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    9. राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद  - Ram-Lakshman-Parshuram Samvad - Class 9 - Ganga

    • Jun 3
    • 15 min read

    Updated: Jun 5

    पाठ/काव्य परिचय (Chapter )


    • कविता का नाम: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद  

    • कवि: गोस्वामी तुलसीदास  

    • विधा: महाकाव्य का अंश (काव्य)  

    • पाठ्यपुस्तक: गंगा — NCERT कक्षा 9 हिंदी, R1, 2026-27


    कवि परिचय (Poet Introduction)

    गोस्वामी तुलसीदास का जन्म 16वीं शताब्दी (सन् 1532) में उत्तर प्रदेश में हुआ था और उनका देहावसान सन् 1623 में काशी में हुआ। वे संस्कृत के श्रेष्ठ ज्ञाता थे और उनका अवधी तथा ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था। 'रामचरितमानस' उनका सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य है, जो अवधी भाषा में रचित है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाओं में 'कवितावली', 'गीतावली', 'दोहावली', 'कृष्णगीतावली', 'विनयपत्रिका' (ब्रजभाषा) और 'हनुमान बाहुक' शामिल हैं। तुलसीदास ने श्रीराम के चरित्र के माध्यम से समाज में नीति, स्नेह, शील, विनय और त्याग जैसे उच्च मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है।  


    Goswami Tulsidas was born in the 16th century (1532 AD) in Uttar Pradesh and passed away in 1623 AD in Kashi. He was a great scholar of Sanskrit and had equal mastery over both Awadhi and Braj languages. 'Ramcharitmanas' is his most famous epic, composed in Awadhi. His other major works include 'Kavitavali', 'Gitavali', 'Vinaypatrika' (in Braj), and 'Hanuman Bahuk'. Through the character of Lord Rama, Tulsidas established high human values like ethics, affection, modesty, and sacrifice in society.  


    परीक्षा टिप / Exam Tip:कवि परिचय 5 अंकों के दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में पूछा जाता है। रामचरितमानस (अवधी) और विनयपत्रिका (ब्रजभाषा) का विशेष उल्लेख करते हुए उनके समन्वयवादी दृष्टिकोण और मानवीय आदर्शों पर बल दें।(Poet Introduction appears as a 5-mark long answer. Emphasize his use of Awadhi for Ramcharitmanas and Braj for Vinaypatrika, along with his establishment of human ideals.)

    कविता का मूल पाठ (Poem Text)


    देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।। पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा ।। जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।। जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा।। आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं।। बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।। रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।। रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।। बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।। समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।। सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।। अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।। अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।। सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी।। मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।। भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।। सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयं न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।। नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।। सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।। सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।। सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।। बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।। रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।  


    काव्यांश का सारांश (Summary)

    यह काव्यांश 'रामचरितमानस' के 'बालकांड' से लिया गया है। सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष तोड़े जाने के बाद मुनि परशुराम अत्यधिक क्रोधित होकर सभा में आते हैं। उनका भयंकर रूप देखकर सभी राजा भयभीत होकर उन्हें प्रणाम करने लगते हैं। राजा जनक और विश्वामित्र भी राम-लक्ष्मण के साथ उनका अभिवादन करते हैं। पृथ्वी पर टूटे हुए शिव-धनुष (चापखंड) को देखकर परशुराम क्रोध से भड़क उठते हैं और जनक से पूछते हैं कि इसे किसने तोड़ा है, अन्यथा वे पूरी पृथ्वी पलट देंगे।  


