2 - सरोज स्मृति (Saroj Smriti) - Class 12 - Antara 2
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सरोज स्मृति (Saroj Smriti)
Class 12 - Hindi Elective (Antara Bhag 2) |
Poet: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (Suryakant Tripathi 'Nirala')
1. कवि परिचय (Literary Profile)
साहित्यिक विशेषताएँ (Literary Traits): सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' छायावाद (Chhayavad) के प्रमुख आधार स्तंभ और 'मुक्त छंद' (Free Verse) के प्रवर्तक हैं। उनके काव्य में पौरुष, ओज, और विद्रोह का स्वर है, साथ ही करुणा और मानवीय संवेदनाओं की गहरी धारा भी बहती है। वे शोषितों के प्रति सहानुभूति और पाखंड के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हैं।
प्रमुख रचनाएँ (Key Works):
काव्य: अनामिका (जिसमें 'सरोज स्मृति' संकलित है), परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, राम की शक्ति पूजा।
उपन्यास: बिल्लेसुर बकरिहा, निरुपमा।
2. पाठ/कविता का सार (Executive Summary)
प्रतिपाद्य (Central Theme): 'सरोज स्मृति' हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ 'शोक-गीत' (Elegy) माना जाता है। इसमें निराला जी ने अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की अकाल मृत्यु पर गहरा दुख व्यक्त किया है। यह कविता केवल शोक नहीं, बल्कि एक पिता के संघर्ष, समाज से उसकी टकराहट और अपनी पुत्री के प्रति अकर्मण्यता (कुछ न कर पाने) के पश्चाताप का दस्तावेज है।
English Explanation: 'Saroj Smriti' is a poignant elegy written by Nirala in memory of his deceased daughter, Saroj. It reflects the poet's intense grief, his helplessness as a father, his financial struggles, and his rebellion against social rituals. He vividly recalls her simple wedding and her untimely death.
Key Points:
विवाह का चित्रण: सरोज का विवाह अत्यंत सादगी से हुआ; कोई रिश्तेदार, संगीत या शोर-शराबा नहीं था।
स्मृतियाँ: सरोज को देखकर कवि को अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद आती है।
ननिहाल का प्रेम: सरोज का पालन-पोषण और अंत समय ननिहाल (नाना-नानी के घर) में ही बीता।
पिता का विलाप: कवि स्वयं को 'भाग्यहीन' कहते हैं और अपने 'दुखमय जीवन' की कथा कहते हैं। अंत में वे अपने 'सत्कर्मों' का तर्पण अपनी पुत्री को करते हैं।
2.1 पद्यांश अनुवाद (Line-by-Line Translation)
पंक्ति (Original Line) | हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning) | English Translation |
देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल। | मैंने तुम्हारा विवाह देखा जो पूरी तरह (आमूल) नया (नवल) था। जब तुम पर पवित्र कलश का जल छिड़का जा रहा था... | I saw a wedding that was completely new/unique; when the auspicious water from the urn was sprinkled on you... |
देखती मुझे तू हँसी मंद, होठों में बिजली फँसी स्पंद | ...तब तुम मंद-मंद हँसी के साथ मुझे देख रही थीं। तुम्हारे होठों में बिजली जैसी एक कंपन (स्कोर/चमक) फँसी हुई थी। | ...You looked at me with a gentle smile; a vibration like captured lightning was trapped in your lips. |
उर में भर झूली छबि सुंदर, प्रिय की अशब्द शृंगार-मुखर | तुम्हारे हृदय में अपने पति की सुंदर छवि झूल रही थी। यह एक ऐसा शृंगार था जो बिना शब्दों (अशब्द) के भी बहुत कुछ कह रहा था। | A beautiful image (of your husband) swayed in your heart; a silent makeup/adornment expressive of love. |
