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    10. णमो अरिहन्ताणम् - Namo Arihantanam - Class 9 - Sharada

    • 2 days ago
    • 17 min read

    SECTION 1 — पाठ परिचय

    विवरण

    जानकारी

    पाठ का नाम:

    णमो अरिहन्ताणम् (Ṇamo Arihantāṇam)

    विधा:

    गद्य पाठ — जीवनी / ऐतिहासिक कथा

    स्रोत/ग्रंथ:

    सङ्कलितः (जैन-परम्परा एवं ग्रन्थों पर आधारित)

    लेखक/कवि:

    अज्ञात (NCERT सङ्कलितः)

    पाठ्यपुस्तक:

    शारदा, NCERT कक्षा 9 संस्कृत, 2026-27

    परीक्षा खंड:

    खंड-घ (साहित्य) — 25-30 अंक


    SECTION 2 — लेखक/स्रोत परिचय


    SANSKRIT:

    अयं पाठः जैनधर्मस्य प्रथमतीर्थङ्करस्य भगवतः ऋषभदेवस्य (आदिनाथस्य) जीवने आधारितः अस्ति। जैनपरम्परायाः अनुसारं सः अस्य युगस्य प्रथमः सम्राट्, प्रथमः तपस्वी, प्रथमः तीर्थङ्करश्च आसीत्। अस्मिन् पाठे तस्य लोकमङ्गलकार्याणि (कृषि-वाणिज्य-शिल्पादीनां शिक्षा), वैराग्यम्, केवलज्ञानप्राप्तिः, चतुर्विंशतितीर्थङ्कराणां परिचयश्च वर्णितः अस्ति।

    हिंदी अनुवाद:

    यह पाठ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) के जीवन पर आधारित है। जैन परंपरा के अनुसार, वे इस युग के पहले सम्राट, पहले तपस्वी और पहले तीर्थंकर थे। इस पाठ में उनके लोक-कल्याणकारी कार्यों (जैसे खेती, व्यापार और शिल्प सिखाना), उनके वैराग्य, केवलज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति और चौबीस तीर्थंकरों का परिचय दिया गया है।

    English:

    This chapter is based on the life of Lord Rishabhadeva (Adinath), the first Tirthankara of Jainism. According to Jain tradition, he was the first emperor, the first ascetic, and the first Tirthankara of this era. The text describes his public welfare activities (teaching agriculture, trade, arts), his renunciation, attainment of omniscience (Kevalgyan), and provides an introduction to the twenty-four Tirthankaras.

    EXAM TIP:परीक्षा में लेखक/स्रोत परिचय 5 अंकों के दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में पूछा जाता है।(Focus on the biographical nature of the text, emphasizing Lord Rishabhadeva's role as an emperor and the first Tirthankara.)

    SECTION 3 — मूल पाठ


    १। आसीत् युगानाम् आरम्भे प्रजानां प्रियः नाभिनामकः कश्चन महाराजः । सः राजनीतौ युद्धतन्त्रे प्रशासनादिषु च समर्थः ।

    २। तस्य पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती करुणाशालिनी च। तयोः एव प्रियपुत्रः ऋषभः ।

    ३। ऋषभः सर्वगुणसम्पन्नः, अधीतविद्यः, राजनीतिज्ञश्च आसीत्। यौवनेन विलसन्तं तं राजकुमारं वीक्ष्य नाभिः तस्मै राज्यभारं समर्पयितुम् अचिन्तयत्।

    ४। अथैकदा समाजे दुर्भिक्षादयः समस्याः समुदभवन्। जनेषु परस्परं विद्वेषादयः भावनाः आविरभवन्।

    ५। तदा नाभिः "अयं कालः ऋषभस्य राजनीतेः परीक्षार्थं सुयोग्यः" इति मन्यमानः तस्मै राज्यं समर्पितवान्।

    ६। ऋषभः यदा राजा अभवत् तदा सः आदौ जनानां समस्याः काः, दुर्भिक्षस्य कारणं किं, जनेषु कुतः परस्परं विद्वेषः, समस्यानां समाधानोपायाः के इत्यादिषु विषयेषु चिन्तनं कृतवान् ।

    ७। तेन काचित् स्पष्टकल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति इति।

    ८। अतः सः मूलसमस्यानां निवारणाय 'असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्या, शिल्प' इति षट् कर्माणि उपदिष्टवान्।

    ९। जनान् कृषि-वाणिज्य-शिल्प-कलादीनि शिक्षितवान्। पूर्वं भूमिः अकृष्टपच्या आसीत्, तेन कृषिकार्यस्य आरम्भः कृतः।

    १०। एवं सः जनानाम् आजीविकायाः प्रबन्धनं कृत्वा समाजे शान्तिं सुव्यवस्थां च स्थापितवान्।

    ११। कालान्तरे ऋषभस्य मनसि वैराग्यम् उत्पन्नम्। सः स्वज्येष्ठपुत्राय भरताय राज्यं दत्त्वा तपसे वनं गतः। (तस्य भरतस्य नाम्ना एव अस्य देशस्य नाम 'भारतवर्षम्' इति प्रसिद्धम्)।

    १२। वने सः दिगम्बरः भूत्वा कठोरं तपः अकरोत्। तस्य तपसा तस्मै 'केवलज्ञानम्' (सर्वोच्चज्ञानम्) प्राप्तम्।