    राजाओं, नगरवासियों और सीता की माता को अत्यंत डरा हुआ देखकर श्रीराम शांत और विनम्र भाव से आगे आते हैं। श्रीराम कहते हैं कि शिव-धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। इस पर परशुराम और क्रोधित होकर कहते हैं कि सेवक वह है जो सेवा करे, शत्रुता का काम करने वाला सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है; जिसने भी धनुष तोड़ा है, वह सभा से अलग हो जाए, अन्यथा सभी राजा मारे जाएँगे। यह सुनकर लक्ष्मण मुसकराते हुए व्यंग्य करते हैं कि बचपन में हमने ऐसी बहुत सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब तो आपने क्रोध नहीं किया; इस धनुष से इतनी ममता क्यों है? परशुराम भड़क कर कहते हैं कि काल के वश में होने के कारण तेरी ज़बान सँभल नहीं रही है, यह कोई साधारण धनुष नहीं, बल्कि संसार में विख्यात शिव-धनुष है।  


    This extract is from the 'Balkand' of 'Ramcharitmanas'. After Lord Rama breaks Shiva's bow at Sita's Swayamvar, sage Parashuram arrives in a fierce rage. Seeing his terrifying appearance, all the kings become terrified and bow down to him. King Janaka and Vishwamitra, along with Ram and Lakshman, greet him. Seeing the broken pieces of Shiva's bow on the ground, Parashuram furiously asks Janaka who broke it, threatening to overturn the earth.  

    Seeing the kings, citizens, and Sita's mother terrified, Lord Rama steps forward calmly. Rama humbly says that the one who broke Shiva's bow must be one of your servants. An enraged Parashuram retorts that a servant serves; one who acts like an enemy is his foe like Sahasrabahu. Hearing this, Lakshman smiles and mockingly says they broke many small bows in childhood, but the sage never got angry then. Parashuram angrily replies that being under the spell of death, Lakshman doesn't know what he is saying, as this is the world-renowned bow of Lord Shiva.  


    शीर्षक की सार्थकता (Title Justification)


    प्रस्तुत पाठ का शीर्षक 'राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद' पूर्णतः सटीक है। संपूर्ण काव्यांश शिव-धनुष भंग होने के बाद परशुराम के क्रोध, श्रीराम की विनम्रता और लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण तर्कों के इर्द-गिर्द घूमता है। यह तीनों प्रमुख चरित्रों के बीच होने वाली नाटकीय बातचीत (संवाद) का जीवंत वर्णन है।


    The title is completely accurate as the entire extract revolves around Parashuram's anger, Lord Rama's humility, and Lakshman's sarcastic arguments after the breaking of Shiva's bow. It is a vivid description of the dramatic conversation (samvad) between these three main characters.

    काव्य-सौंदर्य (Poetic Beauty)


    भाव सौंदर्य (Emotional Beauty)


    इस काव्यांश में तीन भिन्न प्रवृत्तियों का सुंदर मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। श्रीराम की विनम्रता, शील और मर्यादा स्पष्ट झलकती है। इसके विपरीत परशुराम का उग्र, क्रोधी और रौद्र रूप सामने आता है। वहीं लक्ष्मण का चरित्र एक निडर, तर्कशील और व्यंग्य करने वाले युवा के रूप में उभरा है।

    (The extract beautifully depicts three distinct psychological tendencies. Rama's humility and modesty are clearly visible. In contrast, Parashuram's fierce and angry form is revealed. Meanwhile, Lakshman emerges as a fearless, logical, and sarcastic youth.)  


    शिल्प सौंदर्य (Structural Beauty)

    • भाषा: शुद्ध साहित्यिक 'अवधी' भाषा का अत्यंत प्रवाहमयी प्रयोग।  

    • छंद: दोहा और चौपाई छंद का प्रयोग, जो इसे संगीतात्मक और गेय बनाता है।  

    • अलंकार:

      • अनुप्रास: "अरि रनी रि रिअ लराई" (क वर्ण की आवृत्ति)।  

      • अतिशयोक्ति: "अरध निमेष कलप सम बीता" (बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना)।  

      • रूपक: "पद सरोज मेले दोउ भाई" (चरणों पर कमल का आरोप)।  

      • उपमा: "सहसबाहु सम सो रिपु मोरा" (सम वाचक शब्द का प्रयोग)।  

    • संवाद शैली: नाटकीय और व्यंग्यात्मक संवाद शैली, जो कथा को तेज़ी से आगे बढ़ाती है।

