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    12. परिशिष्टम् १ – अन्वयः - Parishistam 1 – Anvayah - Class 9 - Sharada

    • 1 day ago
    • 15 min read

    SECTION 1 — पाठ परिचय

    विवरण

    जानकारी

    पाठ का नाम:

    परिशिष्टम् १ – अन्वयः (Parishiṣṭam 1 – Anvayaḥ)

    विधा:

    गद्य पाठ — व्याकरण-लेखः / परिशिष्टम्

    स्रोत/ग्रंथ:

    संस्कृत-व्याकरणशास्त्रम् (NCERT सङ्कलितः)

    लेखक/कवि:

    अज्ञात (NCERT सम्पादकमण्डलः)

    पाठ्यपुस्तक:

    शारदा, NCERT कक्षा 9 संस्कृत, 2026-27

    परीक्षा खंड:

    खंड-घ (अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् / साहित्यम्)


    SECTION 2 — पाठ/विषय परिचय


    SANSKRIT:

    अयं पाठः शारदा-पाठ्यपुस्तकस्य प्रथमं परिशिष्टम् अस्ति। अस्मिन् पाठे श्लोकानाम् अर्थावबोधनाय 'अन्वयस्य' महत्त्वं तस्य च विधयः वर्णिताः सन्ति। श्लोकेषु पदानां क्रमः छन्दसः अनुगुणं भवति, अतः अर्थज्ञानाय तेषां पदानां वाक्यरचनानुसारं (कर्तृ-कर्म-क्रिया-क्रमेण) स्थापनम् एव अन्वयः कथ्यते। अत्र अन्वयस्य द्वौ विधी—दण्डान्वयः खण्डान्वयश्च—सविस्तरम् उदाहरणैः सह स्पष्टीकृतौ स्तः।

    हिंदी अनुवाद:

    यह पाठ शारदा पाठ्यपुस्तक का पहला परिशिष्ट (Appendix) है। इस पाठ में श्लोकों का अर्थ समझने के लिए 'अन्वय' (वाक्य के पदों को सही क्रम में लगाना) का महत्व और उसकी विधियाँ बताई गई हैं। श्लोकों में शब्दों का क्रम छंद (मीटर) के अनुसार होता है, इसलिए अर्थ जानने के लिए उन शब्दों को कर्ता-कर्म-क्रिया के सही क्रम में रखना ही अन्वय कहलाता है। यहाँ अन्वय की दो विधियों—दण्डान्वय और खण्डान्वय—को उदाहरणों के साथ विस्तार से समझाया गया है।

    English:

    This chapter is the first appendix of the Sharada textbook. It explains the importance and methods of 'Anvaya' (syntactical rearrangement of words) for understanding the meaning of Sanskrit verses. Since words in a verse are arranged according to the meter, rearranging them in proper prose order (Subject-Object-Verb) is called Anvaya. The text details two methods of Anvaya: Dandanvaya and Khandanvaya, with examples.

    EXAM TIP:परीक्षा में अन्वय-पूर्ति के प्रश्न सीधे इसी पद्धति पर आधारित होते हैं। इस परिशिष्ट से 'आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्ति और तात्पर्य' की परिभाषाएँ लघु उत्तरीय प्रश्नों में पूछी जा सकती हैं।

    SECTION 3 — मूल पाठ


    १। सामान्यतः श्लोकेषु कर्तृपदं कर्मपदं तृतीयादिविभक्त्यन्तं पदं क्रियापदं विशेषणादिकं च छन्दसः अनुगुणं पूर्वापरं भवितुमर्हति । २। तेन पठितारः पदानां मध्ये परस्परं सम्बन्धं (अन्वयं) कल्पयितुं कदाचित् कष्टम् अनुभवन्ति । ३। अतः श्लोकेषु विद्यमानानां पदानां परस्परं सम्बन्धं सरलरूपेण ज्ञातुं कश्चन क्रमः ज्ञातव्यः। तदनन्तरमेव श्लोकस्य अर्थमवगन्तुं शक्यते । ४। श्लोकान्वयविधिः - १. दण्डान्वयविधिः, २. खण्डान्वयविधिः ।  

    १. दण्डान्वयः ५। कर्तृपदं कर्मपदं क्रियापदं चेति प्राथमिकी वाक्यरचनाशैली वर्तते। अस्मिन् अन्वयक्रमे विशेषणानि क्रमशः तत्तत्पदस्य पूर्वं प्रयुक्तानि भवन्ति । ६। यदि श्लोकेषु अव्ययानि कृदन्तपदानि वा सन्ति तर्हि तानि केन पदेन सह सम्बद्धानि इति ज्ञात्वा तत्र प्रयोक्तव्यानि । ७। कदाचित् कर्तृपदं क्रियापदं वा श्लोकेषु न दृश्यते तदा अस्माभिः विचिन्त्य तत् पदं योजनीयम् (अध्याहार्यम्) ।  

    उदाहरणश्लोकः १: शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः यस्तु क्रियावान् पुरुषस्स विद्वान् । सुचिन्तितं चौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥   