    १३। सः रागादिदोषान् जितवान्, अतः 'जिनः' (विजेता) इति, तथा च संसारसागरं तर्तुं तीर्थस्य (धर्मस्य) रचनां कृतवान् अतः 'तीर्थङ्करः' इति च ख्यातः । स एव जैनधर्मस्य प्रथमः तीर्थङ्करः 'आदिनाथः' इति उच्यते।

    १४। जैनधर्मे चतुर्विंशतिः (२४) तीर्थङ्कराः अभवन्। तेषु अन्तिमः भगवान् महावीरः (वर्धमानः) आसीत्।

    १५। सः पञ्चमहाव्रतानां (अहिंसा, सत्यम्, अस्तेयम्, ब्रह्मचर्यम्, अपरिग्रहः) प्रचारकः आसीत्।

    १६। सः जनान् अहिंसायाः, अपरिग्रहस्य, संयमस्य च महत्त्वम् उपदिष्टवान्। तस्य उपदेशाः अद्यापि प्रासङ्गिकाः सन्ति। "णमो अरिहन्ताणम्" इति मन्त्रेण तेभ्यः जिनेभ्यः नमस्कारः क्रियते।


    SECTION 4 — अन्वय


    वाक्यम् ३:

    मूल: यौवनेन विलसन्तं तं राजकुमारं वीक्ष्य नाभिः तस्मै राज्यभारं समर्पयितुम् अचिन्तयत्।

    अन्वयः: नाभिः यौवनेन विलसन्तं तं राजकुमारं वीक्ष्य तस्मै राज्यभारं समर्पयितुम् अचिन्तयत्।

    Hindi note: कर्ता 'नाभिः' को वाक्य के आरम्भ में लाया गया है।

    वाक्यम् ७:

    मूल: तेन काचित् स्पष्टकल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति इति।

    अन्वयः: जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, च प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः इति एतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति यत् काचित् स्पष्टकल्पना तेन प्राप्ता।

    वाक्यम् ११:

    मूल: सः स्वज्येष्ठपुत्राय भरताय राज्यं दत्त्वा तपसे वनं गतः।

    अन्वयः: सः स्वज्येष्ठपुत्राय भरताय राज्यं दत्त्वा तपसे वनं गतः।

    (अन्वयः मूल वाक्य के समान है)

    वाक्यम् १३:

    मूल: सः रागादिदोषान् जितवान्, अतः 'जिनः' (विजेता) इति, तथा च संसारसागरं तर्तुं तीर्थस्य (धर्मस्य) रचनां कृतवान् अतः 'तीर्थङ्करः' इति च ख्यातः ।

    अन्वयः: सः रागादिदोषान् जितवान्, अतः 'जिनः' (विजेता) इति [ख्यातः], तथा च संसारसागरं तर्तुं तीर्थस्य (धर्मस्य) रचनां कृतवान् अतः 'तीर्थङ्करः' इति च ख्यातः।

    EXAM TIP:CBSE में 'अन्वयं पूरयत' प्रश्न के लिए सही Subject → Object → Verb क्रम अनिवार्य है।

    SECTION 5 — शब्दार्थ

    संस्कृत पद

    हिंदी अर्थ

    English Meaning

    दुर्भिक्षादयः

    अकाल आदि

    Famines etc.

    आविरभवन्

    प्रकट हुए / उत्पन्न हुए

    Appeared / Emerged

    अधीतविद्यः

    जिसने विद्याएँ पढ़ ली हों

    Well-educated

    विलसन्तम्

    सुशोभित / चमकते हुए

    Shining / Youthful

    अकृष्टपच्या

    बिना जोते पकने वाली (भूमि)

    Yielding without ploughing

    आजीविकायाः

    रोज़गार की

    Of livelihood

    वैराग्यम्

    सांसारिक मोह से मुक्ति

    Detachment / Renunciation

    दिगम्बरः

    दिशाएँ ही जिसके वस्त्र हों

    Sky-clad / Naked ascetic

    केवलज्ञानम्

    सर्वोच्च ज्ञान / सर्वज्ञता

    Omniscience

    रागादिदोषान्

    मोह, क्रोध आदि दोषों को

    Flaws like attachment

    जिनः

    जीतने वाला (विजेता)

    Conqueror / Victor

    तीर्थङ्करः

    धर्मरूपी तीर्थ बनाने वाला

    Ford-maker (Spiritual guide)

    अपरिग्रहः

    आवश्यकता से अधिक धन न रखना

    Non-possessiveness

    अस्तेयम्

    चोरी न करना

    Non-stealing


    SECTION 6 — हिंदी अनुवाद


    १. युगों की शुरुआत में प्रजा के बहुत प्यारे नाभि नाम के एक महाराज थे। वे राजनीति, युद्ध-कला और प्रशासन आदि में बहुत कुशल थे।

    २. उनकी पत्नी मरुदेवी बहुत बुद्धिमती और दयालु थीं। उन्हीं दोनों के प्रिय पुत्र ऋषभ थे।

    ३. ऋषभ सभी गुणों से संपन्न, बहुत पढ़े-लिखे और राजनीति के जानकार थे। युवावस्था से सुशोभित उस राजकुमार को देखकर महाराज नाभि ने उन्हें राज्य की ज़िम्मेदारी सौंपने का विचार किया।

    ४. एक बार समाज में अकाल (सूखा) आदि समस्याएँ उत्पन्न हो गईं। लोगों के बीच आपस में नफरत और द्वेष की भावनाएँ पैदा हो गईं।