        

    केंद्रीय भाव एवं मूल्य (Central Theme & Values)

    5A. विषय-वस्तु तालिका (Themes Table)

    विषय (Theme)

    कविता में स्पष्टीकरण (Explanation in Text)

    मुख्य विषय: क्रोध बनाम संयम

    परशुराम के अत्यधिक क्रोध और श्रीराम के असीम धैर्य तथा संयम का सुंदर तुलनात्मक वर्णन।  

    व्यंग्य और तर्क

    लक्ष्मण द्वारा परशुराम की धमकियों का तार्किक और व्यंग्यात्मक तरीके से मुसकराते हुए उत्तर देना।  

    वीरता और मर्यादा

    श्रीराम की विनम्रता सिद्ध करती है कि सच्चा वीर मर्यादा में रहता है, जबकि क्रोध विवेक नष्ट कर देता है।  

    प्रधान रस और स्थायी भाव

    रौद्र रस (स्थायी भाव - क्रोध) तथा वीर रस (स्थायी भाव - उत्साह)।

    5B. मानवीय मूल्य (Human Values)

    • विनम्रता और शील (Humility and Modesty): श्रीराम द्वारा 'दास' शब्द का प्रयोग करके क्रोधित परशुराम को शांत करने का प्रयास। (Lord Rama's attempt to calm the angry Parashuram by using the word 'servant' (Daas).  


    • भावनात्मक संतुलन (Emotional Balance): भीषण संकट और भय के बीच भी श्रीराम के हृदय में 'न हरषु बिषादु' (न खुशी न दुख) का होना। (Having neither extreme joy nor sorrow in Lord Rama's heart even amidst terrible crisis and fear.)  


    • निडरता (Fearlessness): लक्ष्मण का परशुराम के भयंकर क्रोध से न डरना और सत्य को निडरता से सामने रखना। (Lakshman not fearing Parashuram's terrifying anger and fearlessly stating his logical truth.)  


    शब्दार्थ (Vocabulary)

    क्र.

    शब्द/पद

    हिंदी अर्थ

    English Meaning

    1

    भृगुपति

    परशुराम  

    Sage Parashuram

    2

    कराला

    भयंकर / डरावना  

    Fearsome / Terrible

    3

    भुआला

    राजा  

    Kings

    4

    ढोटा

    पुत्र / बालक  

    Son / Boy

    5

    जोटा

    जोड़ी  

    Pair

    6

    चापखंड

    धनुष का टुकड़ा  

    Piece of the bow

    7

    महि

    पृथ्वी / धरती  

    Earth / Ground

    8

    रिस

    क्रोध / गुस्सा  

    Anger / Wrath

    9

    त्रास

    भय / डर  

    Fear / Terror

    10

    निमेष

    पल / क्षण  

    Moment / Second

    11

    कलप

    कल्प (एक बहुत लंबी अवधि)  

    Kalpa (An era/long period)

    12

    भीरु

    डरा हुआ / भयभीत  

    Timid / Frightened

    13

    भंजनिहारा

    तोड़ने वाला  

    Breaker

    14

    आयसु

    आज्ञा / आदेश  

    Order / Command

    15

    कोही

    क्रोधी व्यक्ति  

    Angry person

    16

    रिपु

    शत्रु / दुश्मन  

    Enemy / Foe

    17

    बिलगाउ

    अलग हो जाएँ  

    To separate

    18

    लरिकाई

    लड़कपन / बचपन  

    Childhood

    19

    तिपुरारि

    शिव / शंकर  

    Lord Shiva

    20

    बेगि

    शीघ्र / जल्दी  

    Quickly / Fast

    काव्यांश आधारित प्रश्न (Extract-Based Questions)

    Extract 1

    "नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।। सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।"  

    Q1. 'नाथ संभुधनु भंजनिहारा' यह कथन किसने, किससे कहा? (A) लक्ष्मण ने राम से (B) जनक ने विश्वामित्र से (C) राम ने परशुराम से (D) परशुराम ने राम से

    उत्तर: (C) — श्रीराम ने परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए विनम्रतापूर्वक यह कथन कहा।

    (Lord Rama humbly said this to calm Parashuram's anger.)  


