top of page

    11. वर्णोच्चारण-शिक्षा २ - Varnoccharana-Shiksha 2 - Class 9 - Sharada

    • 2 days ago
    • 16 min read

    Updated: 15 hours ago

    SECTION 1 — पाठ परिचय

    विवरण

    जानकारी

    पाठ का नाम:

    वर्णोच्चारण-शिक्षा २ (Varṇoccāraṇa-Śikṣā 2)

    विधा:

    गद्य पाठ — लेख (व्याकरण-निबन्धः)

    स्रोत/ग्रंथ:

    सङ्कलितः (पाणिनीयशिक्षा / व्याकरणशास्त्रम्)

    लेखक/कवि:

    सङ्कलितः (महर्षिपाणिनि-प्रेरितः)

    पाठ्यपुस्तक:

    शारदा, NCERT कक्षा 9 संस्कृत, 2026-27

    परीक्षा खंड:

    खंड-घ (साहित्य / अनुप्रयुक्त-व्याकरणम्) — 25-30 अंक


    SECTION 2 — लेखक/स्रोत परिचय


    SANSKRIT:

    अयं पाठः संस्कृतव्याकरणस्य ध्वनिविज्ञानस्य च आधारभूतायां 'पाणिनीयशिक्षायां' सङ्कलितः अस्ति। अस्य विषयस्य मूलप्रवर्तकः महर्षिः पाणिनिः अस्ति। अत्र वर्णानाम् आभ्यन्तरप्रयत्नानां वैज्ञानिकं विवेचनं कृतम् अस्ति। संस्कृतभाषायाः उच्चारणस्य शुद्धतायै अस्य पाठस्य अतीव महत्त्वम् अस्ति।


    हिंदी अनुवाद:

    यह पाठ संस्कृत व्याकरण और ध्वनि विज्ञान के आधारभूत ग्रंथ 'पाणिनीय शिक्षा' से प्रेरित है। इस विषय के मूल प्रवर्तक महर्षि पाणिनि हैं। इसमें वर्णों के उच्चारण में होने वाले आभ्यंतर प्रयत्नों का वैज्ञानिक वर्णन किया गया है। संस्कृत भाषा के शुद्ध उच्चारण के लिए यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है।


    English:

    This chapter is inspired by 'Paniniya Shiksha', the foundational text of Sanskrit grammar and phonetics. Sage Panini is the original exponent of this subject. The text provides a scientific explanation of the internal efforts (Aabhyantara Prayatna) required for pronunciation.


    EXAM TIP:परीक्षा में वर्णों के उच्चारण स्थान और प्रयत्न (आभ्यन्तर प्रयत्न) से लघु उत्तरीय प्रश्न पूछे जाते हैं।(Questions related to the 5 internal efforts—Sprishta, Vivrita, etc.—and the letters associated with them are frequently tested.)

    SECTION 3 — मूल पाठ


    १। पूर्वस्यां कक्षायां 'मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया' कथं भवतीति वयं सामान्यतः दृष्टवन्तः ।

    २। तत्रैव 'आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति - (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः' च इत्यपि वयम् अवलोकितवन्तः ।

    ३। तत्र (क) षट् स्थानानि; (ख) षट् करणानि इति उभयोः विषये वयं पूर्वस्यां कक्षायाम् एव विस्तरेण ज्ञातवन्तः।

    ४। अस्मिन् पाठे – (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः इत्यस्य विषये विस्तरेण अवगच्छामः ।

    ५। प्रयत्नः नाम किम् ?

    ६। वर्णानाम् उच्चारणकाले आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य यः व्यापारः भवति, तस्य व्यापारस्य नाम 'प्रयत्नः' अथवा 'यत्नः' इति ।

    ७। अयं प्रयत्नः पञ्चविधः भवति ।

    ८। ते यथा - १. स्पृष्ट-प्रयत्नः, २. ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः, ३. विवृत-प्रयत्नः, ४. ईषत्विवृत-प्रयत्नः, ५. संवृत-प्रयत्नः च ।

    ९। १. स्पृष्ट-प्रयत्नः

    १०। 'क्' वर्णादारभ्य 'म्' वर्ण-पर्यन्तम् आहत्य पञ्चविंशतिः (२५) 'स्पर्श'-वर्णाः सन्ति।

    ११। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानं पूर्णरूपेण स्पृशति ।

    १२। अतः एतेषां वर्णानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः 'स्पृष्टः' भवति ।

    १३। २. ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः

    १४। 'य्, र्, ल्, व्' इति चत्वारः 'अन्तःस्थ'-वर्णाः सन्ति।

    १५। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानम् 'ईषत्' (अल्पं) स्पृशति ।

    १६। अतः एतेषां वर्णानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः 'ईषत्स्पृष्टः' भवति ।

    १७। ३. विवृत-प्रयत्नः

    १८। 'अ' वर्णादारभ्य 'औ' वर्ण-पर्यन्तम् आहत्य नव (९) 'स्वर'-वर्णाः सन्ति।

    १९। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानं न स्पृशति अपि तु दूरे तिष्ठति ।

    २०। अतः एतेषां वर्णानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः 'विवृतः' भवति ।