    ५. तब महाराज नाभि ने यह माना कि "यही समय ऋषभ की राजनीति की परीक्षा के लिए सबसे सही है," और उन्होंने राज्य ऋषभ को सौंप दिया।

    ६. जब ऋषभ राजा बने, तब उन्होंने सबसे पहले इस बात पर विचार किया कि लोगों की समस्याएँ क्या हैं, अकाल का कारण क्या है, लोगों में आपस में द्वेष क्यों है, और इन समस्याओं को सुलझाने के उपाय क्या हैं।

    ७. उन्हें यह स्पष्ट समझ आ गया कि लोगों का आलस्य, खेती के काम में कमी, और प्रजा में कुछ भी उत्पादन (पैदा) करने की क्षमता का न होना ही मूल समस्याएँ हैं।

    ८. इसलिए, उन्होंने इन मूल समस्याओं को दूर करने के लिए 'असि (हथियार), मसि (लिखाई), कृषि (खेती), वाणिज्य (व्यापार), विद्या, और शिल्प'—इन छः कर्मों का उपदेश दिया।

    ९. उन्होंने लोगों को खेती, व्यापार, शिल्प और कलाएँ सिखाईं। पहले ज़मीन बिना जोते ही फसल दे देती थी, लेकिन उन्होंने व्यवस्थित रूप से खेती का काम शुरू करवाया।

    १०. इस प्रकार उन्होंने लोगों के रोज़गार का प्रबंध करके समाज में शांति और अच्छी व्यवस्था स्थापित की।

    ११. समय बीतने पर ऋषभ के मन में वैराग्य (संसार से मोहभंग) पैदा हो गया। वे अपने बड़े बेटे भरत को राज्य सौंपकर तपस्या करने के लिए जंगल चले गए। (उन्हीं भरत के नाम पर हमारे इस देश का नाम 'भारतवर्ष' प्रसिद्ध हुआ है)।

    १२. जंगल में उन्होंने दिगंबर (वस्त्रहीन) होकर कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से उन्हें 'केवलज्ञान' (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त हुआ।

    १३. उन्होंने मोह, क्रोध आदि दोषों को जीत लिया था, इसलिए उन्हें 'जिन' (विजेता) कहा गया, और संसार रूपी सागर को पार करने के लिए धर्म रूपी तीर्थ की रचना की, इसलिए उन्हें 'तीर्थंकर' के रूप में प्रसिद्धि मिली। वे ही जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर 'आदिनाथ' कहलाते हैं।

    १४. जैन धर्म में चौबीस (24) तीर्थंकर हुए हैं। उनमें सबसे अंतिम भगवान महावीर (वर्धमान) थे।

    १५. वे पाँच महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) के मुख्य प्रचारक थे।

    १६. उन्होंने लोगों को अहिंसा, चीज़ों का संग्रह न करने (अपरिग्रह) और संयम का महत्व सिखाया। उनके उपदेश आज भी प्रासंगिक (उपयोगी) हैं। "णमो अरिहन्ताणम्" मन्त्र के द्वारा उन्हीं जीतने वाले भगवानों को नमस्कार किया जाता है।


    SECTION 7 — English Translation


    1. In the beginning of the eras, there was a king named Nabhi who was very dear to his subjects. He was capable in politics, warfare, and administration.

    2. His wife, Marudevi, was intelligent and compassionate. Their beloved son was Rishabha.

    3. Rishabha was endowed with all virtues, highly educated, and a political expert. Seeing the young and radiant prince, King Nabhi thought of handing over the responsibility of the kingdom to him.

    4. Once, problems like famines emerged in society. Feelings of hatred and enmity appeared among the people.

    5. Then Nabhi, considering that "this is the perfect time to test Rishabha's political skills," handed the kingdom over to him.

    6. When Rishabha became king, he first contemplated on what the people's problems were, the cause of the famine, why there was mutual hatred, and what the solutions to these problems could be.

    7. He gained a clear understanding that the people's laziness, a decline in agricultural work, and a lack of productive capacity among the subjects were the root problems.

    8. Therefore, to eradicate these root problems, he taught six professions: 'Asi (swordsmanship), Masi (writing), Krishi (agriculture), Vanijya (commerce), Vidya (knowledge), and Shilpa (arts and crafts)'.

    9. He taught people agriculture, trade, crafts, and arts. Previously, the land yielded crops without being ploughed; he initiated systematic agricultural work.

    10. Thus, by managing the livelihood of the people, he established peace and good order in society.

    11. Over time, detachment (Vairagya) arose in Rishabha's mind. He handed over the kingdom to his eldest son, Bharata, and went to the forest to perform penance. (It is by the name of this Bharata that our country is famously known as 'Bharatavarsha').

    12. In the forest, he became a Digambara (sky-clad/naked ascetic) and performed severe penance. Through his penance, he attained 'Kevalgyan' (Omniscience).

    13. He conquered flaws like attachment, hence he was called 'Jina' (the victor), and because he created a 'Tirtha' (a path/religion) to cross the ocean of worldly life, he became known as 'Tirthankara'. He is referred to as 'Adinath', the first Tirthankara of Jainism.

    14. There have been twenty-four (24) Tirthankaras in Jainism. The last among them was Lord Mahavira (Vardhamana).

    15. He was the propagator of the Five Great Vows (Panchamahavratas: Non-violence, Truth, Non-stealing, Celibacy, and Non-possessiveness).

