़े की तरह बजते शब्द, अपने घर की तलाश में।
संदर्भ: यह कविता आदिवासी समाज की उन सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों को बचाने का आह्वान करती है जो आधुनिकता और शहरी चकाचौंध के कारण लुप्त होती जा रही हैं।
2. पाठ का सार (Executive Summary)
प्रतिपाद्य (Central Theme): 'आओ, मिलकर बचाएँ' कविता में कवयित्री अपने परिवेश की उन वस्तुओं और मूल्यों को बचाने की अपील करती हैं जो उनकी पहचान हैं। वे अपनी बस्तियों को शहर की 'आबो-हवा' (संवेदनहीनता और बनावटीपन) से बचाकर अपनी 'माटी के रंग' और 'झारखंडीपन' को सुरक्षित रखना चाहती हैं।
English Summary: 'Aao, Milkar Bachayein' is a call to preserve the cultural and environmental identity of the tribal (Santhal) community. Nirmala Putul expresses concern over the increasing influence of urban culture on tribal lives, which is leading to the loss of their natural simplicity, language, and values. She urges people to save their forests, songs, laughter, and communal harmony before they are completely eroded by modernity.
Key Points:
बस्तियों को शहर की नग्नता और जड़ता (ठंडी होती दिनचर्या) से बचाना।
प्रकृति का संरक्षण: पेड़ों की ठंडी हवा, नदियों की पवित्रता और मिट्टी की खुशबू को बचाना।
सांस्कृतिक पहचान: संथाली भाषा का झारखंडीपन, नाच-गाने, अक्खड़पन और जुझारूपन को बचाना।
मानवीय मूल्य: आपसी विश्वास, उम्मीदें और सपनों को बचाने का संकल्प।
3. कठिन शब्दार्थ (Glossary)
शब्द | हिंदी अर्थ | English Context |
आबो-हवा | जलवायु / वातावरण | Climate / Atmosphere |
नग्नता | खुलापन / यहाँ अर्थ है सांस्कृतिक रिक्तता | Nakedness / Lack of values |
सोंधापन | गीली मिट्टी की खुशबू | Earthy fragrance |
अक्खड़पन | अपनी बात पर अड़े रहना | Stubbornness / Rudeness |
जुझारूपन | संघर्ष करने की प्रवृत्ति | Fighting spirit |
4. साहित्यिक विश्लेषण (Literary Analysis)
भाव पक्ष (Thematic Aspect): कविता में पर्यावरण चेतना और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का स्वर है। कवयित्री केवल जंगलों को ही नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के 'भोलेपन' और 'संघर्षशीलता' को भी बचाना चाहती हैं।
कला पक्ष (Artistic Aspect):
प्रतीक (Symbols): 'शहर की आबो-हवा' संवेदनहीनता और दिखावे का प्रतीक है। 'हड्डियाँ' और 'नग्नता' प्राकृतिक विनाश की ओर इशारा करते हैं।
बिंब (Imagery): 'ठंडी होती दिनचर्या' में जीवन की गर्माहट—यहाँ ऊष्मीय बिंब का प्रयोग संघर्ष की कमी को दर्शाने के लिए किया गया है।
भाषा: सरल, सुबोध और संथाली संस्कृति के शब्दों से युक्त खड़ी बोली।
5. काव्यांश आधारित प्रश्न (Extract-Based Competency)
Extract 1: "बस्तियों को शहर की आबो-हवा से बचाने की / बचाएँ डूबने से / पूरी की पूरी बस्ती को हँडिया में।"
Interpretation: 'बस्ती को हँडिया में डूबने' का क्या आशय है? (उत्तर: शराबखोरी और नशे की लत में पूरी बस्ती का विनाश हो जाना)।
Author's Intent: 'शहर की आबो-हवा' से कवयित्री क्यों डरी हुई हैं? (उत्तर: क्योंकि शहर की हवा गाँव की सादगी को छीनकर उसे बनावटी और संवेदनहीन बना देती है)।
Inference: कवयित्री अपनी भाषा के बारे में क्या कहना चाहती हैं? (उत्तर: वे चाहती हैं कि उनकी भाषा में 'झारखंडीपन' बना रहे, वह शहरों की कृत्रिम भाषा न बने)।
6. पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर (Textbook Q&A)
1. भाषा में 'झारखंडीपन' से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: इसका अर्थ है झारखंड की मिट्टी की अपनी विशेषताएँ—वहाँ की सहजता, बोली का खास लहजा और लोक-जीवन के अनुभवों का भाषा में झलकता हुआ स्वरूप। कवयित्री चाहती हैं कि शहरीकरण के बावजूद उनकी मातृभाषा अपनी मौलिकता न खोए।
2. दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को बचाने की आवश्यकता पर क्यों बल दिया गया है?