    २१। ४. ईषत्विवृत-प्रयत्नः

    २२। 'श्, ष्, स्, ह्' इति चत्वारः 'ऊष्म'-वर्णाः सन्ति।

    २३। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानात् 'ईषत्' (अल्पं) दूरे तिष्ठति ।

    २४। अतः एतेषां वर्णानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः 'ईषत्विवृतः' भवति ।

    २५। ५. संवृत-प्रयत्नः

    २६। अवर्णस्य त्रयः उपभेदाः भवन्ति - ह्रस्वः 'अ', दीर्घः 'आ', प्लुतः 'आ३' च ।

    २७। एतेषु त्रिषु ह्रस्वस्य 'अ'-वर्णस्य प्रयोगकाले (उच्चारणकाले) करणं स्वस्थानात् ईषत् दूरे न तिष्ठति अपि तु अतीव-समीपम् आगच्छति ।

    २८। अतः केवलं ह्रस्वस्य 'अ' कारस्य प्रयोगकाले (उच्चारणकाले) आभ्यन्तर-प्रयत्नः 'संवृतः' भवति।


    SECTION 4 — अन्वय


    वाक्यम् ६:

    मूल: वर्णानाम् उच्चारणकाले आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य यः व्यापारः भवति, तस्य व्यापारस्य नाम 'प्रयत्नः' अथवा 'यत्नः' इति ।

    अन्वयः: वर्णानाम् उच्चारणकाले आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य यः व्यापारः भवति, तस्य व्यापारस्य नाम 'प्रयत्नः' अथवा 'यत्नः' इति [अस्ति]।

    वाक्यम् ११:

    मूल: एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानं पूर्णरूपेण स्पृशति ।

    अन्वयः: एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानं पूर्णरूपेण स्पृशति।

    (अन्वयः मूल वाक्य के समान है)

    वाक्यम् १९:

    मूल: एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानं न स्पृशति अपि तु दूरे तिष्ठति ।

    अन्वयः: एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानं न स्पृशति अपि तु दूरे तिष्ठति।

    (अन्वयः मूल वाक्य के समान है)

    वाक्यम् २७:

    मूल: एतेषु त्रिषु ह्रस्वस्य 'अ'-वर्णस्य प्रयोगकाले (उच्चारणकाले) करणं स्वस्थानात् ईषत् दूरे न तिष्ठति अपि तु अतीव-समीपम् आगच्छति ।

    अन्वयः: एतेषु त्रिषु ह्रस्वस्य 'अ'-वर्णस्य प्रयोगकाले करणं स्वस्थानात् ईषत् दूरे न तिष्ठति अपि तु अतीव-समीपम् आगच्छति।


    EXAM TIP:CBSE में व्याकरण-आधारित वाक्यों का अन्वय सीधा ही रहता है, केवल क्रियाओं (अस्ति/भवति) को स्पष्ट करना होता है।

    SECTION 5 — शब्दार्थ

    संस्कृत पद

    हिंदी अर्थ

    English Meaning

    वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया

    वाणी उत्पन्न होने की प्रक्रिया

    Process of speech production

    आस्यस्य

    मुख के

    Of the mouth

    अभ्यन्तरे

    भीतर / अंदर

    Inside / Within

    उत्पत्त्यर्थम्

    उत्पन्न करने के लिए

    For the production

    अवलोकितवन्तः

    देखा था / समझा था

    Observed / Understood

    अवगच्छामः

    हम समझते हैं

    We understand

    व्यापारः

    क्रिया / चेष्टा / कार्य

    Action / Effort / Operation

    स्पृष्टः

    छुआ हुआ (स्पर्श)

    Touched / Contacted

    ईषत्

    थोड़ा / हल्का

    Slightly / A little

    आहत्य

    कुल मिलाकर

    In total / Altogether

    अन्तःस्थ-वर्णाः

    य्, र्, ल्, व् (स्वर-व्यंजन के बीच)

    Semi-vowels

    विवृतः

    खुला हुआ

    Open

    ऊष्म-वर्णाः

    श्, ष्, स्, ह् (घर्षण से उत्पन्न)

    Sibilants / Fricatives

    संवृतः

    ढका हुआ / संकुचित

    Closed / Contracted

    उपभेदाः

    प्रकार / हिस्से

    Sub-types

    ह्रस्वः

    छोटा (स्वर)

    Short (vowel)

    दीर्घः

    बड़ा (स्वर)

    Long (vowel)

    प्लुतः

    लंबा खिंचने वाला (स्वर)

    Prolated (vowel)

    अतीव-समीपम्

    बहुत पास

    Very close

    करणम्

    जिह्वा आदि उच्चारण-साधन

    Articulator (tongue, lips, etc.)

    SECTION 6 — हिंदी अनुवाद


    १. पिछली कक्षा में 'मनुष्यों में वाणी (आवाज़) उत्पन्न होने की प्रक्रिया' कैसे होती है, यह हमने सामान्य रूप से देखा था।

    २. वहीं 'मुख के भीतर वर्णों को उत्पन्न करने के लिए तीन तत्वों की आवश्यकता होती है - (क) स्थान, (ख) करण (जीभ आदि), और (ग) आभ्यंतर प्रयत्न'—यह भी हमने देखा था।

    ३. उनमें से (क) छह स्थान और (ख) छह करण—इन दोनों के विषय में हम पिछली कक्षा में ही विस्तार से जान चुके हैं।

    ४. इस पाठ में हम (ग) आभ्यंतर प्रयत्न के विषय में विस्तार से समझेंगे।

    ५. प्रयत्न किसे कहते हैं?