    २. खण्डान्वयः ८। खण्डशः अन्वयः खण्डान्वयः इति। तन्नाम आरम्भे एव श्लोकस्य पूर्णभागस्य अन्वयः न क्रियते अपि तु प्रतिपदं परस्परम् अन्वयः क्रियते । ९। श्लोकस्य अन्वयार्थम् अवबोधनार्थं च विशेषरूपेण चत्वारि सहकारि-कारणानि उक्तानि सन्ति । १०। तानि - आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्तिः, तात्पर्यं च इति । ११। खण्डान्वयविधौ आकाङ्क्षानुगुणं प्रश्नाः भवन्ति। अतः एषः विधिः आकाङ्क्षाविधिः इत्यपि उच्यते ।  

    उदाहरणश्लोकः २: सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दमर्धो घटो घोषमुपैति नूनम् । विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वमल्पो जनो जल्पति साट्टहासम् ।।   

    SECTION 4 — अन्वय (व्याख्या)

    (अस्मिन् पाठे अन्वयस्यैव नियमाः दर्शिताः सन्ति, अतः अत्र श्लोकद्वयस्य अन्वयः दीयते)

    श्लोकः १ (दण्डान्वय-उदाहरणम्): मूल: शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः यस्तु क्रियावान् पुरुषस्स विद्वान् । सुचिन्तितं चौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥ अन्वयः: (केचन) शास्त्राणि अधीत्य अपि मूर्खाः भवन्ति। यः क्रियावान् सः पुरुषः तु विद्वान् (भवति)। (यथा) सुचिन्तितम् औषधं नाममात्रेण आतुराणाम् अरोगं न करोति । विशेष: अत्र 'केचन' (कुछ लोग), 'भवति' (होता है) तथा 'यथा' (जैसे) इति पदानाम् अध्याहारः (बाहर से योजनम्) कृतः अस्ति ।  

    श्लोकः २ (खण्डान्वय-उदाहरणम्): मूल: सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दमर्धो घटो घोषमुपैति नूनम् । विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वमल्पो जनो जल्पति साट्टहासम् ।। अन्वयः: सम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोति। अर्धः घटः नूनं घोषम् उपैति। कुलीनः विद्वान् गर्वं न करोति। अल्पः जनः साट्टहासं जल्पति । विशेष: अत्र खण्डान्वयविधौ प्रश्नोत्तरमाध्यमेन (कः न करोति? -> सम्पूर्णकुम्भः न करोति) अन्वयः निष्पादितः अस्ति ।  


    SECTION 5 — शब्दार्थ

    संस्कृत पद

    हिंदी अर्थ

    English Meaning

    अन्वयः

    शब्दों का सही क्रम

    Logical syntax / Word order

    दण्डान्वयः

    वाक्य के अनुसार सीधा अन्वय

    Prose-order syntax

    खण्डान्वयः

    खण्ड-खण्ड करके (प्रश्नोत्तर से) अन्वय

    Syntax through question-answers

    अध्याहार्यम्

    बाहर से शब्द जोड़ना

    Supplying missing words

    आकाङ्क्षा

    वाक्य में अगले पद को जानने की इच्छा

    Syntactic expectancy / Curiosity

    योग्यता

    शब्दों के बीच सही संबंध की क्षमता

    Semantic compatibility

    आसत्तिः / सन्निधिः

    पदों का एक साथ (समीप) होना

    Proximity of words

    तात्पर्यम्

    वक्ता का वास्तविक अर्थ/उद्देश्य

    Intended meaning

    आतुराणाम्

    रोगियों का

    Of the sick / patients

    अरोगम्

    रोगमुक्त / स्वस्थ

    Disease-free / Healthy

    सम्पूर्णकुम्भः

    पूरा भरा हुआ घड़ा

    Completely filled pitcher

    उपैति

    प्राप्त करता है / करता है

    Attains / Makes

    साट्टहासम्

    ज़ोर की हँसी के साथ

    With loud laughter

    जल्पति

    व्यर्थ बकवास करता है

    Babbles / Boasts


    SECTION 6 — हिंदी अनुवाद

    १. आमतौर पर श्लोकों में कर्ता, कर्म, तृतीया आदि विभक्तियों वाले पद, क्रियापद और विशेषण आदि छंद (कविता के मीटर) के अनुसार आगे-पीछे हो सकते हैं । २. इससे पढ़ने वालों को पदों के बीच आपसी संबंध (अन्वय) की कल्पना करने में कभी-कभी कठिनाई होती है । ३. इसलिए श्लोकों में मौजूद पदों का आपसी संबंध सरलता से जानने के लिए एक सही क्रम जानना चाहिए। उसके बाद ही श्लोक का अर्थ समझा जा सकता है । ४. श्लोक का अन्वय करने की दो विधियाँ हैं - १. दण्डान्वय विधि, २. खण्डान्वय विधि ।  


