2. सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः -Sukhasya Mulam Dharmah Dharmasya Mulam Arthah - Class 9 - Sharada
- Jun 9
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Updated: 4 days ago

SECTION 1 — पाठ परिचय
विवरण | जानकारी |
पाठ का नाम: | सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः (Sukhasya Mūlaṃ Dharmaḥ Dharmasya Mūlam Arthaḥ) |
विधा: | गद्य पाठ — निबंध / लेख |
स्रोत/ग्रंथ: | सङ्कलितः (कौटिल्य-अर्थशास्त्रम्, मनुस्मृतिः, गरुडपुराणम्, चाणक्यनीतिः, उपनिषदः) |
लेखक/कवि: | सङ्कलितः (अनेक प्राचीन ग्रन्थों से संकलित) |
पाठ्यपुस्तक: | शारदा, NCERT कक्षा 9 संस्कृत, 2026-27 |
परीक्षा खंड: | खंड-घ (साहित्य) — 25-30 अंक |
SECTION 2 — लेखक/स्रोत परिचय
SANSKRIT:
अयं पाठः सङ्कलितः अस्ति। पाठे कौटिल्यस्य 'अर्थशास्त्रम्', 'मनुस्मृतिः', 'गरुडपुराणम्', 'चाणक्यनीतिः', 'ईशावास्योपनिषद्' च इति प्रमुखानां ग्रन्थानां सूक्तयः सङ्कलिताः सन्ति। चाणक्यः (कौटिल्यः) मौर्यसाम्राज्यस्य संस्थापकः महान् अर्थशास्त्री च आसीत्। अस्य पाठस्य मुख्योद्देश्यं छात्रेषु आर्थिकसाक्षरतायाः, धनसञ्चयस्य, समुचितनिवेशस्य च महत्त्वं प्रतिपादनम् अस्ति।
हिंदी अनुवाद:
यह पाठ संकलित है, जिसमें कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र', 'मनुस्मृति', 'गरुडपुराण', 'चाणक्यनीति' और 'ईशावास्योपनिषद' जैसे प्रमुख ग्रंथों की सूक्तियाँ शामिल हैं। चाणक्य (कौटिल्य) मौर्य साम्राज्य के संस्थापक और एक महान अर्थशास्त्री थे। इस पाठ का मुख्य उद्देश्य छात्रों में वित्तीय साक्षरता (आर्थिक साक्षरता), धन संचय और उचित निवेश के महत्व को प्रतिपादित करना है।
English:
This is a compiled chapter featuring excerpts from prominent classical texts such as Kautilya's 'Arthashastra', 'Manu Smriti', 'Garuda Purana', 'Chanakya Niti', and the 'Upanishads'. Chanakya (Kautilya) was a great economist and the founder of the Maurya Empire. The chapter's primary significance lies in instilling financial literacy, the habit of saving, and the importance of proper investment among students.
EXAM TIP:परीक्षा में लेखक/स्रोत परिचय 5 अंकों के दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में पूछा जाता है।(Author/source introduction appears as a 5-mark long answer. Focus on the classical texts cited and the overarching theme of financial literacy.)