    ६. वर्णों का उच्चारण करते समय मुख के भीतर करण (जीभ आदि) का जो कार्य (व्यापार/चेष्टा) होता है, उस कार्य का नाम 'प्रयत्न' या 'यत्न' है।

    ७. यह प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है।

    ८. वे इस प्रकार हैं - १. स्पृष्ट-प्रयत्न, २. ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्न, ३. विवृत-प्रयत्न, ४. ईषत्विवृत-प्रयत्न, और ५. संवृत-प्रयत्न।

    ९. १. स्पृष्ट-प्रयत्न:

    १०. 'क्' वर्ण से लेकर 'म्' वर्ण तक कुल पच्चीस (25) 'स्पर्श' वर्ण हैं।

    ११. इन वर्णों का उच्चारण करते समय करण अपने स्थान (तालु, मूर्धा आदि) को पूरी तरह से छूता (स्पर्श करता) है।

    १२. इसलिए इन वर्णों का आभ्यंतर प्रयत्न 'स्पृष्ट' होता है।

    १३. २. ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्न:

    १४. 'य्, र्, ल्, व्'—ये चार 'अन्तःस्थ' वर्ण हैं।

    १५. इन वर्णों का उच्चारण करते समय करण अपने स्थान को 'ईषत्' (बहुत थोड़ा/हल्का) छूता है।

    १६. इसलिए इन वर्णों का आभ्यंतर प्रयत्न 'ईषत्स्पृष्ट' होता है।

    १७. ३. विवृत-प्रयत्न:

    १८. 'अ' वर्ण से लेकर 'औ' वर्ण तक कुल नौ (9) 'स्वर' वर्ण हैं।

    १९. इन वर्णों का उच्चारण करते समय करण अपने स्थान को छूता नहीं है, बल्कि दूर रहता है (मुख खुला रहता है)।

    २०. इसलिए इन वर्णों का आभ्यंतर प्रयत्न 'विवृत' होता है।

    २१. ४. ईषत्विवृत-प्रयत्न:

    २२. 'श्, ष्, स्, ह्'—ये चार 'ऊष्म' वर्ण हैं।

    २३. इन वर्णों का उच्चारण करते समय करण अपने स्थान से 'ईषत्' (थोड़ा) दूर रहता है।

    २४. इसलिए इन वर्णों का आभ्यंतर प्रयत्न 'ईषत्विवृत' होता है।

    २५. ५. संवृत-प्रयत्न:

    २६. 'अ' वर्ण के तीन उपभेद (प्रकार) होते हैं - ह्रस्व (छोटा) 'अ', दीर्घ (बड़ा) 'आ', और प्लुत 'आ३'।

    २७. इन तीनों में से ह्रस्व 'अ' वर्ण के प्रयोग (उच्चारण) के समय करण अपने स्थान से थोड़ा दूर नहीं रहता, बल्कि बहुत पास आ जाता है (मुख संकुचित होता है)।

    २८. इसलिए केवल ह्रस्व 'अ' के प्रयोग (उच्चारण) के समय आभ्यंतर प्रयत्न 'संवृत' होता है।


    SECTION 7 — English Translation


    1. In the previous class, we generally looked at how the 'speech production process in humans' works.

    2. There itself, we also observed that 'to produce letters inside the mouth, three elements are necessary: (a) Place of articulation (Sthana), (b) Articulator (Karana), and (c) Internal effort (Aabhyantara Prayatna)'.

    3. Out of those, we already learned in detail about (a) the six places of articulation and (b) the six articulators in the previous class.

    4. In this chapter, we will understand in detail about (c) the Internal effort (Aabhyantara Prayatna).

    5. What is the meaning of Prayatna (effort)?

    6. During the pronunciation of letters, the action or movement of the articulator inside the mouth is called 'Prayatna' or 'Yatna'.

    7. This effort is of five types.

    8. They are: 1. Sprishta (Touched), 2. Ishat-sprishta (Slightly touched), 3. Vivrita (Open), 4. Ishat-vivrita (Slightly open), and 5. Samvrita (Closed).

    9. Sprishta Prayatna:

    10. From the letter 'K' up to the letter 'M', there are a total of twenty-five (25) 'Sparsha' (Mute/Stop) consonants.

    11. While pronouncing these letters, the articulator completely touches its respective place of articulation.

    12. Therefore, the internal effort for these letters is 'Sprishta'.

    13. Ishat-sprishta Prayatna:

    14. 'Y, R, L, V' – these four are 'Antahstha' (Semi-vowels) letters.

    15. While pronouncing these letters, the articulator 'slightly' (Ishat) touches its place of articulation.

    16. Therefore, the internal effort for these letters is 'Ishat-sprishta'.

    17. Vivrita Prayatna:

    18. From the letter 'A' up to the letter 'Au', there are a total of nine (9) 'Svara' (Vowel) letters.

    19. While pronouncing these letters, the articulator does not touch its place but stays away (the mouth remains open).

    20. Therefore, the internal effort for these letters is 'Vivrita'.

    21. Ishat-vivrita Prayatna:

    22. 'Sh, Sh (retroflex), S, H' – these four are 'Ushma' (Sibilants/Fricatives) letters.