    १. दण्डान्वय विधि: ५. 'कर्ता, कर्म और क्रिया'—यह वाक्य रचना की प्राथमिक शैली है। इस अन्वय क्रम में विशेषण क्रमशः अपने-अपने पद से पहले लगाए जाते हैं । ६. यदि श्लोक में अव्यय या कृदन्त पद हों, तो वे किस पद के साथ जुड़े हैं, यह जानकर उन्हें वहाँ रखना चाहिए । ७. कभी-कभी श्लोक में कर्ता या क्रियापद दिखाई नहीं देता, तब हमें सोच-विचार कर उस पद को बाहर से जोड़ना (अध्याहार) चाहिए । श्लोक १ का भाव: कुछ लोग शास्त्र पढ़कर भी मूर्ख ही रहते हैं, जो व्यक्ति ज्ञान को आचरण में लाता है, वही विद्वान है। जैसे अच्छी तरह सोची गई दवा केवल नाम लेने से रोगियों को ठीक नहीं कर देती ।  


    २. खण्डान्वय विधि: ८. टुकड़ों (खंडों) में किया गया अन्वय खण्डान्वय कहलाता है। इसमें शुरू में ही पूरे श्लोक का अन्वय नहीं किया जाता, बल्कि एक-एक पद का आपस में प्रश्नोत्तर करके अन्वय किया जाता है । ९. श्लोक का अन्वय और अर्थ समझने के लिए मुख्य रूप से चार सहायक कारण बताए गए हैं । १०. वे हैं - आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्ति और तात्पर्य । ११. खण्डान्वय विधि में 'आकाङ्क्षा' (जानने की इच्छा) के अनुसार प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए इसे आकाङ्क्षा विधि भी कहा जाता है । श्लोक २ का भाव: पूरा भरा हुआ घड़ा आवाज़ नहीं करता, जबकि आधा भरा हुआ घड़ा निश्चित रूप से आवाज़ करता है। इसी तरह कुलीन विद्वान घमंड नहीं करता, जबकि ओछा (कम ज्ञान वाला) व्यक्ति ज़ोर-ज़ोर से डींगें हांकता है ।  


    SECTION 7 — English Translation

    1. Generally, in verses, the subject, object, words ending in instrumental and other cases, verbs, and adjectives can be placed anywhere forward or backward according to the poetic meter.  

    2. Because of this, readers sometimes experience difficulty in figuring out the mutual relationship (Anvaya) among the words.  

    3. Therefore, to easily understand the mutual connection of the words present in the verses, a proper sequence must be learned. Only then can the meaning of the verse be comprehended.  

    4. Methods of verse-Anvaya: 1. Dandanvaya method, 2. Khandanvaya method.  


    1. Dandanvaya Method: 5. The primary sentence construction style is 'Subject, Object, and Verb'. In this sequential method, adjectives are placed respectively before their corresponding nouns. 6. If there are indeclinables (Avyayas) or participles (Kridantas) in the verses, they should be placed after determining which word they are connected to. 7. Sometimes the subject or verb is not visible in the verses; in such cases, we must thoughtfully supply that missing word (Adhyahara). Meaning of Shloka 1: Some people remain fools even after studying the scriptures; only the one who puts knowledge into action is truly wise. Just as a well-thought-out medicine does not cure the sick merely by reciting its name.  

    2. Khandanvaya Method: 8. Syntactical arrangement done in segments is Khandanvaya. Here, the entire verse is not rearranged at the very beginning; rather, the connection is established word by word through a question-answer format. 9. To rearrange and understand a verse, four auxiliary causes are specifically mentioned. 10. They are - Akanksha (Expectancy), Yogyata (Compatibility), Asatti (Proximity), and Tatparya (Intended meaning). 11. In the Khandanvaya method, questions are framed according to 'Akanksha'. Hence, this method is also called the Akanksha method. Meaning of Shloka 2: A completely filled pitcher makes no sound, whereas a half-filled pitcher certainly makes a noise. Similarly, a noble scholar does not show pride, whereas a shallow person babbles with loud, arrogant laughter.  


    SECTION 8 — सारांश

    HINDI:

    प्रस्तुत परिशिष्ट "अन्वयः" में संस्कृत श्लोकों का अर्थ समझने की वैज्ञानिक प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। संस्कृत कविताओं में छंद के कारण शब्दों का क्रम आगे-पीछे होता है। इन शब्दों को कर्ता-कर्म-क्रिया के रूप में एक अर्थपूर्ण वाक्य में पिरोने की क्रिया 'अन्वय' कहलाती है। अन्वय की दो प्रमुख विधियाँ हैं: १. दण्डान्वय - जिसमें पूरे वाक्य को गद्य के रूप में सीधा किया जाता है और यदि कोई शब्द (जैसे कर्ता या क्रिया) गायब हो तो उसे बाहर से (अध्याहार) जोड़ा जाता है। २. खण्डान्वय - जिसमें वाक्य के टुकड़े कर प्रश्नोत्तर विधि द्वारा अर्थ निकाला जाता है। वाक्य का सही अर्थ निकालने के लिए चार तत्व आवश्यक माने गए हैं: आकाङ्क्षा (जिज्ञासा), योग्यता (अर्थ की सार्थकता), आसत्ति (शब्दों की समीपता) और तात्पर्य (वक्ता का सही उद्देश्य)।

    ENGLISH:

    The appendix "Anvayah" describes the scientific process of deciphering the meaning of Sanskrit verses. In Sanskrit poetry, the word order is often scrambled to fit the poetic meter. Rearranging these words into a meaningful prose sequence (Subject-Object-Verb) is called 'Anvaya'. There are two main methods: 1. Dandanvaya, where the entire sentence is straightened into prose, and any missing word (like a subject or verb) is supplied externally (Adhyahara). 2. Khandanvaya, where the verse is broken into segments, and the meaning is derived using a question-and-answer technique. To extract the correct meaning of a sentence, four elements are essential: Akanksha (syntactic expectancy), Yogyata (semantic compatibility), Asatti (proximity of words), and Tatparya (the speaker's intended meaning).