    16. He taught people the importance of non-violence, non-possessiveness, and self-restraint. His teachings are relevant even today. Through the mantra "Namo Arihantanam," salutations are offered to these spiritual victors.


    SECTION 8 — सारांश


    HINDI:

    प्रस्तुत पाठ "णमो अरिहन्ताणम्" जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) के जीवन और कार्यों पर प्रकाश डालता है। महाराज नाभि और महारानी मरुदेवी के पुत्र ऋषभदेव एक अत्यंत गुणवान और बुद्धिमान राजकुमार थे। जब समाज में अकाल और द्वेष जैसी समस्याएँ फैलीं, तब उन्हें राज्य सौंपा गया। राजा के रूप में उन्होंने लोगों की समस्याओं का गहराई से विश्लेषण किया और आलस्य को दूर करने के लिए कृषि, वाणिज्य, और शिल्प जैसे छह कर्मों की शिक्षा दी। उन्होंने समाज को व्यवस्थित कर आजीविका के साधन उपलब्ध कराए। बाद में, संसार से विरक्त होकर उन्होंने अपने पुत्र भरत (जिनके नाम पर 'भारत' पड़ा) को राज्य सौंप दिया और वन में कठोर तपस्या की। राग-द्वेष को जीतकर उन्होंने 'केवलज्ञान' प्राप्त किया और प्रथम तीर्थंकर बने। पाठ के अंत में चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर और उनके द्वारा दिए गए पाँच महाव्रतों (अहिंसा, सत्य आदि) के महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है।

    ENGLISH:

    The text "Namo Arihantanam" sheds light on the life and contributions of Lord Rishabhadeva (Adinath), the first Tirthankara of Jainism. Born to King Nabhi and Queen Marudevi, Rishabha was a virtuous and wise prince. When society faced famines and discord, he was made the king. As a ruler, he analyzed the root causes of the people's misery and taught them six practical professions—including agriculture, trade, and arts—to overcome laziness and build a self-sustaining society. Later in life, having developed detachment from worldly affairs, he passed the throne to his son Bharata (after whom 'Bharat' is named) and retired to the forest for rigorous penance. Conquering all earthly attachments, he attained omniscience (Kevalgyan) and became the first Tirthankara. The chapter concludes by highlighting the 24th Tirthankara, Lord Mahavira, and the enduring relevance of his Five Great Vows (Ahimsa, Truth, etc.).


    SECTION 9 — केंद्रीय भाव एवं मूल्य


    9A. विषय-वस्तु सारणी

    विषय

    पाठ में स्पष्टीकरण

    मुख्य विषय

    भगवान ऋषभदेव का जीवन, उनका कुशल प्रशासन और तीर्थंकर के रूप में उनकी आध्यात्मिक यात्रा। (The life, efficient administration, and spiritual journey of Lord Rishabhadeva.)

    सामाजिक प्रबन्धनम्

    अकाल और आलस्य को दूर करने के लिए कृषि और शिल्प की शिक्षा देना। (Teaching agriculture and arts to eradicate famine and laziness.)

    जैन-दर्शनम्

    पञ्चमहाव्रत (अहिंसा, अपरिग्रह आदि) और 'केवलज्ञान' की प्राप्ति। (The core Jain philosophies of non-violence, non-possessiveness, and omniscience.)


    9B. मानवीय एवं सांस्कृतिक मूल्य


    • लोककल्याणम् (समाज की भलाई / Public Welfare)

      • जनान् कृषि-वाणिज्य-शिल्प-कलादीनि शिक्षितवान्...

      • ऋषभदेव ने राजा बनकर केवल राजसुख नहीं भोगा, बल्कि जनता को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें रोज़गार और कलाएँ सिखाईं।

      • (Teaches the duty of a leader to empower the masses through skill development and employment.)

    • वैराग्यम् / त्यागः (संसार से मोहभंग / Detachment and Sacrifice)

      • सः स्वज्येष्ठपुत्राय भरताय राज्यं दत्त्वा तपसे वनं गतः।

      • एक महान राजा होने के बावजूद सब कुछ त्याग कर तपस्या का मार्ग अपनाना सांसारिक मोह से मुक्ति (वैराग्य) का सबसे बड़ा मूल्य है।

      • (Emphasizes that true peace lies in spiritual growth and detachment from materialistic power.)

    • अहिंसा एवं अपरिग्रहः (अहिंसा और संयम / Non-violence & Non-possessiveness)

      • सः जनान् अहिंसायाः, अपरिग्रहस्य, संयमस्य च महत्त्वम् उपदिष्टवान्।

      • भगवान महावीर के ये मूल्य सिखाते हैं कि हमें जीवों को कष्ट नहीं देना चाहिए और आवश्यकता से अधिक धन का लालच नहीं करना चाहिए।

      • (Promotes a peaceful, minimalist, and eco-friendly lifestyle by rejecting greed and violence.)

    EXAM TIP:मूल्यपरक प्रश्न 2-4 अंकों के लिए नियमित आते हैं।Always name the value in Sanskrit first (e.g., लोककल्याणम्, अहिंसा).