    23. While pronouncing these letters, the articulator stays 'slightly' (Ishat) away from its place.

    24. Therefore, the internal effort for these letters is 'Ishat-vivrita'.

    25. Samvrita Prayatna:

    26. The letter 'A' has three sub-types: Short (Hrasva) 'A', Long (Dirgha) 'Aa', and Prolated (Pluta) 'Aa3'.

    27. Among these three, during the pronunciation of the short 'A', the articulator does not stay slightly away from its place but comes very close (contracted).

    28. Therefore, only during the pronunciation of the short 'A', the internal effort is 'Samvrita'.


    SECTION 8 — सारांश


    HINDI:

    प्रस्तुत पाठ "वर्णोच्चारण-शिक्षा २" संस्कृत व्याकरण के अत्यंत महत्वपूर्ण विषय 'आभ्यन्तर प्रयत्न' (उच्चारण करते समय मुख के भीतर होने वाली चेष्टा) का वैज्ञानिक वर्णन करता है। पाठ में बताया गया है कि वर्णों के उच्चारण के लिए स्थान, करण और प्रयत्न आवश्यक हैं। आभ्यन्तर प्रयत्न पाँच प्रकार के होते हैं: स्पृष्ट (जिसमें करण उच्चारण स्थान को पूरा छूता है - 'क्' से 'म्' तक 25 वर्ण), ईषत्स्पृष्ट (हल्का छूता है - य्, र्, ल्, व्), विवृत (खुला रहता है - सभी 9 स्वर), ईषत्विवृत (थोड़ा खुला रहता है - श्, ष्, स्, ह्) और संवृत (संकुचित रहता है - केवल ह्रस्व 'अ')। यह पाठ स्पष्ट करता है कि संस्कृत वर्णमाला का निर्माण कितना सूक्ष्म और वैज्ञानिक है।

    ENGLISH:

    The chapter "Varnoccarana-Shiksha 2" provides a scientific description of 'Aabhyantara Prayatna' (internal efforts during pronunciation), a crucial topic in Sanskrit phonetics. The text explains that the place of articulation, articulators, and internal efforts are essential for pronouncing letters. There are five types of internal efforts: Sprishta (complete touch – 25 consonants from 'K' to 'M'), Ishat-sprishta (slight touch – Y, R, L, V), Vivrita (open – all 9 vowels), Ishat-vivrita (slightly open – Sh, Sh, S, H), and Samvrita (closed/contracted – only short 'A'). The chapter highlights the precise and highly scientific nature of the Sanskrit alphabet system.


    SECTION 9 — केंद्रीय भाव एवं मूल्य


    9A. विषय-वस्तु सारणी

    विषय

    पाठ में स्पष्टीकरण

    मुख्य विषय

    संस्कृत वर्णमाला में ध्वनियों की उत्पत्ति और 'आभ्यन्तर प्रयत्न' का सूक्ष्म विभाजन। (Origin of sounds and internal efforts in the Sanskrit alphabet.)

    वैज्ञानिकता

    मुख के अंगों (करण और स्थान) का ध्वनियों के साथ सटीक और वैज्ञानिक संबंध। (Precise and scientific correlation between vocal organs and sounds.)

    9B. मानवीय एवं सांस्कृतिक मूल्य


    • वैज्ञानिकदृष्टिकोणः (वैज्ञानिक सोच / Scientific Temper)

      • वर्णानाम् उच्चारणकाले आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य यः व्यापारः भवति...

      • यह पाठ यह दर्शाता है कि हमारे प्राचीन ऋषियों (पाणिनि आदि) ने भाषा और ध्वनि का कितना गहरा और वैज्ञानिक अध्ययन किया था। हमें भी हर विषय को वैज्ञानिक दृष्टि से देखना चाहिए।

      • (Develops a scientific approach by showing the highly structured and logical framework of ancient Sanskrit phonetics.)

    • सूक्ष्मावलोकनम् (गहन निरीक्षण / Micro-observation)

      • ईषत् दूरे न तिष्ठति अपि तु अतीव-समीपम् आगच्छति।

      • 'थोड़ा छूना' और 'पूरा छूना' जैसे सूक्ष्म भेदों को समझना हमें जीवन के हर क्षेत्र में गहराई से निरीक्षण करने (micro-observation) की प्रेरणा देता है।

      • (Inspires the habit of deep and precise observation in all walks of life.)

    EXAM TIP:व्याकरण के पाठों में मूल्यपरक प्रश्न सीधे भाषा-विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जुड़ते हैं।

    SECTION 10 — मुख्य विचार-बिंदु (Key Arguments)

    यह पाठ एक निबंध/लेख है, अतः इसके मुख्य विचार-बिंदु निम्नलिखित हैं:


    १. आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य परिभाषा (Definition of Internal Effort)

    • Sanskrit: उच्चारणकाले आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य यः व्यापारः भवति, सः 'प्रयत्नः' इति।

    • Hindi: बोलते समय मुख के भीतर जीभ आदि (करण) की जो हलचल होती है, उसे प्रयत्न कहते हैं।

    • English: The specific movement of the articulator inside the mouth during pronunciation is called Prayatna.