    SECTION 9 — केंद्रीय भाव एवं मूल्य


    9A. विषय-वस्तु सारणी

    विषय

    पाठ में स्पष्टीकरण

    मुख्य विषय

    श्लोकों के अर्थ-बोध के लिए 'अन्वय' (वाक्य-रचना) की विधियों का ज्ञान। (Understanding syntax methods for deciphering verses.)

    दण्डान्वयः

    गद्य के क्रम (कर्ता-कर्म-क्रिया) में वाक्य बनाना और लुप्त पदों को जोड़ना। (Arranging in prose order and supplying missing words.)

    खण्डान्वयः / आकाङ्क्षा

    प्रश्नोत्तर के माध्यम से पदों का संबंध स्थापित करना। (Establishing word relations via Q&A.)


    9B. मानवीय एवं सांस्कृतिक मूल्य


    • तर्कशक्तिः / क्रमबद्धता (तार्किक सोच और व्यवस्था / Logical Reasoning & Orderliness)

      • श्लोकेषु विद्यमानानां पदानां परस्परं सम्बन्धं सरलरूपेण ज्ञातुं कश्चन क्रमः ज्ञातव्यः।   

      • यह पाठ हमें जीवन और विचारों में क्रमबद्धता (Systematic approach) और तर्क (Logic) का प्रयोग करना सिखाता है। अस्त-व्यस्त शब्दों से अर्थ नहीं निकलता, वैसे ही अव्यवस्थित जीवन से लक्ष्य नहीं मिलता।

      • (Teaches the importance of logic and a systematic approach to finding meaning and achieving goals.)

    • सूक्ष्मबोधः (गहराई से समझना / Deep Comprehension)

      • शब्दस्य अर्थः सम्यक् ज्ञातव्यः, अन्यथा शब्दस्य अर्थः अनर्थः भवितुमर्हति।   

      • किसी भी बात का 'तात्पर्य' (असली मतलब) समझे बिना निर्णय नहीं लेना चाहिए। शब्दों के सतही अर्थ के बजाय वक्ता के गहरे उद्देश्य को समझना चाहिए।

      • (Promotes deep listening and understanding the true intention behind words to avoid misinterpretations.)

    EXAM TIP:मूल्यपरक प्रश्न 2-4 अंकों के लिए नियमित आते हैं।Always name the value in Sanskrit first (e.g., तर्कशक्तिः, सूक्ष्मबोधः).

    SECTION 10 — मुख्य विचार-बिंदु (Key Arguments)

    वाक्यार्थ-ज्ञानार्थं चत्वारि सहकारि-कारणानि (Four Cooperative Causes for Sentence Meaning):


    १. आकाङ्क्षा (Akanksha - Expectancy)

    • Sanskrit: अपेक्षित-विषयस्य ज्ञाने इच्छा आकाङ्क्षा। पूर्वपदस्य अग्रिमपदस्य वा ज्ञाने इच्छा इत्यपि वक्तुं शक्नुमः ।  

    • Hindi: एक शब्द को सुनने के बाद दूसरे संबंधित शब्द को जानने की स्वाभाविक इच्छा। जैसे 'पठति' (पढ़ता है) सुनने पर 'कौन पढ़ता है?' यह जिज्ञासा ही आकाङ्क्षा है ।  

    • English: The natural syntactic expectancy or curiosity to know the related missing word. Hearing 'reads' naturally raises the question 'who reads?'.

    २. योग्यता (Yogyata - Compatibility)

    • Sanskrit: पदानां मध्ये परस्पर-सम्बन्धस्य पात्रता एव योग्यता ।  

    • Hindi: शब्दों के बीच सही संबंध बनाने की क्षमता। 'आसमान में फूल खिलता है'—इस वाक्य में योग्यता नहीं है क्योंकि आसमान में फूल का होना असंभव है ।  

    • English: Semantic compatibility between words. "A flower blooms in the sky" lacks Yogyata because it's logically impossible.

    ३. आसत्तिः / सन्निधिः (Asatti - Proximity)

    • Sanskrit: पदानां परस्परं सामीप्यम् आसत्तिः (सन्निधिः)। एकस्य पदस्य कथनानन्तरम् अग्रिमपदम् अपि अनुक्षणं वदेत् ।  

    • Hindi: बोलते समय शब्दों का एक-दूसरे के पास होना। एक शब्द आज बोला और दूसरा शब्द कल, तो वाक्य का अर्थ नहीं निकलेगा ।  

    • English: The continuous proximity of words without long delays. Words spoken with large time gaps fail to convey a unified meaning.