तू खुली एक-उच्छ्वास-संग, विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग | तुम एक गहरी साँस (उच्छ्वास) के साथ खिली हुई लग रही थीं। तुम्हारे अंग-अंग में विश्वास स्थिरता के साथ बँधा हुआ था। | You blossomed with a deep breath; every part of your body was bound with firm confidence. |
नत नयनों से आलोक उतर, काँपा अधरों पर थर-थर-थर। | तुम्हारी झुकी हुई आँखों से एक चमक (आलोक) उतरकर तुम्हारे होठों पर आकर थर-थर काँप रही थी (लज्जा और खुशी का मिश्रण)। | Light descended from your bowed eyes and trembled upon your lips. |
देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति, मेरे वसंत की प्रथम गीति- | मैंने देखा कि तुम धैर्य (धीति) की साक्षात मूर्ति थीं। तुम मेरे जीवन के वसंत (यौवन/खुशी) का पहला गीत लग रही थीं। | I saw that you were an idol of patience; (you reminded me of) the first song of my spring (youth). |
श्रृंगार रहा जो निराकार, रस कविता में उच्छ्वसित-धार | तुम्हारा शृंगार बिना किसी आभूषण के (निराकार) था, बिल्कुल वैसा ही जैसे मेरी कविताओं में श्रृंगार रस की धारा बहती है। | Your adornment was formless (simple/without jewelry), like the overflowing stream of sentiment (Ras) in my poetry. |
गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग-भरता प्राणों में राग-रंग, | वह सौंदर्य ऐसा था जैसा मैंने अपनी स्वर्गीय पत्नी के साथ मिलकर गीतों में गाया था, जो मेरे प्राणों में प्रेम और उत्साह भरता था। | It was like the song I sang with my late wife, filling my soul with melody and color. |
रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना मही। | (पत्नी का) वही रति (कामदेव की पत्नी) जैसा सुंदर रूप आज 'आकाश' से उतरकर 'पृथ्वी' (मही) के रूप में (सरोज के रूप में) सामने था। | That same Rati-like beauty (of my wife) was manifesting; the sky had transformed into the earth (descended in you). |
हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन, कोई थे नहीं, न आमंत्रण | तुम्हारा विवाह संपन्न हो गया। वहाँ कोई अपना रिश्तेदार (स्वजन) नहीं था, न ही किसी को निमंत्रण भेजा गया था। | The wedding took place. There were no close relatives, nor was any invitation sent. |
था भेजा गया, विवाह-राग, भर रहा न घर निशि-दिवस जाग; | विवाह के गीत (विवाह-राग) नहीं गाए गए और न ही घर में रात-दिन का कोई जागरण (रतजगा) हुआ। | No wedding songs were sung, nor did the house echo with singing festivities day and night. |
प्रिय मौन एक संगीत भरा, नव जीवन के स्वर पर उतरा। | वहाँ केवल एक 'प्रिय मौन' (प्यारी खामोशी) संगीत की तरह छाया हुआ था, जो तुम्हारे नए जीवन में प्रवेश कर रहा था। | Only a beloved silence, filled with music, descended upon the tone of your new life. |
माँ की कुल शिक्षा मैंने दी, पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची, | (माँ न होने के कारण) माँ द्वारा दी जाने वाली कुल की शिक्षा भी मैंने ही दी और तुम्हारी फूलों की सेज भी मैंने स्वयं सजाई। | I imparted the maternal teachings myself; I myself decorated your flower-bed. |