    Q2. परशुराम के अनुसार 'सेवक' कौन होता है? (A) जो धनुष तोड़ता है (B) जो सेवा का कार्य करता है (C) जो युद्ध करता है (D) जो मीठा बोलता है

    उत्तर: (B) — परशुराम कहते हैं कि सेवक वह है जो सेवा का कार्य करे (सेवकु सो जो करै सेवकाई)। (Parashuram says that a servant is one who does the work of serving.)  


    Q3. परशुराम ने शिव-धनुष तोड़ने वाले की तुलना किससे की है?

    उत्तर: परशुराम ने शिव-धनुष तोड़ने वाले की तुलना अपने परम शत्रु 'सहस्रबाहु' से की है।

    (Parashuram has compared the breaker of Shiva's bow to his arch-enemy 'Sahasrabahu'.)


    Q4. इन पंक्तियों में राम और परशुराम के स्वभाव का कौन-सा अंतर दिखाई देता है? उत्तर: इन पंक्तियों में श्रीराम का अत्यंत विनम्र, शांत और शीलवान स्वभाव दिखाई देता है, जबकि इसके विपरीत परशुराम का अत्यधिक क्रोधी और रौद्र स्वभाव झलकता है।

    (These lines show Lord Rama's extremely humble, calm, and modest nature, while in contrast, Parashuram's highly angry and fierce nature is reflected.)


    Extract 2

    "सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।। बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।। रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।"  

    Q1. परशुराम के वचनों को सुनकर लक्ष्मण ने कैसी प्रतिक्रिया दी? (A) वे डर कर छिप गए (B) वे क्रोधित होकर तलवार निकालने लगे (C) वे मुसकराए और व्यंग्यपूर्ण वचनों से उनका अपमान करने लगे (D) वे क्षमा माँगने लगे

    उत्तर: (C) — लक्ष्मण मुसकराते हुए व्यंग्य करने लगे कि बचपन में उन्होंने ऐसी बहुत सी धनुहियाँ तोड़ी हैं। (Lakshman smiled and mockingly said that they had broken many such small bows in childhood.)  


    Q2. 'भृगुकुलकेतू' शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है? (A) राम (B) लक्ष्मण (C) विश्वामित्र (D) परशुराम

    उत्तर: (D) — भृगु वंश के ध्वजस्वरूप मुनि परशुराम के लिए यह विशेषण प्रयुक्त हुआ है।

    (This adjective is used for Sage Parashuram, the flag-bearer of the Bhrigu lineage.)  


    Q3. लक्ष्मण ने परशुराम से क्या प्रश्न पूछा?

    उत्तर: लक्ष्मण ने परशुराम से पूछा कि बचपन में हमने अनेक धनुष तोड़े तब तो आपने क्रोध नहीं किया, फिर इसी एक धनुष से आपको इतनी ममता (लगाव) क्यों है?

    (Lakshman asked Parashuram that they broke many bows in childhood but he never got angry then, so why does he have so much affection for this particular bow?)   


    Q4. परशुराम ने लक्ष्मण की बातों का क्या उत्तर दिया?

    उत्तर: परशुराम ने क्रोधित होकर कहा कि हे राजपुत्र! काल के वश में होने के कारण तू सँभल कर नहीं बोल रहा है; यह सारे संसार में प्रसिद्ध शिवजी का धनुष है, कोई साधारण धनुही नहीं।

    (Angrily, Parashuram replied that O Prince! Being under the spell of death, you are not speaking carefully; this is Lord Shiva's world-renowned bow, not an ordinary small bow.)


    लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)


    प्र1. परशुराम का भयंकर रूप देखकर सभा में उपस्थित राजाओं और सीता की क्या मनःस्थिति हुई? (पात्र प्रेरणा) मुख्य बिंदु 1 (VP1): राजाओं में प्राणों का भय और खलबली। (Fear of losing lives and panic among kings).