    ४. तात्पर्यम् (Tatparya - Intended Meaning)

    • Sanskrit: शब्दविशेषात् अर्थविशेषस्य ज्ञाने इच्छा एव तात्पर्यं भवति। अन्यथा शब्दस्य अर्थः अनर्थः भवितुमर्हति ।  

    • Hindi: वक्ता का असली उद्देश्य। जैसे 'शतायुर्भव' का शाब्दिक अर्थ '१०० साल जियो' है, पर असल तात्पर्य 'लंबी उम्र जियो' (चिरंजीवी भव) है ।  

    • English: The true intention of the speaker. Misunderstanding the context can lead to disastrous misinterpretations.


    SECTION 11 — गद्यांश आधारित प्रश्न

    गद्यांशः १

    दण्डान्वयः (दण्डवत् अन्वयः दण्डान्वयः)। कर्तृपदं कर्मपदं क्रियापदं चेति प्राथमिकी वाक्यरचनाशैली वर्तते । अस्मिन् अन्वयक्रमे विशेषणानि क्रमशः तत्तत्पदस्य पूर्वं प्रयुक्तानि भवन्ति । कर्तृपदस्य विशेषणं कर्तृपदात् पूर्वं, कर्मपदस्य विशेषणं कर्मपदात् पूर्वम् इति क्रमशः विधानं भवति । यदि श्लोकेषु अव्ययानि कृदन्तपदानि वा सन्ति तर्हि तानि केन पदेन सह सम्बद्धानि इति ज्ञात्वा तत्र प्रयोक्तव्यानि । ततः परं सर्वान्ते क्रियापदं लिखेत् । कदाचित् कर्तृपदं क्रियापदं वा श्लोकेषु न दृश्यते तदा अस्माभिः विचिन्त्य तत् पदं योजनीयम् । आहत्य पदानां परस्परम् अन्वयः एव दण्डान्वयस्य क्रमः भवति ।   


    प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark):

    प्राथमिकी वाक्यरचनाशैली का अस्ति?

    (क) क्रिया-कर्म-कर्ता (ख) विशेषण-विशेष्य-क्रिया

    (ग) कर्तृ-कर्म-क्रिया (घ) अव्यय-कृदन्त-क्रिया

    उत्तरम्: (ग)

    हिंदी: गद्यांश की पहली पंक्ति के अनुसार, प्राथमिक वाक्य रचना 'कर्ता-कर्म-क्रिया' है । English: According to the text, the primary sentence structure is Subject-Object-Verb.  


    प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark):

    मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत —

    [ सर्वान्ते / पूर्वम् / सम्बद्धानि ]

    कर्तृपदस्य विशेषणं कर्तृपदात् _______ , कर्मपदस्य विशेषणं कर्मपदात् पूर्वम् इति क्रमशः विधानं भवति।

    उत्तरम्: पूर्वम्

    हिंदी: कर्ता का विशेषण कर्ता से 'पहले' (पूर्वम्) आता है । English: The adjective of the subject is placed 'before' (purvam) the subject.  


    प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark):

    'योजनीयम्' इति पदस्य अर्थः अस्ति —

    (क) वियोजनीयम् (ख) दातव्यम्

    (ग) मेलनीयम् / प्रयोक्तव्यम् (घ) हर्तव्यम्

    उत्तरम्: (ग)

    हिंदी: योजनीयम् का अर्थ है 'जोड़ना चाहिए' या 'मिलाना चाहिए' । English: Yojaniyam means 'should be added' or 'joined'.  


    प्र.(iv) — प्रश्ननिर्माणम् (1 mark):

    अधोलिखितवाक्ये रेखाङ्कितपदम् आश्रित्य प्रश्नं रचयत —

    ततः परं सर्वान्ते क्रियापदं लिखेत् ।

    उत्तरम्: ततः परं कुत्र (कदा) क्रियापदं लिखेत् ?

    हिंदी: 'सर्वान्ते' (सबसे अंत में) स्थान या समय सूचक है, अतः 'कुत्र/कदा' का प्रयोग होगा । English: 'Sarvante' means at the very end, so 'Kutra' or 'Kada' is used.  


    गद्यांशः २

    खण्डशः अन्वयः खण्डान्वयः इति । तन्नाम आरम्भे एव श्लोकस्य पूर्णभागस्य अन्वयः न क्रियते अपि तु प्रतिपदं परस्परम् अन्वयः क्रियते । तदपि प्रश्नोत्तरमाध्यमेन । अन्ते समग्रस्य श्लोकस्य अन्वयः स्वयमेव भविष्यति । श्लोकस्य अन्वयार्थम् अवबोधनार्थं च विशेषरूपेण चत्वारि सहकारि-कारणानि उक्तानि सन्ति । तानि - आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्तिः, तात्पर्यं च इति । आकाङ्क्षा - अपेक्षित-विषयस्य ज्ञाने इच्छा आकाङ्क्षा । पूर्वपदस्य अग्रिमपदस्य वा ज्ञाने इच्छा इत्यपि वक्तुं शक्नुमः ।   


    प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark):

    वाक्यार्थावबोधनार्थं कति सहकारि-कारणानि उक्तानि सन्ति?