सोचा मन में, "वह शकुंतला, पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।" | मैंने मन में सोचा कि तुम 'शकुंतला' (कण्व ऋषि की पालिता पुत्री) जैसी हो, लेकिन तुम्हारी कहानी (पाठ) और स्थिति उससे अलग है। | I thought in my mind, "She is Shakuntala, but this lesson is different, this art is different." |
कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद, बैठी नानी की स्नेह-गोद। | विवाह के कुछ दिन बाद तुम खुशी-खुशी (समोद) नानी की प्यार भरी गोद (ननिहाल) में जाकर बैठ गई। | After staying home for a few days, you joyfully went to sit in the affectionate lap of your grandmother (maternal home). |
मामा-मामी का रहा प्यार, भर जलद धरा को ज्यों अपार; | वहाँ मामा और मामी का प्यार तुम्हें वैसे ही मिला जैसे बादल (जलद) धरती पर अपार जल बरसाते हैं। | You received the love of your uncle and aunt, just as clouds pour abundant water on the earth. |
वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त, तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त; | वे ही तुम्हारे सुख-दुख में हमेशा शामिल (न्यस्त) रहे और तुम्हारी भलाई (हित) के लिए हमेशा व्यस्त रहे। | They were the ones involved in your joys and sorrows; always busy working for your welfare. |
वह लता वहीं की, जहाँ कली, तू खिली, स्नेह से हिली, पली, | (तुम्हारी माँ) वह लता भी वहीं की थी जहाँ तुम कली बनकर खिली। तुम वहीं प्यार से पली और बड़ी हुई। | That creeper (your mother) belonged to the same place where you blossomed as a bud; you grew up there in affection. |
अंत भी उसी गोद में शरण, ली, मूँदे दृग वर महामरण! | अंत में, तुमने उसी गोद (ननिहाल) में शरण ली और मृत्यु (महामरण) का वरण करके अपनी आँखें (दृग) सदा के लिए मूँद लीं। | In the end, you took refuge in that same lap, closing your eyes to welcome the great death! |
मुझ भाग्यहीन की तू संबल, युग वर्ष बाद जब हुई विकल, | तुम मुझ भाग्यहीन पिता का एकमात्र सहारा (संबल) थी। बरसों बाद जब मेरी वेदना व्याकुल होकर बाहर आ रही है... | You were the only support of this unfortunate father; years later when I became restless (with grief)... |
दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही! | ...तो मुझे लगता है कि दुख ही मेरे जीवन की कहानी रही है। आज मैं वह दुख क्या कहूँ जो मैंने अब तक किसी से नहीं कहा? | ...Sorrow has been the story of my life; what should I say today that I haven't said before! |
हो इसी कर्म पर वज्रपात, यदि धर्म, रहे नत सदा माथ | अगर मेरे कर्मों पर वज्रपात (विपत्ति) भी हो जाए, तो भी अगर मेरा धर्म (सत्य/ईमानदारी) साथ है, तो मेरा सिर हमेशा झुका रहे (स्वीकार भाव से)। | May lightning strike my works/karma; but if Dharma is with me, may my head always remain bowed (in acceptance). |
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल, हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल ! | मैं चाहता हूँ कि मेरे जीवन के सारे पुण्य कार्य, सर्दी में मुरझाए हुए कमल (शतदल) की तरह नष्ट हो जाएँ (मैं उन्हें न्योछावर करता हूँ)। | On this path, may all my deeds be destroyed/withered like a lotus in the winter! |
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण, कर, करता मैं तेरा तर्पण! | हे बेटी (कन्ये)! मैं अपने पिछले जन्मों के और इस जीवन के सारे सत्कर्म तुम्हें अर्पित करके तुम्हारा तर्पण करता हूँ। | O Daughter! Dedicating all my past good deeds to you, I perform your Tarpan (ritual offering)! |