SECTION 3 — मूल पाठ
१। भारतीयधर्मशास्त्रेषु अनेकाः सूक्तयः विद्यन्ते, याः मानवजीवनस्य यथार्थतत्त्वं प्रतिपादयन्ति ।
२। तेष्वेकं प्रसिद्धं सूत्ररूपं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे अस्ति - “सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः ।”
३। अस्य आशयः अस्ति यत् वास्तविकसुखस्य आधारः धर्मः, धर्मपालनस्य च आधारः अर्थः ।
४। जीवने धर्मः, अर्थः, सुखम् इत्येतेषां त्रयाणां परस्परसम्बन्धः अविच्छिन्नः अस्ति।
५। यः जनः न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः धर्मपालनं कर्तुं समर्थः भवति, धर्मपालनेन च दीर्घकालिकं सुखं लभते ।
६। सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा चेत्यादीनां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूर्तये धनम् आवश्यकम्।
७। पर्याप्तधनस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति।
८। अतः धर्मशास्त्रे चतुर्वर्गेषु धर्मार्थकाममोक्षेषु अर्थः अन्यतमः स्तम्भः इति गण्यते।
९। उक्तं गरुडपुराणे - "ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।” अर्थात् दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।
१०। स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः त्रिविधः भवति – न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम्, औचित्यपूर्णः व्ययः, भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः च।
११। न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम् - सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम् इति।
१२। उक्तं भगवता मनुना - सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् । योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ॥ अस्य आशयः यत् अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ।
१३। औचित्यपूर्णः व्ययः - आवश्यकतानुसारं व्ययः करणीयः । आडम्बरपूर्णः प्रदर्शनकारी व्ययः अथवा विलासव्यसनाय व्ययः अपव्ययः भवति।
१४। भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः - उपार्जितधनस्य कश्चन भागः भविष्यसुरक्षायै सञ्चयनीयः । सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भवति ।
१५। छात्रजीवने आर्थिकसाक्षरता - अनेकदा छात्राः मातापितृभ्यां कष्टार्जितधनस्य तुच्छकारणैः अपव्ययं कुर्वन्ति ।
१६। जिह्वालालसापूर्त्यर्थं त्वरिताहारः, शीतपेयं, पुटीकृतभोजनं, तथैव व्यसनपदार्थानां सेवनं, यत्र प्रभूतः अपव्ययः भवति।
१७। अर्जितस्य सञ्चयः सञ्चितस्य च निवेशः - चाणक्यनीतौ उक्तम् - जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः । स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥
१८। भारतदेशे धनसञ्चयस्य सुरक्षितनिवेशस्य च कृते बहुविधाः मार्गाः सन्ति। (यथा- प्रधानमन्त्री-जनधनयोजना, सुकन्या-समृद्धि-योजना, नियतनिक्षेपः इत्याद्याः)।
१९। अर्थविषयकसचेतनता अस्मान् अभावात् उद्धृत्य आर्थिकसम्पन्नतां प्रति नयति।
२०। क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् । क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥
SECTION 4 — अन्वय
वाक्यम् १:
मूल: भारतीयधर्मशास्त्रेषु अनेकाः सूक्तयः विद्यन्ते, याः मानवजीवनस्य यथार्थतत्त्वं प्रतिपादयन्ति ।
अन्वयः: भारतीयधर्मशास्त्रेषु अनेकाः सूक्तयः विद्यन्ते, याः मानवजीवनस्य यथार्थतत्त्वं प्रतिपादयन्ति।
(अन्वयः मूल वाक्य के समान है)
वाक्यम् ५:
मूल: यः जनः न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः धर्मपालनं कर्तुं समर्थः भवति, धर्मपालनेन च दीर्घकालिकं सुखं लभते ।
अन्वयः: यः जनः न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः धर्मपालनं कर्तुं समर्थः भवति, च धर्मपालनेन दीर्घकालिकं सुखं लभते।
(अन्वयः मूल वाक्य के समान है)
वाक्यम् ९ (श्लोकांश):
मूल: ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।
अन्वयः: ब्राह्मे मुहूर्ते च उत्थाय धर्मम् अर्थं च चिन्तयेत्।
वाक्यम् १२ (श्लोकः):
मूल: सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् । योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ॥
अन्वयः: सर्वेषाम् एव शौचानाम् अर्थशौचं परं स्मृतम् [अस्ति]। यः हि अर्थे शुचिः [अस्ति], सः शुचिः [अस्ति]। मृद्वारिशुचिः शुचिः न [अस्ति]।
विशेष: यहाँ 'अस्ति' क्रिया को पूर्णता के लिए जोड़ा गया है। (The verb 'asti' is implied in the original verse).
वाक्यम् १७ (श्लोकः):
मूल: जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः । स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥
अन्वयः: जलबिन्दुनिपातेन घटः क्रमशः पूर्यते। सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च सः [एव] क्रमः [अस्ति]।
वाक्यम् २० (श्लोकः):
मूल: क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् । क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥
अन्वयः: क्षणशः कणशः च एव विद्याम् अर्थं च साधयेत्। क्षणे नष्टे [सति] विद्या कुतः [प्राप्यते]? कणे नष्टे [सति] धनम् कुतः [प्राप्यते]?
EXAM TIP:CBSE में 'अन्वयं पूरयत' प्रश्न के लिए सही Subject → Object → Verb क्रम अनिवार्य है।(CBSE tests Anvaya directly. Marks are lost when students reproduce the original word order. Ensure implied verbs like 'asti' are understood.)