    (क) त्रीणि (ख) चत्वारि

    (ग) पञ्च (घ) षट्

    उत्तरम्: (ख)

    हिंदी: श्लोक का अर्थ समझने के लिए 'चार' (चत्वारि) सहायक कारण बताए गए हैं । English: There are 'four' (chatvari) auxiliary causes for understanding a verse.  


    प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark):

    मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत —

    [ प्रश्नोत्तरमाध्यमेन / आकाङ्क्षा / प्रतिपदं ]

    आरम्भे एव श्लोकस्य पूर्णभागस्य अन्वयः न क्रियते अपि तु _______ परस्परम् अन्वयः क्रियते ।

    उत्तरम्: प्रतिपदं

    हिंदी: शुरू में ही पूरे श्लोक का अन्वय नहीं किया जाता, बल्कि 'एक-एक पद का' (प्रतिपदं) अन्वय किया जाता है । English: Instead of the whole verse, rearrangement is done 'word by word' (pratipadam).  


    प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark):

    'आकाङ्क्षा' इति पदस्य अर्थः अस्ति —

    (क) इच्छा (जिज्ञासा) (ख) योग्यता

    (ग) समीपम् (घ) तात्पर्यम्

    उत्तरम्: (क)

    हिंदी: आकाङ्क्षा का अर्थ है विषय को जानने की 'इच्छा' या जिज्ञासा । English: Akanksha means the 'desire' or syntactic expectancy.  


    प्र.(iv) — प्रश्ननिर्माणम् (1 mark):

    अधोलिखितवाक्ये रेखाङ्कितपदम् आश्रित्य प्रश्नं रचयत —

    तदपि प्रश्नोत्तरमाध्यमेन क्रियते।

    उत्तरम्: तदपि केन (कथं) क्रियते?

    हिंदी: 'प्रश्नोत्तरमाध्यमेन' साधन (तृतीया) है, इसलिए 'केन' या 'कथम्' का प्रयोग होगा । English: It describes the means/method, so 'Kena' or 'Katham' is used.  


    SECTION 12 — लघु उत्तरीय प्रश्न (3 Marks)


    प्र१. श्लोकेषु अन्वयस्य आवश्यकता किमर्थं भवति? मूल बिंदु 1 (VP1): छन्दसः अनुगुणं पदानां पूर्वापर-

    स्थापनम् मूल बिंदु 2 (VP2): अर्थावबोधनाय पदानां परस्परसम्बन्ध-ज्ञानम्   

    उत्तरम् (Sanskrit): सामान्यतः श्लोकेषु कर्तृपदं, कर्मपदं, क्रियापदं च छन्दसः (मात्रायाः) अनुगुणं पूर्वापरं (अग्रे-पृष्ठे) भवन्ति। तेन पठितारः पदानां मध्ये परस्परं सम्बन्धं कल्पयितुं कष्टम् अनुभवन्ति। अतः अर्थमवगन्तुं पदानां सरलरूपेण (वाक्यक्रमेण) सम्बन्धज्ञानार्थम् अन्वयस्य आवश्यकता भवति ।  

    हिंदी अनुवाद:

    श्लोकों में कर्ता, कर्म और क्रियापद कविता के छंद (मीटर) के अनुसार आगे-पीछे लिखे जाते हैं। इससे पढ़ने वालों को शब्दों के बीच संबंध समझने में मुश्किल होती है। इसलिए वाक्य का सही अर्थ निकालने के लिए शब्दों को सही क्रम में रखने (अन्वय) की आवश्यकता होती है।

    English:

    In verses, subjects, objects, and verbs are placed forwards or backwards to fit the poetic meter. This makes it difficult for readers to comprehend the relationship between words. Therefore, Anvaya is necessary to rearrange words logically to understand the accurate meaning of the verse.


    प्र२. दण्डान्वयस्य प्राथमिकी वाक्यरचनाशैली का अस्ति? मूल बिंदु 1 (VP1): कर्तृपदं कर्मपदं क्रियापदं चेति क्रमः मूल बिंदु 2 (VP2): विशेषणानि तत्तत्पदस्य पूर्वं प्रयुक्तानि   

    उत्तरम् (Sanskrit): दण्डान्वयस्य प्राथमिकी वाक्यरचनाशैली अस्ति - "कर्तृपदं, ततः कर्मपदं, अन्ते च क्रियापदम्।" अस्मिन् क्रमे विशेषणानि क्रमशः स्वविशेष्यपदात् (कर्तृपदात् कर्मपदात् वा) पूर्वं प्रयुक्तानि भवन्ति ।

    हिंदी अनुवाद:

    दण्डान्वय की प्राथमिक वाक्य रचना शैली "कर्ता-कर्म-क्रिया" है। इस क्रम में जो विशेषण होते हैं, वे क्रमशः अपने संज्ञा पद (कर्ता या कर्म) से ठीक पहले लगाए जाते हैं।

    English:

    The primary sentence construction style of Dandanvaya is 'Subject - Object - Verb'. In this sequence, adjectives are placed immediately before their respective nouns (subject or object).