    मुख्य बिंदु 2 (VP2): सीता की अत्यंत घबराहट (एक पल कल्प के समान बीतना)। (Sita's extreme anxiety (one moment passing like an era).

    उत्तर: मुनि परशुराम का भयानक (कराल) वेश देखकर सभी राजा अत्यंत भयभीत और व्याकुल हो गए। उन्हें अपनी जान का डर सताने लगा। सीता जी भी परशुराम का क्रोधी स्वभाव सुनकर इतना डर गईं कि उनके लिए चिंता का एक-एक पल कल्प (युग) के समान भारी बीतने लगा।

    (Seeing Sage Parashuram's terrifying form, all the kings became extremely terrified and restless. They started fearing for their lives. Sita also got so scared hearing of Parashuram's angry nature that each moment of anxiety felt as heavy as a Kalpa (an era) to her.)  


    प्र2. शिव-धनुष के टूटने पर परशुराम ने राजा जनक को क्या चेतावनी दी?

    (घटना का महत्व) मुख्य बिंदु 1 (VP1): धनुष तोड़ने वाले का नाम तुरंत बताने का आदेश। (Order to immediately reveal the name of the bow breaker).

    मुख्य बिंदु 2 (VP2): राज्य को उलट देने (नष्ट करने) की भयानक धमकी। (Terrible threat to overturn (destroy) the kingdom).

    उत्तर: क्रोध में अंधे होकर परशुराम ने राजा जनक को कठोर चेतावनी दी कि हे मूर्ख जनक! जल्दी बता यह धनुष किसने तोड़ा है। यदि तूने अभी उसका नाम नहीं बताया, तो जहाँ तक तेरा राज्य है, मैं आज ही उस पूरी पृथ्वी को उलट (नष्ट कर) दूँगा। (Blinded by anger, Parashuram gave a harsh warning to King Janaka, O foolish Janaka! Tell me quickly who broke this bow. If you don't reveal his name right now, I will overturn (destroy) the entire earth today as far as your kingdom extends.)


    प्र3. 'अरध निमेष कलप सम बीता'—तुलसीदास ने ऐसा किसके संदर्भ में और क्यों कहा है? (भाषा/शिल्प) मुख्य बिंदु 1 (VP1): सीता माता की चिंता और भय का वर्णन। (Description of Mother Sita's anxiety and fear).

    मुख्य बिंदु 2 (VP2): अतिशयोक्ति अलंकार का सजीव प्रयोग। (Vivid use of hyperbole (Atishayokti Alankar).

    उत्तर: तुलसीदास ने यह पंक्ति सीता जी के संदर्भ में कही है। शिव-धनुष टूटने के बाद जब क्रोधी परशुराम सभा में आए, तो सीता जी को राम की सुरक्षा की चिंता सताने लगी। उनके हृदय में इतना भय था कि उनका आधा पल भी एक कल्प (लाखों वर्ष) के समान मुश्किल से बीत रहा था। (Tulsidas has said this line in the context of Mother Sita. After Shiva's bow was broken, when the angry Parashuram entered the assembly, Sita became worried about Rama's safety. There was so much fear in her heart that even half a moment was passing with the difficulty of a Kalpa (millions of years).


    प्र4. परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए श्रीराम ने क्या युक्ति अपनाई? (अनुमान/निष्कर्ष) मुख्य बिंदु 1 (VP1): स्वयं को परशुराम का 'दास' घोषित करना। (Declaring himself as Parashuram's 'servant').

    मुख्य बिंदु 2 (VP2): अत्यंत शील और मर्यादापूर्ण वचनों का प्रयोग। (Use of extremely modest and respectful words).