SECTION 5 — शब्दार्थ
संस्कृत पद | हिंदी अर्थ | English Meaning |
अर्थोपार्जनम् | धन कमाना | Earning wealth |
अविच्छिन्नः | अटूट / निरन्तर | Inseparable |
अपव्ययः | व्यर्थ खर्च / अनुचित व्यय | Unnecessary expense |
सचेतनता | जागरूकता | Consciousness / Awareness |
तुच्छकारणैः | निरर्थक कारणों से | For trivial reasons |
प्रभूतः | पर्याप्त / अत्यधिक | Abundant |
कष्टार्जितधनस्य | कष्ट से कमाए हुए धन का | Of wealth earned with difficulty |
पुटीकृतभोजनम् | डिब्बाबन्द खाना | Packaged food |
त्वरिताहारः | शीघ्र आहार (फास्ट फ़ूड) | Fast Food |
शीतपेयम् | ठंडा पेय (कोल्ड ड्रिंक) | Cold drink |
नियतनिक्षेपः | निश्चित अवधि के लिए जमा | Fixed Deposit (FD) |
चक्रवृद्ध्यंशेन | चक्रवृद्धि ब्याज से | By Compound Interest |
विलासव्यसनाय | सुख भोग के लिए | For luxury and enjoyment |
विपन्ना | संकटग्रस्त / नष्ट | Destitute |
उद्धृत्य (उद्+हृ+ल्यप्) | ऊपर उठाकर | By lifting up |
सञ्चयः | इकट्ठा करना | Accumulation / Savings |
कालान्तरेण | समय बीतने पर | By the passage of time |
अवाप्तुम् (अव+आप्+तुमुन्) | प्राप्त करने के लिए | To get / obtain |
शुचिः | पवित्र | Pure / Clean |
आडम्बरपूर्णः | दिखावे से भरा | Ostentatious |
SECTION 6 — हिंदी अनुवाद
१. भारतीय धर्मशास्त्रों में अनेक सूक्तियां (कथन) हैं, जो मानव जीवन के वास्तविक तत्वों को सिद्ध करती हैं।
२. उनमें से एक प्रसिद्ध सूत्र रूपी वाक्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र में है - "सुख का मूल धर्म है, और धर्म का मूल धन (अर्थ) है।"
३. इसका आशय यह है कि वास्तविक सुख का आधार धर्म है, और धर्म का पालन करने का आधार धन है।
४. जीवन में धर्म, धन और सुख—इन तीनों का आपसी संबंध अटूट है।
५. जो व्यक्ति न्यायपूर्वक धन कमाता है, वह धर्म का पालन करने में समर्थ होता है, और धर्म के पालन से लंबे समय तक टिकने वाला सुख प्राप्त करता है।
६. सामान्य जीवन में भोजन, कपड़ा, मकान, शिक्षा, और स्वास्थ्य सेवा जैसी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए धन आवश्यक है।
७. पर्याप्त धन के अभाव में अपने कर्तव्यों का पालन करना कठिन हो जाता है।
८. इसलिए धर्मशास्त्रों में चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में 'अर्थ' (धन) को एक मुख्य स्तंभ माना गया है।
९. गरुडपुराण में कहा गया है - "ब्रह्म मुहूर्त में उठकर धर्म और धन पर विचार करना चाहिए।" अर्थात् दिन की शुरुआत में धर्म और धन के विषय में सोचना आवश्यक है।
१०. स्वस्थ आर्थिक व्यवहार तीन प्रकार का होता है – न्यायपूर्वक धन कमाना, उचित खर्च करना, और भविष्य की दृष्टि से बचत करना।
११. न्यायपूर्ण अर्थोपार्जन - अच्छे और सत्य के मार्ग से ही धन कमाना चाहिए।
१२. भगवान मनु ने कहा है - "सभी प्रकार की पवित्रताओं में धन की पवित्रता (ईमानदारी की कमाई) सबसे श्रेष्ठ है। जो धन के मामले में पवित्र है, वही असल में पवित्र है; केवल मिट्टी और जल से स्नान करने वाला पवित्र नहीं होता।" इसका आशय है कि अनैतिक आर्थिक व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए।
१३. औचित्यपूर्ण व्यय - आवश्यकता के अनुसार ही खर्च करना चाहिए। दिखावे से भरा खर्च या विलासिता और बुरी आदतों पर किया गया खर्च 'अपव्यय' (बर्बादी) होता है।
१४. भविष्य की दृष्टि से संचय - कमाए गए धन का कुछ हिस्सा भविष्य की सुरक्षा के लिए बचाना चाहिए। बचत की आदत से मनुष्य आत्मनिर्भर बनता है।
१५. छात्र जीवन में आर्थिक साक्षरता - कई बार छात्र अपने माता-पिता द्वारा कष्ट से कमाए गए धन को छोटे-छोटे बेकार कारणों से बर्बाद कर देते हैं।
१६. जीभ के स्वाद को पूरा करने के लिए फास्ट फूड, कोल्ड ड्रिंक, पैकेट बंद खाना और नशे की चीजों का सेवन—इनमें अत्यधिक पैसा बर्बाद होता है।
१७. कमाए हुए का संचय और संचित का निवेश - चाणक्य नीति में कहा गया है - "जैसे पानी की एक-एक बूंद गिरने से घड़ा भर जाता है, वही क्रम सभी विद्याओं, धर्म और धन के संचय का भी है।"
