3.0. एकांकी: अर्थ, स्वरूप एवं विकास - Ekanki - Class 9 - गद्य-खंड - Rajeev Prakashan
- May 4
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Updated: May 8

एकांकी साहित्य की वह सशक्त विधा है जो 'एक अंक' में जीवन की किसी एक महत्वपूर्ण घटना या संवेदना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। इसे अंग्रेजी के 'वन एक्ट प्ले' (One Act Play) के समानांतर माना जा सकता है।
Quick Exam Facts
विषय | विवरण |
शाब्दिक अर्थ | एक अंक वाला नाटक |
मुख्य तत्व | कथावस्तु, पात्र, संवाद, भाषा-शैली, देशकाल, उद्देश्य |
हिंदी एकांकी के जनक | भारतेंदु हरिश्चंद्र |
प्रथम एकांकी (विवादित) | 'एक घूँट' (प्रसाद) या 'बादल की मृत्यु' (डॉ. रामकुमार वर्मा) |
महत्वपूर्ण विशेषता | संकलन-त्रय (स्थान, समय और कार्य की एकता) |
1. एकांकी का स्वरूप एवं परिभाषा
एकांकी नाटक का छोटा रूप मात्र नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक स्वतंत्र और पूर्ण विधा है।
डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, एकांकी में एक ही घटना नाटकीय कौशल से कौतूहल जगाते हुए चरम सीमा तक पहुँचती है।
डॉ. नगेंद्र मानते हैं कि एकांकी में जीवन का क्रमबद्ध विवेचन न होकर किसी एक विशेष परिस्थिति या उद्दीप्त क्षण का चित्र मिलता है।
एकांकी और नाटक में मुख्य अंतर
आधार | नाटक | एकांकी |
अंक | अनेक अंक होते हैं। | केवल एक अंक होता है। |
कथानक | व्यापक और विस्तारपूर्ण होता है। | संक्षिप्त और एकपक्षीय होता है। |
पात्र | पात्रों की संख्या अधिक और विविधतापूर्ण होती है। | सीमित पात्र होते हैं। |
प्रभाव | जीवन का समग्र चित्रण मिलता है। | एक गहरी संवेदना या झाँकी मिलती है। |
2. एकांकी के तत्व
एकांकी की रचना मुख्य रूप से निम्नलिखित छह तत्वों के आधार पर की जाती है:
कथावस्तु (Plot): यह सूक्ष्म, तीव्र और द्वंद्वपूर्ण होनी चाहिए। इसमें प्रासंगिक कथाओं के लिए स्थान नहीं होता。
पात्र (Characterization): पात्रों की संख्या कम होनी चाहिए ताकि घटना पर ध्यान केंद्रित रहे। वे यथार्थवादी और जनजीवन का प्रतिनिधित्व करने वाले हों。
संवाद (Dialogue): संवाद छोटे, चुटीले और पात्रों के स्वभाव के अनुकूल होने चाहिए。
भाषा-शैली: भाषा सरल, सुबोध और स्पष्ट होनी चाहिए जो दर्शकों से सीधा संवाद कर सके。
देशकाल-वातावरण: पात्रों की वेशभूषा और परिवेश उस युग के अनुरूप होना चाहिए जिससे एकांकी जीवंत लगे。
उदेश्य: आधुनिक एकांकी का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ को प्रस्तुत करना है。
3. हिंदी एकांकी का विकास यात्रा
हिंदी एकांकी का विकास विभिन्न चरणों में हुआ है:
प्रथम चरण (भारतेंदु युग): भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी एकांकी के जनक माने जाते हैं। उनके प्रमुख प्रहसन 'अंधेर नगरी' और 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' हैं。
द्वितीय चरण (प्रसाद युग): जयशंकर प्रसाद कृत 'एक घूँट' (1929) को आधुनिक तकनीक वाला पहला एकांकी माना जाता है。
तृतीय चरण (विकास काल): डॉ. रामकुमार वर्मा की 'बादल की मृत्यु' (1930) से हिंदी एकांकी का व्यवस्थित स्वरूप सामने आया。 इस काल के अन्य प्रमुख लेखक भुवनेश्वर ('कारवाँ'), उपेंद्रनाथ अश्क और जगदीशचंद्र माथुर हैं。
स्वातंत्र्योत्तर काल: इस समय एकांकी में मनोवैज्ञानिक गहराई और सामाजिक समस्याओं का चित्रण बढ़ा। विष्णु प्रभाकर ('सीमा रेखा'), मोहन राकेश और लक्ष्मीनारायण लाल ने इसे नए जीवन-मूल्यों से जोड़ा。
4. एकांकी के प्रकार
विषय और शिल्प के आधार पर एकांकी के कई भेद हैं:
सामाजिक एकांकी: जैसे 'लक्ष्मी का स्वागत' (अश्क)。
ऐतिहासिक एकांकी: जैसे 'दीपदान' (डॉ. रामकुमार वर्मा)。
रेडियो-रूपक: जो केवल ध्वनि के माध्यम से प्रसारित होते हैं。
हास्य-प्रहसन: जैसे 'साहब को जुकाम है' (अश्क)。
परीक्षक की दृष्टि से: एकांकी में 'संकलन-त्रय' (समय, स्थान और कार्य की एकता) का निर्वाह करना उसकी प्रभावशीलता बढ़ा देता है। उत्तर लिखते समय पाश्चात्य और भारतीय शैलियों के प्रभाव का उल्लेख अवश्य करें।
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