    उत्तर: श्रीराम ने परशुराम के अहंकार और क्रोध को शांत करने के लिए विनय का मार्ग अपनाया। उन्होंने अत्यंत मीठे और शांत शब्दों में कहा कि इस शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई 'दास' होगा। स्वयं को अपराधी की जगह सेवक मानकर राम ने अपनी मर्यादा और धीरता का परिचय दिया। (To calm Parashuram's ego and anger, Lord Rama adopted the path of humility. In very sweet and calm words, he said that the breaker of this Shiva's bow must be one of your 'servants'. By considering himself a servant instead of an offender, Rama displayed his modesty and composure.)

     

    प्र5. लक्ष्मण ने शिव-धनुष की तुलना बचपन की धनुहियों से क्यों की?

    (मूल्यपरक) मुख्य बिंदु 1 (VP1): परशुराम के क्रोध को अनुचित और हास्यास्पद ठहराना। (Deeming Parashuram's anger inappropriate and ridiculous).

    मुख्य बिंदु 2 (VP2): पुराने धनुष के टूटने पर इतना विवाद व्यर्थ बताना। (Showing that such a dispute over an old bow breaking is useless).

    उत्तर: लक्ष्मण निडर और तर्कशील थे। उन्होंने परशुराम के क्रोध को व्यर्थ साबित करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि लड़कपन में हमने खेलते हुए अनेक छोटी धनुहियाँ तोड़ीं, तब तो आपको कभी गुस्सा नहीं आया। लक्ष्मण का उद्देश्य यह दिखाना था कि एक पुराने धनुष के टूटने पर इतना भयानक क्रोध करना मुनियों को शोभा नहीं देता।

    (Lakshman was fearless and logical. He resorted to sarcasm to prove Parashuram's anger useless. He said that in childhood they broke many small bows while playing, but he never got angry then. Lakshman's purpose was to show that such terrible anger over the breaking of an old bow does not suit a sage.)


    दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)


    प्र1. 'राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद' के आधार पर राम और लक्ष्मण के स्वभाव की तुलनात्मक विवेचना कीजिए। (चरित्र चित्रण) मुख्य बिंदु 1 (VP1): राम का स्वभाव: विनम्र, शांत, धीर और मर्यादा पुरुषोत्तम। (Rama's nature: Humble, calm, patient, and ideal man).

    मुख्य बिंदु 2 (VP2): लक्ष्मण का स्वभाव: निडर, उग्र, तर्कशील और व्यंग्यकार। (Lakshman's nature: Fearless, aggressive, logical, and sarcastic).

    मुख्य बिंदु 3 (VP3): गुरुजनों के प्रति सम्मान (राम का दास भाव)। (Respect for elders (Rama's servant-like attitude).

    मुख्य बिंदु 4 (VP4): अन्याय का मुखर विरोध (लक्ष्मण की वाक्पटुता)। (Vocal opposition to injustice (Lakshman's eloquence).  


    उत्तर: तुलसीदास ने इस संवाद में राम और लक्ष्मण के चरित्रों का अत्यंत विपरीत किंतु पूरक (Complementary) चित्रण किया है।  

    श्रीराम का स्वभाव जल के समान शीतल और मर्यादापूर्ण है। जब परशुराम क्रोध में भरकर सभा में आते हैं, तो श्रीराम अपना मानसिक और भावनात्मक संतुलन नहीं खोते (हृदयं न हरषु बिषादु)। वे स्वयं को अपराधी न कहकर परशुराम का 'दास' कहते हैं, जो उनके उच्च संस्कारों और शील को दर्शाता है।  

    इसके विपरीत, लक्ष्मण का स्वभाव अग्नि के समान उग्र और तेज़ है। वे परशुराम के क्रोध से बिल्कुल भयभीत नहीं होते, बल्कि व्यंग्य और तर्कों के बाणों से उनके क्रोध को और भड़काते हैं। वे मुसकराते हुए परशुराम की धमकियों का मज़ाक उड़ाते हैं और कहते हैं कि बचपन में हमने बहुत सी धनुहियाँ तोड़ी हैं। निष्कर्षतः, जहाँ श्रीराम अपनी विनम्रता से स्थिति को सँभालते हैं, वहीं लक्ष्मण अपनी निडरता से अन्याय और अकारण क्रोध का मुखर विरोध करते हैं।


    (Tulsidas has depicted the characters of Ram and Lakshman as extremely contrasting yet complementary in this dialogue.  