    २. स्पृष्ट-ईषत्स्पृष्ट-भेदः (Difference between Sprishta and Ishat-sprishta)

    • Sanskrit: स्पृष्टप्रयत्ने करणं स्वस्थानं पूर्णरूपेण स्पृशति, परन्तु ईषत्स्पृष्टप्रयत्ने अल्पं स्पृशति।

    • Hindi: स्पृष्ट प्रयत्न में करण (जीभ) उच्चारण स्थान को पूरा छूता है (जैसे क, च, ट, त, प वर्ग), जबकि ईषत्स्पृष्ट में बहुत हल्का छूता है (य, र, ल, व)।

    • English: In Sprishta, the articulator makes complete contact, whereas in Ishat-sprishta, the contact is very slight.


    ३. विवृत-संवृत-स्वरूपम् (Nature of Vivrita and Samvrita)

    • Sanskrit: सर्वेषां स्वराणां प्रयत्नः विवृतः भवति, परन्तु केवलं ह्रस्वस्य 'अ' कारस्य प्रयोगकाले प्रयत्नः संवृतः भवति।

    • Hindi: सभी स्वरों का उच्चारण करते समय मुख खुला (विवृत) रहता है, लेकिन केवल छोटे 'अ' के उच्चारण में मुख संकुचित (संवृत) हो जाता है।

    • English: All vowels are open (Vivrita), but only the short 'A' is contracted (Samvrita) during active pronunciation.


    SECTION 11 — गद्यांश आधारित प्रश्न


    गद्यांशः १

    पूर्वस्यां कक्षायां 'मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया' कथं भवतीति वयं सामान्यतः दृष्टवन्तः । तत्रैव 'आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति - (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः' च इत्यपि वयम् अवलोकितवन्तः । तत्र (क) षट् स्थानानि; (ख) षट् करणानि इति उभयोः विषये वयं पूर्वस्यां कक्षायाम् एव विस्तरेण ज्ञातवन्तः। अस्मिन् पाठे – (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः इत्यस्य विषये विस्तरेण अवगच्छामः । प्रयत्नः नाम किम् ? वर्णानाम् उच्चारणकाले आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य यः व्यापारः भवति, तस्य व्यापारस्य नाम 'प्रयत्नः' अथवा 'यत्नः' इति । अयं प्रयत्नः पञ्चविधः भवति ।


    प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark):

    वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं कति तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति?

    (क) द्वे (ख) त्रीणि

    (ग) चत्वारि (घ) पञ्च

    उत्तरम्: (ख)

    हिंदी: गद्यांश के अनुसार वर्णों की उत्पत्ति के लिए तीन (स्थान, करण, प्रयत्न) तत्व आवश्यक हैं।

    English: Three elements are necessary for the production of letters.


    प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark):

    मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत —

    [ पञ्चविधः / व्यापारस्य / आस्यस्य ]

    वर्णानाम् उच्चारणकाले _______ अभ्यन्तरे करणस्य यः व्यापारः भवति...

    उत्तरम्: आस्यस्य

    हिंदी: वर्णों के उच्चारण के समय 'मुख के' (आस्यस्य) भीतर करण का जो व्यापार होता है...

    English: During pronunciation, the movement of the articulator inside the 'mouth' (Aasyasya)...


    प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark):

    'व्यापारः' इति पदस्य अर्थः अस्ति —

    (क) आपणः (ख) क्रिया / चेष्टा

    (ग) निद्रा (घ) शब्दः

    उत्तरम्: (ख)

    हिंदी: यहाँ व्यापार का अर्थ बिज़नेस नहीं, बल्कि 'क्रिया या हलचल' है।

    English: In this context, Vyaparah means action or effort.


    प्र.(iv) — प्रश्ननिर्माणम् (1 mark):

    अधोलिखितवाक्ये रेखाङ्कितपदम् आश्रित्य प्रश्नं रचयत —

    अयं प्रयत्नः पञ्चविधः भवति ।

    उत्तरम्: अयं प्रयत्नः कतिविधः भवति ?

    हिंदी: 'पञ्चविधः' संख्यावाचक प्रकार है, इसलिए 'कतिविधः' (कितने प्रकार का) का प्रयोग होगा।

    English: 'Panchavidhah' represents a number of types, so 'Katividhah' (how many types) is used.


    गद्यांशः २

    १. स्पृष्ट-प्रयत्नः — 'क्' वर्णादारभ्य 'म्' वर्ण-पर्यन्तम् आहत्य पञ्चविंशतिः (२५) 'स्पर्श'-वर्णाः सन्ति। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानं पूर्णरूपेण स्पृशति । अतः एतेषां वर्णानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः 'स्पृष्टः' भवति ।

    २. ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः — 'य्, र्, ल्, व्' इति चत्वारः 'अन्तःस्थ'-वर्णाः सन्ति। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानम् 'ईषत्' (अल्पं) स्पृशति । अतः एतेषां वर्णानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः 'ईषत्स्पृष्टः' भवति ।


    प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark):

    'क्' वर्णादारभ्य 'म्' वर्ण-पर्यन्तम् कति वर्णाः सन्ति?