    SECTION 10 — पात्र परिचय (Character Sketches)


    १. ऋषभदेवः (Rishabhadeva / Adinath)

    SANSKRIT:

    भगवान् ऋषभदेवः जैनधर्मस्य प्रथमः तीर्थङ्करः आसीत्। सः नाभिमहाराजस्य पुत्रः एकः आदर्शः राजा च आसीत्। तस्य मुख्यगुणाः प्रशासकौशलम्, लोककल्याणभावना, वैराग्यं च सन्ति। पाठे सः अकालसमस्यां दूरयितुं जनान् कृषि-वाणिज्य-शिल्पादीन् शिक्षयति। अन्ते सः राज्यं त्यक्त्वा कठोरतपसा 'केवलज्ञानं' प्राप्नोति। प्रमाणम् - "सः रागादिदोषान् जितवान्, अतः 'जिनः' इति ख्यातः।"

    हिंदी अनुवाद:

    भगवान ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर थे। वे महाराज नाभि के पुत्र और एक आदर्श राजा थे। उनके मुख्य गुण कुशल प्रशासन, लोक-कल्याण की भावना और वैराग्य (त्याग) हैं। पाठ में वे अकाल की समस्या को दूर करने के लिए लोगों को खेती, व्यापार और शिल्प सिखाते हैं। अंत में वे राज्य छोड़कर कठोर तपस्या द्वारा सर्वोच्च ज्ञान (केवलज्ञान) प्राप्त करते हैं।

    English:

    Lord Rishabhadeva was the first Tirthankara of Jainism. He was the son of King Nabhi and an ideal ruler. His primary virtues include administrative prowess, dedication to public welfare, and extreme detachment. In the text, he teaches people agriculture, trade, and arts to solve the famine crisis. Ultimately, he renounces his kingdom, performs severe penance, and attains omniscience.


    २. नाभिमहाराजः (King Nabhi)

    SANSKRIT:

    नाभिमहाराजः युगानाम् आरम्भे प्रजानां प्रियः शासकः आसीत्। सः ऋषभदेवस्य पिता आसीत्। सः राजनीतौ युद्धतन्त्रे च समर्थः आसीत्। विपत्तिकाले सः योग्यं निर्णयं कृत्वा स्वपुत्राय राज्यं समर्पितवान्।

    हिंदी अनुवाद:

    महाराज नाभि युग के आरंभ में प्रजा के प्रिय शासक थे। वे ऋषभदेव के पिता थे। वे राजनीति और युद्ध-कला में कुशल थे। अकाल की विपत्ति के समय उन्होंने सही निर्णय लिया और अपने योग्य पुत्र को राज्य सौंप दिया।

    English:

    King Nabhi was a beloved ruler of his subjects at the beginning of the era. He was Rishabhadeva's father, well-versed in politics and warfare. During a crisis, he made the wise decision to hand over the kingdom to his capable son.


    SECTION 11 — गद्यांश आधारित प्रश्न


    गद्यांशः १

    ऋषभः यदा राजा अभवत् तदा सः आदौ जनानां समस्याः काः, दुर्भिक्षस्य कारणं किं, जनेषु कुतः परस्परं विद्वेषः, समस्यानां समाधानोपायाः के इत्यादिषु विषयेषु चिन्तनं कृतवान् । तेन काचित् स्पष्टकल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति इति। अतः सः मूलसमस्यानां निवारणाय 'असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्या, शिल्प' इति षट् कर्माणि उपदिष्टवान्। जनान् कृषि-वाणिज्य-शिल्प-कलादीनि शिक्षितवान्।


    प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark):

    मूलसमस्यानां निवारणाय ऋषभः कति कर्माणि उपदिष्टवान्?

    (क) पञ्च (ख) षट्

    (ग) सप्त (घ) दश

    उत्तरम्: (ख)

    हिंदी: गद्यांश के अनुसार, ऋषभदेव ने समस्याओं को दूर करने के लिए छह (षट्) कर्मों (असि, मसि, कृषि आदि) का उपदेश दिया।

    English: According to the text, Rishabhadeva taught six (shat) professions to eradicate the root problems.


    प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark):

    मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत —

    [ मूलसमस्यानां / उत्पादनक्षमतायाः / कृषिकार्ये ]

    प्रजासु _______ अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति।

    उत्तरम्: उत्पादनक्षमतायाः

    हिंदी: प्रजा में 'उत्पादन क्षमता का' (उत्पादनक्षमतायाः) अभाव होना एक मूल समस्या थी।

    English: The lack of 'productive capacity' (Utpadanakshamatayah) among the subjects was a root problem.


    प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark):

    'दुर्भिक्षस्य' इति पदस्य अर्थः अस्ति —

    (क) जलस्य (ख) अकालस्य

    (ग) युद्धस्य (घ) रोगस्य

    उत्तरम्: (ख)

    हिंदी: दुर्भिक्ष का अर्थ है अकाल (famine / सूखा)।

    English: Durbhikshasya means 'of the famine'.


    प्र.(iv) — प्रश्ननिर्माणम् (1 mark):

    अधोलिखितवाक्ये रेखाङ्कितपदम् आश्रित्य प्रश्नं रचयत —

    ऋषभः यदा राजा अभवत् तदा चिन्तनं कृतवान्।

    उत्तरम्: कः यदा राजा अभवत् तदा चिन्तनं कृतवान्?

    हिंदी: 'ऋषभः' पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन है, अतः 'कः' (कौन) का प्रयोग होगा।

    English: 'Rishabhah' is a masculine subject, so 'Kah' is used to form the question.