3. कठिन शब्दार्थ (Glossary)
शब्द (Word) | अर्थ (Hindi Meaning) | English Context |
आमूल | पूरी तरह / जड़ से | Completely / Thoroughly |
उच्छ्वास | गहरी साँस / आह | Deep breath / Sigh |
स्तब्ध | स्थिर / शांत | Stunned / Still |
धीति | धैर्य / धारण करने वाली | Patience / Steadfastness |
मही | पृथ्वी / धरती | Earth |
निशि-दिवस | रात-दिन | Night and Day |
समोद | हर्ष सहित / खुशी से | With joy / Happily |
जलद | बादल | Cloud |
न्यस्त | निहित / स्थित | Vested / Situated in |
शतदल | कमल (सौ पंखुड़ियों वाला) | Lotus |
तर्पण | पितरों/देवताओं को जल देने की क्रिया | Ritual offering of water to ancestors |
वज्रपात | भारी विपत्ति / बिजली गिरना | Lightning strike / Calamity |
4. साहित्यिक विश्लेषण (Literary Analysis)
भाव पक्ष (Thematic Aspect):
रस (Ras): मुख्य रूप से 'करुण रस' (Pathos) है। पिता का विलाप और पुत्री की मृत्यु का वर्णन हृदय विदारक है। 'वात्सल्य' (Parental love) का भी सुंदर चित्रण है।
वेदना (Emotion): कवि ने 'भाग्यहीन पिता' के रूप में अपनी असहायता व्यक्त की है।
कला पक्ष (Artistic Aspect):
भाषा (Language): तत्सम प्रधान (Sanskritized) खड़ी बोली हिंदी। भाषा में ओज और माधुर्य दोनों गुण हैं।
अलंकार (Figures of Speech):
रूपक (Metaphor): "शृंगार रहा जो निराकार", "आकाश बदल कर बना मही"।
उपमा (Simile): "भर जलद धरा को ज्यों अपार" (मामा के प्यार की तुलना बादल से)।
मानवीकरण (Personification): "नीरवता अनंत अंगड़ाई"।
शैली: यह एक शोक-गीत (Elegy) है जो मुक्त छंद (Free Verse) में लिखा गया है।
बिंब (Imagery): "नत नयनों से आलोक उतर" - इसमें दृश्य बिंब (Visual Imagery) है।
5. काव्यांश आधारित प्रश्न (Extract-Based Competency)
संदर्भ 1:
"देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति- शृंगार रहा जो निराकार"
'मूर्ति-धीति' किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर: 'मूर्ति-धीति' (धैर्य की मूर्ति) सरोज को कहा गया है। उसने अपनी माँ के बिना जीवन के संघर्षों को धैर्यपूर्वक सहा और विवाह के समय भी वह शांत और गंभीर थी।
'मेरे वसंत की प्रथम गीति' का क्या आशय है?
उत्तर: वसंत का अर्थ 'यौवन' और 'खुशी' है। कवि सरोज को अपने युवावस्था के पहले गीत (या प्रेम का पहला फल) के रूप में देखते हैं। वह उनकी खुशियों का प्रतीक थी।
'शृंगार रहा जो निराकार' में कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर: सरोज का विवाह सादगीपूर्ण था। उसने सोने-चाँदी के गहने नहीं पहने थे, उसका सौंदर्य उसके प्राकृतिक रूप और सादगी (निराकार) में ही निहित था।
संदर्भ 2:
"मुझ भाग्यहीन की तू संबल युग वर्ष बाद जब हुई विकल, दुख ही जीवन की कथा रही क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"
कवि ने स्वयं को 'भाग्यहीन' क्यों कहा है?
उत्तर: क्योंकि कवि ने बचपन में माता-पिता, फिर युवावस्था में पत्नी और अब पुत्री को खो दिया। जीवन भर आर्थिक तंगी और समाज के विरोध का सामना करना पड़ा।
'दुख ही जीवन की कथा रही' पंक्ति क्या दर्शाती है?
उत्तर: यह पंक्ति निराला के संपूर्ण जीवन के संघर्ष और त्रासदी को दर्शाती है। उनके जीवन में सुख के पल बहुत कम आए, केवल दुख ही स्थायी रहा।
'संबल' शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताइए कि कवि का संबल कौन था?