    Lord Rama's nature is as cool as water and full of modesty. When Parashuram enters the assembly in a rage, Rama does not lose his mental and emotional balance (having neither joy nor sorrow). Instead of calling himself an offender, he calls himself Parashuram's 'servant', which reflects his high values and humility.  

    In contrast, Lakshman's nature is fierce and fiery like fire. He is not at all intimidated by Parashuram's anger; rather, he incites it further with arrows of sarcasm and logic. He mockingly smiles at Parashuram's threats and says they broke many bows in childhood. In conclusion, while Lord Rama handles the situation with his humility, Lakshman vocally opposes injustice and unprovoked anger with his fearlessness.)


    प्र2. परशुराम के क्रोध के क्या कारण थे? उनके रौद्र रूप का सभा में उपस्थित राजाओं और वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ा? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

    (केंद्रीय भाव एवं संदेश) मुख्य बिंदु 1 (VP1): आराध्य देव (शिव) के धनुष का खंडित होना। (The breaking of the bow of his revered deity (Shiva).

    मुख्य बिंदु 2 (VP2): अपराधी द्वारा स्वयं सामने न आना। (The offender not presenting himself immediately).

    मुख्य बिंदु 3 (VP3): राजाओं में भयंकर भय और व्याकुलता फैलना। (Spread of terrible fear and restlessness among the kings).

    मुख्य बिंदु 4 (VP4): सम्पूर्ण वातावरण का त्रास (भय) से भर जाना। (The entire atmosphere filling with terror (fear).  


    उत्तर: मुनि परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे। सीता स्वयंवर में जब श्रीराम ने शिव-धनुष तोड़ा, तो उसकी टंकार सुनकर परशुराम को अपने आराध्य देव के अपमान का बोध हुआ। इसी कारण वे अत्यंत क्रोधित होकर (अति रिस) सभा में दौड़े आए। पृथ्वी पर अपने गुरु के धनुष के टुकड़े (चापखंड) देखकर उनका क्रोध सीमा पार कर गया। इसके अलावा, जब किसी ने आगे आकर अपराध स्वीकार नहीं किया, तो उनका गुस्सा और भड़क गया और उन्होंने पूरी पृथ्वी पलटने की धमकी दे डाली।  

    परशुराम के इस भयानक (कराल) वेश और रौद्र रूप का सभा पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। वहाँ उपस्थित सभी राजा, जो कुछ समय पहले स्वयंवर में अपनी वीरता दिखा रहे थे, अब भय के मारे काँपने लगे और उठ-उठकर परशुराम को दंडवत प्रणाम करने लगे। यहाँ तक कि कुटिल राजा भी डर के मारे चुप हो गए। देवता, मुनि, नगर के नर-नारी और सीता की माता भी इस भारी त्रास (भय) से चिंतित हो उठे कि अब क्या अनर्थ होगा। परशुराम का क्रोध पूरे वातावरण को दहशत से भर देता है।


    (Sage Parashuram was a supreme devotee of Lord Shiva. When Lord Rama broke Shiva's bow at Sita's Swayamvar, hearing its twang, Parashuram felt the insult of his revered deity. Because of this, he came rushing into the assembly in extreme anger. Seeing the pieces of his Guru's bow (Chapkhand) on the earth, his anger crossed all limits. Moreover, when no one stepped forward to confess the crime, his anger flared up further and he threatened to overturn the entire earth.  

    This terrifying (Karala) attire and fierce form of Parashuram had a very bad impact on the assembly. All the kings present there, who were showing off their bravery in the Swayamvar a while ago, now started shivering with fear and got up to bow down to Parashuram. Even the cunning kings fell silent out of fear. Gods, sages, men and women of the city, and Sita's mother also became worried by this heavy terror (fear) about what disaster would happen now. Parashuram's anger fills the entire atmosphere with panic.)


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