    गद्यांशः २

    कालान्तरे ऋषभस्य मनसि वैराग्यम् उत्पन्नम्। सः स्वज्येष्ठपुत्राय भरताय राज्यं दत्त्वा तपसे वनं गतः। (तस्य भरतस्य नाम्ना एव अस्य देशस्य नाम 'भारतवर्षम्' इति प्रसिद्धम्)। वने सः दिगम्बरः भूत्वा कठोरं तपः अकरोत्। तस्य तपसा तस्मै 'केवलज्ञानम्' (सर्वोच्चज्ञानम्) प्राप्तम्। सः रागादिदोषान् जितवान्, अतः 'जिनः' (विजेता) इति, तथा च संसारसागरं तर्तुं तीर्थस्य (धर्मस्य) रचनां कृतवान् अतः 'तीर्थङ्करः' इति च ख्यातः । स एव जैनधर्मस्य प्रथमः तीर्थङ्करः 'आदिनाथः' इति उच्यते।


    प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark):

    ऋषभः स्वज्येष्ठपुत्राय राज्यं दत्त्वा कुत्र गतः?

    (क) नगरम् (ख) विदेशम्

    (ग) वनम् (घ) मन्दिरम्

    उत्तरम्: (ग)

    हिंदी: गद्यांश में लिखा है कि राज्य देकर वे तपस्या के लिए वन (जंगल) चले गए।

    English: The passage states that after handing over the kingdom, he went to the forest (Vanam).


    प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark):

    मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत —

    [ केवलज्ञानम् / वैराग्यम् / दिगम्बरः ]

    कालान्तरे ऋषभस्य मनसि _______ उत्पन्नम्।

    उत्तरम्: वैराग्यम्

    हिंदी: समय बीतने पर ऋषभ के मन में 'वैराग्य' (मोहभंग) उत्पन्न हो गया।

    English: Over time, 'detachment' (Vairagyam) arose in Rishabha's mind.


    प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark):

    'जिनः' इति पदस्य अर्थः अस्ति —

    (क) पराजितः (ख) विजेता

    (ग) तपस्वी (घ) मूर्खः

    उत्तरम्: (ख)

    हिंदी: जिनः का अर्थ है 'जीतने वाला' या 'विजेता' (जिसने मोह-क्रोध को जीत लिया हो)।

    English: Jinah means 'the conqueror' or victor.


    प्र.(iv) — प्रश्ननिर्माणम् (1 mark):

    अधोलिखितवाक्ये रेखाङ्कितपदम् आश्रित्य प्रश्नं रचयत —

    तस्य तपसा तस्मै केवलज्ञानम् प्राप्तम्।

    उत्तरम्: तस्य केन तस्मै केवलज्ञानम् प्राप्तम्?

    हिंदी: 'तपसा' तृतीया विभक्ति एकवचन है (किसके द्वारा?), अतः 'केन' का प्रयोग होगा।

    English: 'Tapasa' is instrumental singular, so 'Kena' (by what) is used.


    SECTION 12 — लघु उत्तरीय प्रश्न (3 Marks)


    प्र१. नाभिः ऋषभदेवाय राज्यभारं किमर्थं समर्पितवान्?

    मूल बिंदु 1 (VP1): समाजे दुर्भिक्षादयः समस्याः आसन् (Famine and problems in society)

    मूल बिंदु 2 (VP2): राजनीतेः परीक्षार्थं सुयोग्यः कालः (Perfect time to test his political skills)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    यदा समाजे दुर्भिक्षादयः समस्याः समुदभवन् तथा च जनेषु परस्परं विद्वेषः आसीत्, तदा नाभिः अचिन्तयत् यत् "अयं कालः ऋषभस्य राजनीतेः परीक्षार्थं सुयोग्यः अस्ति।" इति मन्यमानः सः स्वपुत्राय ऋषभदेवाय राज्यभारं समर्पितवान्।

    हिंदी अनुवाद:

    जब समाज में अकाल आदि समस्याएँ पैदा हो गईं और लोगों के बीच आपस में नफरत फैल गई, तब महाराज नाभि ने सोचा कि "यही समय ऋषभ की राजनीति की परीक्षा के लिए सबसे सही है।" ऐसा मानकर उन्होंने अपने पुत्र ऋषभदेव को राज्य की ज़िम्मेदारी सौंप दी।

    English:

    When problems like famine emerged in society and mutual hatred spread among the people, King Nabhi thought, "This is the perfect time to test Rishabha's political skills." With this in mind, he handed over the responsibility of the kingdom to his son, Rishabhadeva.


    प्र२. ऋषभः जनेभ्यः कानि कर्माणि उपदिष्टवान्?

    मूल बिंदु 1 (VP1): षट् कर्माणि उपदिष्टवान् (He taught six professions)

    मूल बिंदु 2 (VP2): असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्या, शिल्प (Swordsmanship, writing, agriculture, trade, knowledge, arts)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    समाजस्य मूलसमस्यानां (आलस्यस्य दुर्भिक्षस्य च) निवारणाय ऋषभः जनेभ्यः षट् कर्माणि उपदिष्टवान्। तानि सन्ति — असि (शस्त्रविद्या), मसि (लेखनम्), कृषिः (कृषिकार्यम्), वाणिज्यम् (व्यापारः), विद्या, शिल्पम् (कला) च।

    हिंदी अनुवाद:

    समाज की मूल समस्याओं (जैसे आलस्य और अकाल) को दूर करने के लिए ऋषभदेव ने लोगों को छह कर्मों (कार्यों) का उपदेश दिया। वे हैं — असि (हथियार चलाना), मसि (लिखाई/पढ़ाई), कृषि (खेती), वाणिज्य (व्यापार), विद्या, और शिल्प (कला-कारीगरी)।

    English:

    To eradicate the root problems of society (like laziness and famine), Rishabhadeva taught the people six professions. They are — Asi (swordsmanship), Masi (writing), Krishi (agriculture), Vanijya (commerce), Vidya (knowledge), and Shilpa (arts and crafts).