उत्तर: 'संबल' का अर्थ है 'सहारा'। कवि के बुढ़ापे और दुखद जीवन का एकमात्र सहारा उनकी पुत्री सरोज थी, जो अब नहीं रही।
6. पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर (Textbook Q&A)
A. बोधात्मक प्रश्न (Short Answer)
प्रश्न 1: सरोज के नव-वधू रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर: सरोज का वधू रूप अत्यंत सादा और प्राकृतिक था। उसने भारी गहने नहीं पहने थे। उसके होठों पर बिजली जैसी चमक और आँखों में लज्जा थी। उसका रूप उसकी माँ जैसा सुंदर और पवित्र था, मानो आकाश से पत्नी का सौंदर्य उतर आया हो।
प्रश्न 2: कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी की याद क्यों आई?
उत्तर: विवाह के समय सरोज को सजा हुआ देखकर कवि को लगा कि सरोज का रूप-रंग और लावण्य बिल्कुल उसकी माँ (कवि की पत्नी) जैसा है। सरोज में उन्हें अपनी पत्नी के सौंदर्य की झलक दिखाई दी, इसलिए उन्हें पत्नी की याद आई।
प्रश्न 3: 'आकाश बदल कर बना मही' में 'आकाश' और 'मही' शब्द किनकी ओर संकेत करते हैं?
उत्तर: 'आकाश' का संकेत कवि की स्वर्गीय पत्नी (जो अब सूक्ष्म लोक में है) की ओर है और 'मही' (धरती) का संकेत पुत्री सरोज की ओर है। भाव यह है कि पत्नी का अलौकिक सौंदर्य ही बेटी के रूप में साकार होकर धरती पर आ गया है।
प्रश्न 4: सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था?
उत्तर: सरोज का विवाह पूरी तरह 'नवल' (नया) था। इसमें न तो कोई रिश्तेदार बुलाए गए, न निमंत्रण पत्र भेजे गए, न विवाह के गीत गाए गए, और न ही कोई शोर-शराबा हुआ। यह पूर्णतः शांत और सादगीपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।
B. विश्लेषणात्मक प्रश्न (Long Answer)
प्रश्न 1: 'वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली' पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है?
उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने सरोज के ननिहाल (मामा का घर) से गहरे संबंध को बताया है। 'लता' सरोज की माँ (मनोहरा देवी) हैं और 'कली' सरोज है। जैसे माँ (लता) का बचपन उस घर में बीता, वैसे ही माँ की मृत्यु के बाद सरोज (कली) का पालन-पोषण भी उसी ननिहाल की गोद में हुआ।
प्रश्न 2: 'मुझ भाग्यहीन की तू संबल' - क्या यह पंक्ति 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे कार्यक्रम की माँग करती है?
उत्तर: हाँ, परोक्ष रूप से यह पंक्ति बेटियों के महत्व को रेखांकित करती है। निराला जी स्वीकारते हैं कि एक पिता के लिए बेटी ही उसका सबसे बड़ा सहारा (संबल) होती है। यह पंक्ति समाज को संदेश देती है कि बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि शक्ति और संबल समझना चाहिए।
प्रश्न 3: निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए-
(क) नत नयनों से आलोक उतर: विवाह के समय लज्जा से झुकी हुई आँखों से एक विशेष चमक (आलोक) उतरकर चेहरे पर फैल रही थी, जो खुशी और पवित्रता का प्रतीक थी।
(ख) शृंगार रहा जो निराकार: सरोज का शृंगार बाह्य आभूषणों का मोहताज नहीं था। वह सादगी और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण था, जैसे निराला की कविता में भावों का सौंदर्य होता है।