    प्र३. अध्याहारः नाम किम्? दण्डान्वये एषः कथं क्रियते? मूल बिंदु 1 (VP1): श्लोके लुप्तपदानां योजनम् मूल बिंदु 2 (VP2): विचिन्त्य अर्थपूरणार्थं स्थापनम्   

    उत्तरम् (Sanskrit): यदा श्लोकेषु अर्थपूरणाय आवश्यकं कर्तृपदं क्रियापदं वा न दृश्यते, तदा अस्माभिः विचिन्त्य बाह्यतः यत् पदं वाक्ये योज्यते, तत् 'अध्याहार्यम्' (अध्याहारः) इति कथ्यते। दण्डान्वये अर्थस्पष्टतायै एतादृशानां लुप्तपदानाम् अध्याहारः क्रियते ।  

    हिंदी अनुवाद:

    जब श्लोक में अर्थ पूरा करने के लिए ज़रूरी कर्ता या क्रियापद दिखाई नहीं देता, तब हम सोच-विचार कर बाहर से जो शब्द वाक्य में जोड़ते हैं, उसे 'अध्याहार' कहते हैं। दण्डान्वय में अर्थ साफ करने के लिए ऐसे लुप्त पदों को जोड़ा जाता है।

    English:

    When a necessary subject or verb is missing in a verse, thoughtfully supplying that missing word from outside to complete the meaning is called 'Adhyahara'. In Dandanvaya, this is done to clarify the meaning of the verse.


    प्र४. आसत्तिः (सन्निधिः) इति किम्? तस्य अभावे किं भवति? मूल बिंदु 1 (VP1): पदानां परस्परं सामीप्यम् मूल बिंदु 2 (VP2): कालान्तरे कथनेन अन्वयाभावः   

    उत्तरम् (Sanskrit): वाक्ये पदानां परस्परं सामीप्यम् एव 'आसत्तिः' (सन्निधिः) उच्यते। एकस्य पदस्य कथनानन्तरम् अग्रिमपदम् अनुक्षणं (तत्क्षणात्) वदेत्। यदि एकं पदम् इदानीम् उक्त्वा अग्रिमं पदं कालान्तरे वदति तर्हि सामीप्यस्य अभावात् पदानां परस्परम् अन्वयः न भवति ।  

    हिंदी अनुवाद:

    वाक्य में बोलते समय शब्दों का एक-दूसरे के पास होना ही 'आसत्ति' कहलाता है। एक शब्द बोलने के तुरंत बाद दूसरा शब्द बोलना चाहिए। यदि एक शब्द अभी बोला जाए और दूसरा कुछ समय बाद, तो दूरी के कारण वाक्य का सही अर्थ (अन्वय) नहीं निकलता।

    English:

    The close continuous proximity of words in a sentence is called 'Asatti'. Words must be spoken successively without delay. If one word is spoken now and the next after a delay, the lack of proximity prevents a meaningful syntactical connection.


    SECTION 13 — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 Marks)


    प्र१. वाक्यार्थबोधनार्थं चत्वारि सहकारिकारणानि कानि सन्ति? प्रत्येकस्य सोदाहरणं वर्णनं कुरुत। मूल बिंदु 1 (VP1): आकाङ्क्षा - ज्ञाने इच्छा (Akanksha - Syntactic expectancy) मूल बिंदु 2 (VP2): योग्यता - पदानां सम्बन्धपात्रता (Yogyata - Semantic compatibility) मूल बिंदु 3 (VP3): आसत्तिः - पदानां सामीप्यम् (Asatti - Proximity) मूल बिंदु 4 (VP4): तात्पर्यम् - अर्थविशेषस्य ज्ञाने इच्छा (Tatparya - Intended meaning)   

    उत्तरम् (Sanskrit): श्लोकस्य वाक्यार्थबोधनार्थं चत्वारि प्रमुखाणि सहकारिकारणानि उक्तानि सन्ति— १. आकाङ्क्षा: पूर्वपदस्य अग्रिमपदस्य वा ज्ञाने स्वाभाविक-इच्छा आकाङ्क्षा। यथा 'पठति' इत्युक्ते 'कः पठति?' इति जिज्ञासा । २. योग्यता: पदानां मध्ये परस्पर-सम्बन्धस्य पात्रता योग्यता अस्ति। यथा 'गगने पुष्पं विकसति' अत्र योग्यतायाः अभावः अस्ति, यतोहि गगने पुष्पस्य विकासः असम्भवः । ३. आसत्तिः: पदानां परस्परं सामीप्यम् आसत्तिः भवति। एकपदकथनानन्तरं द्वितीयपदम् अनुक्षणं वक्तव्यम्। कालान्तरेण उक्तं पदं स्वार्थं न ददाति । ४. तात्पर्यम्: शब्दस्य वक्त्रानुसारं यथार्थ-अर्थस्य ग्रहणम् तात्पर्यम् अस्ति। यथा 'शतायुर्भव' इत्यस्य अर्थः केवलं १०० वर्षाणि न, अपि तु 'चिरञ्जीवी भव' इति अस्ति ।  