    प्र३. ऋषभः 'जिनः' 'तीर्थङ्करः' च कथं ख्यातः?

    मूल बिंदु 1 (VP1): रागादिदोषान् जितवान् अतः 'जिनः' (Conquered flaws, hence Jina)

    मूल बिंदु 2 (VP2): संसारसागरं तर्तुं तीर्थस्य रचनां कृतवान् अतः 'तीर्थङ्करः' (Created a path to cross samsara, hence Tirthankara)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    कठोरतपसा यदा ऋषभः रागादिदोषान् (मोह-क्रोधादीन्) पूर्णतया जितवान्, तदा सः 'जिनः' (विजेता) इति ख्यातः अभवत्। तथा च, जनान् संसारसागरं तर्तुं सः यदा तीर्थस्य (धर्मस्य) रचनां कृतवान्, तदा सः 'तीर्थङ्करः' इति ख्यातः जातः।

    हिंदी अनुवाद:

    कठोर तपस्या के द्वारा जब ऋषभ ने राग-द्वेष (मोह, क्रोध आदि) दोषों को पूरी तरह जीत लिया, तब वे 'जिन' (विजेता) कहलाए। और, लोगों को संसार रूपी सागर पार कराने के लिए जब उन्होंने 'तीर्थ' (धर्म के मार्ग) की रचना की, तब वे 'तीर्थंकर' के रूप में प्रसिद्ध हुए।

    English:

    When Rishabha completely conquered flaws like attachment and anger through severe penance, he became known as 'Jina' (the victor). Furthermore, when he created a 'Tirtha' (a path of Dharma) to help people cross the ocean of worldly life, he became known as a 'Tirthankara' (Ford-maker).


    प्र४. भगवान् महावीरः केषां व्रतानां प्रचारकः आसीत्?

    मूल बिंदु 1 (VP1): पञ्चमहाव्रतानां प्रचारकः (Propagator of Five Great Vows)

    मूल बिंदु 2 (VP2): अहिंसा, सत्यम्, अस्तेयम्, ब्रह्मचर्यम्, अपरिग्रहः (Non-violence, truth, non-stealing, celibacy, non-possessiveness)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    जैनधर्मस्य चतुर्विंशतितमः (अन्तिमः) तीर्थङ्करः भगवान् महावीरः 'पञ्चमहाव्रतानां' प्रचारकः आसीत्। तानि पञ्चमहाव्रतानि सन्ति — अहिंसा, सत्यम्, अस्तेयम् (चौर्यं न करणीयम्), ब्रह्मचर्यम्, अपरिग्रहः (आवश्यकताधिकं धनं न सञ्चयनीयम्) च।

    हिंदी अनुवाद:

    जैन धर्म के चौबीसवें (और अंतिम) तीर्थंकर भगवान महावीर 'पाँच महाव्रतों' के प्रचारक थे। वे पाँच महाव्रत हैं — अहिंसा, सत्य बोलना, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह (ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें या धन इकट्ठा न करना)।

    English:

    Lord Mahavira, the twenty-fourth (and last) Tirthankara of Jainism, was the propagator of the 'Five Great Vows' (Panchamahavratas). These five vows are — Ahimsa (non-violence), Satyam (truth), Asteyam (non-stealing), Brahmacharyam (celibacy), and Aparigrahah (non-possessiveness).


    SECTION 13 — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 Marks)


    प्र१. राज्ञः ऋषभदेवस्य लोककल्याणकार्याणां सविस्तरं वर्णनं कुरुत।

    मूल बिंदु 1 (VP1): समस्यानां चिन्तनम् (Contemplating societal problems)

    मूल बिंदु 2 (VP2): आलस्यनिवारणाय षट् कर्मणाम् उपदेशः (Teaching 6 professions to eradicate laziness)

    मूल बिंदु 3 (VP3): कृषिकार्यस्य आरम्भः (Initiating systematic agriculture)

    मूल बिंदु 4 (VP4): आजीविकायाः प्रबन्धनं शान्तिस्थापनं च (Managing livelihood and establishing peace)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    यदा ऋषभदेवः राजा अभवत्, तदा समाजे दुर्भिक्ष-विद्वेषादयः समस्याः आसन्। सः चिन्तनेन ज्ञातवान् यत् जनानाम् आलस्यं तथा उत्पादनक्षमतायाः अभावः एव मूलसमस्या अस्ति। तस्याः समस्यायाः निवारणाय ऋषभदेवः महान्ति लोककल्याणकार्याणि कृतवान्। सः जनेभ्यः असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्या, शिल्प इति षट् कर्माणि उपदिष्टवान्। सः अकृष्टपच्यायां भूमौ व्यवस्थितरूपेण कृषिकार्यस्य आरम्भं कृतवान्। जनान् वाणिज्यं (व्यापारं) कलां च शिक्षितवान्। एवं प्रकारेण सः प्रजानाम् आजीविकायाः (रोज़गारस्य) प्रबन्धनं कृत्वा समाजे शान्तिं, सुखं, सुव्यवस्थां च स्थापितवान्। एतानि एव तस्य प्रमुखाणि लोकमङ्गलकार्याणि सन्ति।