(ग) पर पाठ अन्य यह, अन्य कला: शकुंतला ऋषि पुत्री थी और उसकी माँ उसे छोड़कर चली गई थी, सरोज की स्थिति भी वैसी थी। परन्तु शकुंतला को विदा करने के लिए पिता कण्व और आश्रमवासी थे, जबकि सरोज के विवाह में पिता निराला अकेले थे और शिक्षा भी उन्होंने स्वयं दी। इसलिए यह 'पाठ' अलग था।
(घ) यदि धर्म, रहे नत सदा माथ: कवि कहते हैं कि यदि मेरे जीवन में धर्म (सत्य और न्याय) साथ है, तो मैं हर विपत्ति (वज्रपात) को सिर झुकाकर स्वीकार करने को तैयार हूँ। वे कर्मफल भोगने से डरते नहीं हैं।
7. अभिव्यक्ति और माध्यम (Creative Writing Connection)
संबंधित आलेख विषय: "पिता-पुत्री का आत्मीय रिश्ता" या "भारतीय विवाहों में सादगी की आवश्यकता"
मुख्य बिंदु:
निराला और सरोज का भावनात्मक संबंध।
दिखावे से दूर, भावनाओं को महत्व देना।
एक पिता का संघर्ष और बेटी का साथ।
विवाह में फिजूलखर्ची रोकने का संदेश।
8. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण कथन (Key Quotes)
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!" (निराला के जीवन संघर्ष पर उत्तर लिखने के लिए सर्वश्रेष्ठ पंक्ति)।
"मुझ भाग्यहीन की तू संबल।" (पिता-पुत्री प्रेम दर्शाने के लिए)।
"कन्ये, गत कर्मों का अर्पण कर, करता मैं तेरा तर्पण!" (कविता के अंत और पिता के त्याग को दिखाने के लिए)।
9. सामान्य त्रुटियाँ (Common Student Errors)
अवधारणा (Concept): छात्र अक्सर इसे सामान्य 'वियोग' कविता मान लेते हैं, जबकि यह एक 'शोक-गीत' (Elegy) है, जो हिंदी में दुर्लभ विधा है। इसमें मृत्यु का वर्णन है, केवल जुदाई का नहीं।
वर्तनी (Spelling): 'सूर्यकांत' (सही), 'सुरकान्त' (गलत)। 'उच्छ्वास' (सही)। 'शृंगार' (सही - 'श्र' में 'ऋ' की मात्रा का ध्यान रखें)।
अर्थ: 'आकाश बदल कर बना मही' का अर्थ मौसम बदलना नहीं, बल्कि 'माँ के रूप का बेटी में उतरना' है।
10. विगत वर्षों के बोर्ड प्रश्न (PYQs)
प्रश्न 1 (लघु - 2 अंक): 'सरोज स्मृति' कविता में कवि ने 'शकुंतला' का स्मरण क्यों किया?
उत्तर: शकुंतला (कालिदास की नायिका) भी माँ-विहीन थी और पिता कण्व ने उसका पालन किया था। सरोज भी माँ-विहीन थी और निराला ने ही उसे माँ और पिता दोनों का स्नेह दिया। इसलिए समानता के कारण उन्हें शकुंतला की याद आई।
प्रश्न 2 (लघु - 2 अंक): 'दुख ही जीवन की कथा रही' पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर: निराला का जीवन सदैव पारिवारिक मृत्यु (पत्नी, पिता, पुत्री), आर्थिक अभाव और सामाजिक विरोध से घिरा रहा। उन्हें कभी स्थायी सुख नहीं मिला। यह पंक्ति उनके जीवन की इसी त्रासदी को व्यक्त करती है।
प्रश्न 3 (दीर्घ - 5 अंक): 'सरोज स्मृति' के आधार पर निराला के 'पिता रूप' का चित्रण कीजिए।
उत्तर: निराला एक स्नेहिल और जिम्मेदार पिता हैं। पत्नी के न होने पर वे बेटी को 'माँ की शिक्षा' भी देते हैं और पुष्प-सेज भी सजाते हैं। वे समाज की परवाह न कर 'नवल' विवाह करते हैं। बेटी की मृत्यु पर वे टूट जाते हैं और अपने सारे पुण्य उसे अर्पित कर देते हैं। यह एक संघर्षशील और भावुक पिता का चित्र है।
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