    (क) विंशतिः (ख) पञ्चविंशतिः

    (ग) चत्वारः (घ) नव

    उत्तरम्: (ख)

    हिंदी: 'क्' से लेकर 'म्' तक कुल पच्चीस (पञ्चविंशतिः) वर्ण होते हैं।

    English: From 'K' to 'M', there are twenty-five (Panchavimshatih) letters.


    प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark):

    मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत —

    [ स्पृष्टः / ईषत् / अन्तःस्थ ]

    एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानम् _______ (अल्पं) स्पृशति ।

    उत्तरम्: ईषत्

    हिंदी: इन वर्णों के उच्चारण में करण अपने स्थान को 'ईषत्' (थोड़ा) छूता है।

    English: The articulator touches its place 'slightly' (Ishat).


    प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark):

    'आहत्य' इति पदस्य अर्थः अस्ति —

    (क) हत्वा (ख) मिलित्वा (कुल मिलाकर)

    (ग) गत्वा (घ) दृष्ट्वा

    उत्तरम्: (ख)

    हिंदी: आहत्य का अर्थ है 'कुल मिलाकर' या 'संपूर्ण रूप से'।

    English: Aahatya means 'in total' or 'altogether'.


    प्र.(iv) — प्रश्ननिर्माणम् (1 mark):

    अधोलिखितवाक्ये रेखाङ्कितपदम् आश्रित्य प्रश्नं रचयत —

    'य्, र्, ल्, व्' इति चत्वारः 'अन्तःस्थ'-वर्णाः सन्ति।

    उत्तरम्: 'य्, र्, ल्, व्' इति चत्वारः के सन्ति?

    हिंदी: 'अन्तःस्थ-वर्णाः' पुल्लिङ्ग प्रथमा बहुवचन है, अतः 'के' का प्रयोग होगा।

    English: 'Antahstha-varnah' is masculine plural, so 'Ke' (who/what) is used.


    SECTION 12 — लघु उत्तरीय प्रश्न (3 Marks)


    प्र१. 'प्रयत्नः' इति कः उच्यते?

    मूल बिंदु 1 (VP1): आस्यस्य अभ्यन्तरे (Inside the mouth)

    मूल बिंदु 2 (VP2): करणस्य यः व्यापारः भवति (The action/movement of the articulator)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    वर्णानाम् उच्चारणकाले आस्यस्य (मुखस्य) अभ्यन्तरे करणस्य (जिह्वादीनां) यः व्यापारः (क्रिया) भवति, तस्य व्यापारस्य नाम एव 'प्रयत्नः' अथवा 'यत्नः' इति उच्यते।

    हिंदी अनुवाद:

    वर्णों का उच्चारण करते समय मुख के भीतर करण (जीभ, ओंठ आदि) का जो व्यापार (चेष्टा या हलचल) होता है, उसी कार्य को 'प्रयत्न' या 'यत्न' कहा जाता है।

    English:

    During the pronunciation of letters, the specific action or movement of the articulator (like the tongue) inside the mouth is called 'Prayatna' or 'Yatna' (effort).


    प्र२. स्पृष्ट-प्रयत्नः केषां वर्णानां भवति, किमर्थं च?

    मूल बिंदु 1 (VP1): पञ्चविंशति-स्पर्शवर्णानाम् (Of the 25 Sparsha letters)

    मूल बिंदु 2 (VP2): करणं स्वस्थानं पूर्णरूपेण स्पृशति (Articulator touches its place completely)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    'क्' वर्णादारभ्य 'म्' वर्ण-पर्यन्तं ये पञ्चविंशतिः (२५) 'स्पर्श'-वर्णाः सन्ति, तेषां प्रयत्नः 'स्पृष्टः' भवति। यतोहि एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानं पूर्णरूपेण स्पृशति।

    हिंदी अनुवाद:

    'क्' वर्ण से लेकर 'म्' वर्ण तक जो पच्चीस (25) 'स्पर्श' वर्ण हैं, उनका प्रयत्न 'स्पृष्ट' होता है। क्योंकि इन वर्णों का उच्चारण करते समय करण (जीभ) अपने स्थान को पूरी तरह से स्पर्श करता (छूता) है।

    English:

    The internal effort for the twenty-five (25) 'Sparsha' letters from 'K' to 'M' is 'Sprishta'. This is because, during their pronunciation, the articulator completely touches its respective place of articulation.


    प्र३. विवृत-ईषत्विवृत-प्रयत्नयोः कः भेदः अस्ति?

    मूल बिंदु 1 (VP1): विवृते करणं दूरे तिष्ठति (In Vivrita, articulator stays far/open)

    मूल बिंदु 2 (VP2): ईषत्विवृते अल्पं दूरे तिष्ठति (In Ishat-vivrita, it stays slightly far)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    स्वरवर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानं न स्पृशति अपि तु दूरे तिष्ठति, अतः तेषां प्रयत्नः 'विवृतः' भवति। परन्तु 'श्, ष्, स्, ह्' इत्येतेषाम् ऊष्मवर्णानाम् उच्चारणे करणं स्वस्थानात् 'ईषत्' (अल्पं) एव दूरे तिष्ठति, अतः तेषां प्रयत्नः 'ईषत्विवृतः' भवति।

    हिंदी अनुवाद:

    स्वरों का उच्चारण करते समय करण अपने स्थान को नहीं छूता बल्कि दूर रहता है, इसलिए उनका प्रयत्न 'विवृत' (खुला) होता है। लेकिन 'श्, ष्, स्, ह्' इन ऊष्म वर्णों के उच्चारण में करण अपने स्थान से 'ईषत्' (थोड़ा) ही दूर रहता है, इसलिए उनका प्रयत्न 'ईषत्विवृत' होता है।

    English:

    While pronouncing vowels, the articulator stays away from its place, making their effort 'Vivrita' (open). However, while pronouncing the sibilants 'Sh, Sh, S, H', the articulator stays 'slightly' away, making their effort 'Ishat-vivrita' (slightly open).