    हिंदी अनुवाद:

    जब ऋषभदेव राजा बने, तब समाज में अकाल और आपसी नफरत जैसी समस्याएँ थीं। उन्होंने विचार करके यह जाना कि लोगों का आलस्य और उत्पादन क्षमता की कमी ही मूल समस्या है। इस समस्या को दूर करने के लिए ऋषभदेव ने महान लोक-कल्याणकारी कार्य किए। उन्होंने लोगों को असि (हथियार), मसि (लिखाई), कृषि (खेती), वाणिज्य (व्यापार), विद्या और शिल्प—इन छह कर्मों का उपदेश दिया। उन्होंने बिना जोते फलने वाली ज़मीन पर व्यवस्थित रूप से खेती की शुरुआत करवाई। लोगों को व्यापार और कलाएँ सिखाईं। इस प्रकार उन्होंने प्रजा के रोज़गार (आजीविका) का प्रबंध करके समाज में शांति, सुख और अच्छी व्यवस्था स्थापित की। यही उनके प्रमुख लोक-कल्याण के कार्य हैं।

    English:

    When Rishabhadeva became the king, society was plagued by famine and mutual hatred. Through contemplation, he realized that the people's laziness and lack of productive capacity were the root problems. To resolve this, Rishabhadeva undertook immense public welfare activities. He taught the people six professions: swordsmanship, writing, agriculture, commerce, knowledge, and arts. He initiated systematic agriculture on land that previously yielded unploughed crops. He educated people in trade and crafts. By thus managing the livelihood of his subjects, he established peace, happiness, and a well-ordered society. These are his prominent public welfare contributions.


    प्र२. तीर्थङ्करः इत्यस्य कः अर्थः? ऋषभदेवः कथं प्रथमः तीर्थङ्करः सञ्जातः? पाठस्य आधारेण स्पष्टीकुरुत।

    मूल बिंदु 1 (VP1): तीर्थङ्करस्य अर्थः (Meaning of Tirthankara - creator of the path to cross samsara)

    मूल बिंदु 2 (VP2): ऋषभस्य वैराग्यम् वनगमनं च (Rishabha's detachment and going to the forest)

    मूल बिंदु 3 (VP3): कठोरं तपः केवलज्ञानप्राप्तिश्च (Severe penance and attaining omniscience)

    मूल बिंदु 4 (VP4): रागादिदोषाणां विजयः (Conquering attachment and flaws)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    'तीर्थङ्करः' इत्यस्य अर्थः अस्ति - यः संसारसागरं तर्तुं (पारं गन्तुं) तीर्थस्य (धर्मस्य/मार्गस्य) रचनां करोति सः तीर्थङ्करः। पाठस्य आधारेण, कालान्तरे राज्ञः ऋषभदेवस्य मनसि वैराग्यम् उत्पन्नम्। सः स्वज्येष्ठपुत्राय भरताय सम्पूर्णं राज्यं दत्त्वा तपसे वनं गतवान्। वने सः दिगम्बरः भूत्वा अतीव कठोरं तपः अकरोत्। तस्य तपसा तस्मै 'केवलज्ञानम्' अर्थात् सर्वोच्चज्ञानं प्राप्तम्। सः रागादिदोषान् (मोह-लोभ-क्रोधादीन्) पूर्णतया जितवान्। तदनन्तरं सः जनेभ्यः मोक्षप्राप्त्यर्थं धर्मस्य मार्गं प्रदर्शितवान्। अनेन प्रकारेण सः अस्य युगस्य प्रथमः तीर्थङ्करः 'आदिनाथः' सञ्जातः।

    हिंदी अनुवाद:

    'तीर्थंकर' का अर्थ है - जो संसार रूपी सागर को पार करने के लिए 'तीर्थ' (धर्म या मार्ग) की रचना करता है, वह तीर्थंकर कहलाता है। पाठ के आधार पर, समय बीतने पर राजा ऋषभदेव के मन में वैराग्य (संसार से विरक्ति) पैदा हो गया। वे अपने बड़े बेटे भरत को पूरा राज्य सौंपकर तपस्या के लिए जंगल चले गए। जंगल में वे दिगंबर (वस्त्रहीन) होकर कठोर तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या से उन्हें 'केवलज्ञान' अर्थात् सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने राग-द्वेष (मोह, लालच, क्रोध आदि) को पूरी तरह से जीत लिया। इसके बाद उन्होंने लोगों को मोक्ष पाने के लिए धर्म का रास्ता दिखाया। इस प्रकार वे इस युग के पहले तीर्थंकर 'आदिनाथ' बन गए।

    English:

    The meaning of 'Tirthankara' is one who creates a 'Tirtha' (a ford/path of Dharma) to help souls cross the ocean of worldly existence (Samsara). According to the text, over time, detachment arose in King Rishabhadeva's mind. Handing over his entire kingdom to his eldest son Bharata, he went to the forest for penance. In the forest, becoming a Digambara (sky-clad ascetic), he performed exceedingly severe penance. Through his penance, he attained 'Kevalgyan', the ultimate omniscience. He completely conquered flaws like attachment, greed, and anger. Thereafter, he showed the path of Dharma to the people for attaining liberation. In this manner, he became 'Adinath', the first Tirthankara of this era.

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