    हिंदी अनुवाद: वाक्य का अर्थ समझने के लिए चार मुख्य सहायक कारण बताए गए हैं— १. आकाङ्क्षा: एक शब्द सुनकर दूसरे शब्द को जानने की इच्छा। जैसे 'पढ़ता है' सुनकर 'कौन पढ़ता है?' यह जिज्ञासा । २. योग्यता: शब्दों के बीच सही संबंध बनने की क्षमता। जैसे 'आसमान में फूल खिलता है', इस वाक्य में योग्यता नहीं है क्योंकि यह असंभव है । ३. आसत्ति: शब्दों का बोलते समय एक-दूसरे के पास होना। एक शब्द बोलकर दूसरा काफी देर बाद बोलने से अर्थ नहीं निकलता । ४. तात्पर्य: वक्ता का असली उद्देश्य समझना। जैसे 'शतायुर्भव' का मतलब ठीक १०० साल जीना नहीं, बल्कि लंबी उम्र (चिरंजीवी) जीना होता है ।  

    English:

    There are four essential elements for comprehending the meaning of a sentence:

    1. Akanksha (Expectancy): The natural curiosity to know the next connected word. E.g., hearing 'reads' naturally raises 'who reads?'.  

    2. Yogyata (Compatibility): The logical capability of words to relate to each other. "A flower blooms in the sky" lacks Yogyata due to impossibility.  

    3. Asatti (Proximity): The continuous closeness of words when spoken. Words spoken with long time gaps fail to make a meaningful sentence.  

    4. Tatparya (Intended meaning): Understanding the speaker's true intent. E.g., 'Live for 100 years' implies 'have a long life', not exactly 100 years.  


    प्र२. खण्डान्वयविधिः कः अस्ति? स उदाहरणं स्पष्टीकुरुत। मूल बिंदु 1 (VP1): प्रतिपदं प्रश्नोत्तरमाध्यमेन अन्वयः (Word by word Q&A rearrangement) मूल बिंदु 2 (VP2): आकाङ्क्षा-अनुगुणं प्रश्नाः (Questions based on expectancy) मूल बिंदु 3 (VP3): क्रियापदेन आरम्भः (Starting with the verb) मूल बिंदु 4 (VP4): उदाहरणस्य प्रयोगः (Application using the Kumbha shloka)   

    उत्तरम् (Sanskrit): श्लोकस्य खण्डशः (टुकडशः) अन्वयकरणं 'खण्डान्वयविधिः' उच्यते। अस्मिन् विधौ आरम्भे एव श्लोकस्य पूर्णभागस्य अन्वयः न क्रियते, अपि तु प्रश्नोत्तरमाध्यमेन प्रतिपदं परस्परम् अन्वयः क्रियते । अत्र 'आकाङ्क्षानुगुणं' लघुप्रश्नाः भवन्ति, अतः एषः आकाङ्क्षाविधिः अपि उच्यते। अत्र सर्वप्रथमतः क्रियापदेन आकाङ्क्षाप्रश्नः क्रियते, ततः कर्तृ-कर्म-विभक्तीनां प्रश्नाः भवन्ति ।

    उदाहरणम्: "सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दम्..." अस्मिन् श्लोके खण्डान्वयः एवं भवति— शिक्षकः: प्रथमचरणे क्रियापदं किम्? छात्राः: 'करोति'। शिक्षकः: कः न करोति? छात्राः: 'सम्पूर्णकुम्भः' न करोति। शिक्षकः: किं न करोति? छात्राः: 'शब्दं' न करोति । अनेन प्रकारेण प्रश्नानन्तरम् अन्ते समग्रश्लोकस्य अन्वयः (सम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोति...) स्वयमेव स्पष्टः भवति ।  

    हिंदी अनुवाद: श्लोक का टुकड़ों में अन्वय करना खण्डान्वय कहलाता है। इसमें एक साथ पूरे श्लोक को नहीं रखा जाता, बल्कि प्रश्न-उत्तर के माध्यम से एक-एक पद का संबंध जोड़ा जाता है । इसमें जानने की इच्छा (आकाङ्क्षा) के आधार पर प्रश्न होते हैं, इसलिए इसे आकाङ्क्षा विधि भी कहते हैं। इसमें सबसे पहले क्रियापद को लेकर प्रश्न पूछा जाता है, फिर कर्ता और कर्म के बारे में पूछा जाता है ।

    उदाहरण: "पूरा भरा घड़ा आवाज़ नहीं करता..." इस श्लोक में: प्रश्न: क्रियापद क्या है? उत्तर: 'करता है'। प्रश्न: कौन नहीं करता है? उत्तर: 'पूरा भरा घड़ा' नहीं करता है। प्रश्न: क्या नहीं करता है? उत्तर: 'आवाज़' नहीं करता है । इस प्रकार प्रश्नोत्तर करने से अंत में पूरे श्लोक का सही क्रम अपने आप निकल आता है ।  

    English: Segment-wise rearrangement of a verse is called the Khandanvaya method. In this, the entire verse is not rearranged at once; rather, the syntactical connection is established word by word through a question-and-answer technique. Questions are based on syntactic expectancy (Akanksha); thus, it is also called the Akanksha method. The questioning begins with the verb, followed by the subject, object, etc..

    Example: "A fully filled pitcher makes no sound..." Teacher: What is the verb? Students: 'Makes'. Teacher: Who does not make? Students: A 'fully filled pitcher'. Teacher: Makes what? Students: 'Sound'. Through this sequential questioning, the complete prose order of the verse automatically emerges by the end.  

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