    प्र४. संवृत-प्रयत्नः कस्य वर्णस्य भवति?

    मूल बिंदु 1 (VP1): केवलं ह्रस्वस्य 'अ' कारस्य (Only of the short 'A')

    मूल बिंदु 2 (VP2): प्रयोगकाले अतीव-समीपम् आगच्छति (Comes very close during usage)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    संवृत-प्रयत्नः केवलं ह्रस्वस्य (लघोः) 'अ' कारस्य प्रयोगकाले (उच्चारणकाले) एव भवति। यतोहि तस्य उच्चारणकाले करणं स्वस्थानात् ईषत् दूरे न तिष्ठति अपि तु अतीव-समीपम् आगच्छति।

    हिंदी अनुवाद:

    संवृत प्रयत्न केवल ह्रस्व (छोटे) 'अ' वर्ण के प्रयोग (उच्चारण) के समय ही होता है। क्योंकि उसके उच्चारण के समय करण अपने स्थान से थोड़ा दूर नहीं रहता, बल्कि बहुत पास आ जाता है (मुख संकुचित हो जाता है)।

    English:

    The 'Samvrita' (closed) effort occurs only during the active pronunciation of the short 'A' vowel. This is because, during its pronunciation, the articulator does not stay slightly away but comes very close to its place of articulation.


    SECTION 13 — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 Marks)


    प्र१. पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सोदाहरणं सविस्तरं वर्णनं कुरुत।

    मूल बिंदु 1 (VP1): स्पृष्टः तथा ईषत्स्पृष्टः (Sprishta for 25 consonants, Ishat-sprishta for Y,R,L,V)

    मूल बिंदु 2 (VP2): विवृतः तथा ईषत्विवृतः (Vivrita for 9 vowels, Ishat-vivrita for Sh,S,H)

    मूल बिंदु 3 (VP3): संवृतः (Samvrita for short A)

    मूल बिंदु 4 (VP4): प्रयत्नानां वैज्ञानिकता (The scientific nature of these efforts)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    वर्णानाम् उच्चारणकाले आस्यस्य अभ्यन्तरे जायमानः करणस्य व्यापारः आभ्यन्तर-प्रयत्नः कथ्यते। एषः पञ्चविधः भवति—

    १. स्पृष्ट-प्रयत्नः: यत्र करणं स्वस्थानं पूर्णतया स्पृशति। 'क्' तः 'म्' पर्यन्तं २५ स्पर्शवर्णाः अत्र आगच्छन्ति।

    २. ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः: यत्र करणं स्वस्थानम् अल्पं स्पृशति। य्, र्, ल्, व् इति चत्वारः अन्तःस्थवर्णाः अत्र आगच्छन्ति।

    ३. विवृत-प्रयत्नः: यत्र करणं दूरे तिष्ठति। सर्वे नव (९) स्वरवर्णाः (अ तः औ पर्यन्तम्) अत्र आगच्छन्ति।

    ४. ईषत्विवृत-प्रयत्नः: यत्र करणं स्वस्थानात् अल्पं दूरे तिष्ठति। श्, ष्, स्, ह् इति ऊष्मवर्णाः अत्र आगच्छन्ति।

    ५. संवृत-प्रयत्नः: यत्र करणम् अतीव समीपम् आगच्छति। केवलं ह्रस्वस्य 'अ' कारस्य उच्चारणकाले एव एषः प्रयत्नः भवति। एषः विभागः संस्कृतस्य वैज्ञानिकतां द्योतयति।

    हिंदी अनुवाद:

    वर्णों का उच्चारण करते समय मुख के भीतर होने वाली करण की चेष्टा आभ्यंतर प्रयत्न कहलाती है। यह पाँच प्रकार का होता है:

    १. स्पृष्ट प्रयत्न: जहाँ करण अपने स्थान को पूरी तरह छूता है। 'क्' से 'म्' तक के 25 स्पर्श वर्ण इसमें आते हैं।

    २. ईषत्स्पृष्ट प्रयत्न: जहाँ करण अपने स्थान को थोड़ा छूता है। य्, र्, ल्, व् ये चार अन्तःस्थ वर्ण इसमें आते हैं।

    ३. विवृत प्रयत्न: जहाँ करण दूर रहता है। सभी 9 स्वर वर्ण (अ से औ तक) इसमें आते हैं।

    ४. ईषत्विवृत प्रयत्न: जहाँ करण अपने स्थान से थोड़ा दूर रहता है। श्, ष्, स्, ह् ये चार ऊष्म वर्ण इसमें आते हैं।