उत्तर: आदिवासी समाज की असली ताकत उसका सीधापन (भोलापन) तो है ही, लेकिन विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के लिए उनका अक्खड़पन (जिद) और जुझारूपन (संघर्ष) भी उतना ही जरूरी है। इनके बिना वे अपना अस्तित्व और अधिकार नहीं बचा पाएँगे।
3. कवयित्री के अनुसार 'इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है'—से क्या आशय है?
उत्तर: कवयित्री का दृष्टिकोण आशावादी है। वे मानती हैं कि आधुनिकता ने बहुत कुछ नष्ट कर दिया है, लेकिन अभी भी हमारा आपसी विश्वास, उम्मीदें, सपने और हमारी सांस्कृतिक जड़ें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। अगर हम मिलकर प्रयास करें, तो इन्हें बचाया जा सकता है।
7. अभिव्यक्ति और माध्यम (Creative Writing Connection)
Topic: "प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और आदिवासी संस्कृति"
Key Points:
जल, जंगल और ज़मीन का महत्व।
आधुनिकीकरण और विस्थापन की समस्या।
अपनी लोक-विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना।
8. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण कथन (Key Quotes)
"आओ, मिलकर बचाएँ कि इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है।"
"ठंडी होती दिनचर्या में जीवन की गर्माहट।"
"थोड़ा-सा विश्वास, थोड़ी-सी उम्मीद, थोड़े-से सपने।"
9. सामान्य त्रुटियाँ (Common Student Errors)
Spelling: 'झारखंडीपन', 'अक्खड़पन' और 'संथाल' की वर्तनी पर ध्यान दें।
Conceptual: छात्र सोचते हैं कि कवयित्री शहरों की विरोधी हैं। वास्तव में वे शहरों की बुराइयों (नशा, दिखावा, जड़ता) की विरोधी हैं, विकास की नहीं।
10. विगत वर्षों के बोर्ड प्रश्न (PYQs)
Short Answer (2 marks): 'ठंडी होती दिनचर्या' में 'जीवन की गर्माहट' से क्या तात्पर्य है?
Model Answer: इसका तात्पर्य है कि आधुनिक जीवन यांत्रिक और उत्साहहीन (ठंडा) होता जा रहा है। कवयित्री उस पुराने जोश, संघर्ष और उत्साह (गर्माहट) को पुनः जागृत करना चाहती हैं जो उनकी संस्कृति की पहचान है।
Long Answer (5 marks): 'आओ, मिलकर बचाएँ' कविता के आधार पर आदिवासी समाज की समस्याओं और उनके समाधान पर प्रकाश डालिए।
Model Answer: यह कविता आदिवासी समाज के दोहरे संकट को दर्शाती है—बाहरी हस्तक्षेप के कारण प्राकृतिक विनाश और आंतरिक रूप से बढ़ती नशाखोरी व शिक्षा का अभाव। समाधान के रूप में कवयित्री सामूहिक प्रयास (आओ, मिलकर बचाएँ) पर बल देती हैं। वे अपनी मिट्टी के रंग, अपनी भाषा और अपने पारंपरिक जुझारूपन को ही ढाल बनाकर अपनी पहचान सुरक्षित रखने का संदेश देती हैं
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