    ५. संवृत प्रयत्न: जहाँ करण बहुत पास आ जाता है। यह केवल छोटे 'अ' के उच्चारण के समय होता है। यह विभाजन संस्कृत की वैज्ञानिकता को दर्शाता है।

    English:

    The movement of the articulator inside the mouth during pronunciation is called Aabhyantara Prayatna. It is of five types:

    1. Sprishta Prayatna: Where the articulator fully touches its place. The 25 stop consonants from 'K' to 'M' fall here.

    2. Ishat-sprishta Prayatna: Where the articulator touches slightly. The 4 semi-vowels (Y, R, L, V) fall here.

    3. Vivrita Prayatna: Where the articulator stays far/open. All 9 vowels (A to Au) fall here.

    4. Ishat-vivrita Prayatna: Where the articulator stays slightly away. The 4 sibilants (Sh, Sh, S, H) fall here.

    5. Samvrita Prayatna: Where the articulator comes very close. This happens only during the active pronunciation of the short 'A'. This classification demonstrates the scientific nature of Sanskrit.


    प्र२. वागुत्पत्तिप्रक्रियायां करणस्य आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य च का भूमिका अस्ति? पाठस्य आधारेण स्पष्टीकुरुत।

    मूल बिंदु 1 (VP1): उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि (Three elements are needed for sound)

    मूल बिंदु 2 (VP2): करणस्य व्यापारः (Movement of the articulator)

    मूल बिंदु 3 (VP3): प्रयत्नस्य भेदाः (Differences based on effort)

    मूल बिंदु 4 (VP4): स्पष्टोच्चारणाय आवश्यकता (Necessity for clear pronunciation)

    उत्तरम् (Sanskrit):

    'मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रियायाम्' आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति—स्थानम्, करणम्, आभ्यन्तर-प्रयत्नश्च। अत्र करणस्य प्रयत्नस्य च महती भूमिका अस्ति। 'करणम्' अर्थात् जिह्वादीनि अङ्गानि यानि उच्चारणस्थानानि स्पृशन्ति। वर्णानाम् उच्चारणकाले तस्य करणस्य यः व्यापारः (गतिविधिः) भवति, सः एव 'आभ्यन्तर-प्रयत्नः' कथ्यते। यदि करणं पूर्णतया स्पृशति तर्हि स्पृष्ट-प्रयत्नः (क्-म्) भवति। यदि करणं दूरे तिष्ठति तर्हि विवृत-प्रयत्नः (स्वराः) भवति। एतस्य व्यापारस्य (प्रयत्नस्य) सूक्ष्मभेदात् एव वर्णानां ध्वनिषु भेदः उत्पद्यते। अतः शुद्धोच्चारणाय एतयोः ज्ञानम् अतीव आवश्यकम् अस्ति।

    हिंदी अनुवाद:

    मनुष्यों में वाणी उत्पन्न होने की प्रक्रिया में, मुख के भीतर वर्णों को पैदा करने के लिए तीन तत्वों की आवश्यकता होती है—स्थान, करण और आभ्यंतर प्रयत्न। इसमें करण और प्रयत्न की बहुत बड़ी भूमिका है। 'करण' का अर्थ है जीभ आदि अंग जो उच्चारण स्थानों को छूते हैं। वर्णों का उच्चारण करते समय उस करण का जो व्यापार (गतिविधि) होता है, वही 'आभ्यंतर प्रयत्न' कहलाता है। यदि करण पूरी तरह छूता है तो स्पृष्ट प्रयत्न (क्-म्) होता है। यदि करण दूर रहता है तो विवृत प्रयत्न (स्वर) होता है। इसी व्यापार (प्रयत्न) के सूक्ष्म अंतर से ही वर्णों की आवाज़ों में अंतर पैदा होता है। इसलिए शुद्ध उच्चारण के लिए इनका ज्ञान बहुत ज़रूरी है।

    English:

    In the speech production process in humans, three elements are necessary to produce letters inside the mouth: place (Sthana), articulator (Karana), and internal effort (Aabhyantara Prayatna). The articulator and its effort play a massive role here. 'Karana' refers to organs like the tongue that touch the places of articulation. During pronunciation, the specific movement of this articulator is called 'Aabhyantara Prayatna'. If the articulator touches completely, it is a Sprishta effort (K-M). If it stays away, it is a Vivrita effort (vowels). It is through the subtle differences in this movement (effort) that the distinct sounds of letters are created. Therefore, their knowledge is highly essential for pure pronunciation.

    About BhashaLab


    BhashaLab is a dynamic platform dedicated to the exploration and mastery of languages - operating both online and offline. Aligned with the National Education Policy (NEP) 2020 and the National Credit Framework (NCrF), we offer language education that emphasizes measurable learning outcomes and recognized, transferable credits.


    We offer:

    1. NEP alligned offline language courses for degree colleges - English, Sanskrit, Marathi and Hindi

    2. NEP alligned offline language courses for schools - English, Sanskrit, Marathi and Hindi

    3. Std VIII, IX and X - English and Sanskrit Curriculum Tuitions - All boards

    4. International English Olympiad Tuitions - All classes

    5. Basic and Advanced English Grammar - Offline and Online - Class 3 and above

    6. English Communication Skills for working professionals, adults and students - Offline and Online


    Contact: +91 86577 20901, +91 97021 12044



     
     
     

    Comments


    bottom of page