१८. भारत देश में धन की बचत और सुरक्षित निवेश के लिए बहुत से मार्ग हैं। (जैसे- प्रधानमंत्री जन-धन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, फिक्स्ड डिपॉजिट आदि)।
१९. आर्थिक जागरूकता हमें गरीबी (अभाव) से उबारकर आर्थिक संपन्नता की ओर ले जाती है।
२०. "एक-एक क्षण बचाकर विद्या प्राप्त करनी चाहिए, और एक-एक कण बचाकर धन। यदि क्षण नष्ट हो गया तो विद्या कहाँ से आएगी? और यदि कण नष्ट हो गया तो धन कहाँ से मिलेगा?"
SECTION 7 — English Translation
There are many aphorisms in Indian scriptures that establish the true essence of human life.
One famous aphoristic sentence among them is found in Kautilya's Arthashastra: "The root of happiness is Dharma, and the root of Dharma is wealth (Artha)."
The meaning of this is that the foundation of true happiness is righteous conduct (Dharma), and the foundation for practicing Dharma is wealth.
In life, the mutual relationship between Dharma, wealth, and happiness is inseparable.
A person who earns wealth justly is capable of following Dharma, and through the practice of Dharma, attains long-lasting happiness.
In normal life, money is required to fulfill basic needs like food, clothing, shelter, education, and healthcare.
Without sufficient funds, it becomes difficult to fulfill one's duties.
Therefore, among the four goals of life (Dharma, Artha, Kama, Moksha) mentioned in scriptures, 'Artha' is considered a fundamental pillar.
It is said in the Garuda Purana: "One should wake up in the Brahma Muhurta and contemplate Dharma and wealth." Meaning, thinking about duties and finances at the start of the day is essential.
A healthy economic lifestyle has three aspects: earning justly, spending appropriately, and saving for the future.
Just Earning - Wealth must be earned only through the right path.
Lord Manu has stated: "Among all purities, financial purity is considered supreme. He who is pure in financial matters is truly pure, not merely the one who washes with soil and water." This implies that unethical financial behavior should never be engaged in.
Appropriate Spending - One should spend according to necessity. Showy, ostentatious spending, or spending on luxuries and vices, is a waste of money (Apavyaya).
Saving for the Future - A portion of earned wealth must be saved for future security. The habit of saving makes a person self-reliant.
Financial Literacy in Student Life - Students often waste the hard-earned money of their parents on trivial things.
To satisfy the craving of the tongue, consuming fast food, cold drinks, packaged food, as well as addictive substances, leads to an immense waste of money.
Accumulation of Earnings and Investing the Savings - Chanakya Niti states: "A pitcher is filled gradually by falling drops of water. This exact sequence applies to acquiring all knowledge, Dharma, and wealth."
In India, there are various avenues for saving wealth and making safe investments (such as Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana, Sukanya Samriddhi Yojana, Fixed Deposits, etc.).
Financial awareness lifts us out of scarcity and leads us towards economic prosperity.
"One should acquire knowledge moment by moment, and wealth particle by particle. If a moment is lost, whence comes knowledge? If a particle is lost, whence comes wealth?"
SECTION 8 — सारांश
HINDI:
प्रस्तुत निबंध "सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः" मानव जीवन में धन (अर्थ) और धर्म के संतुलन पर बल देता है। निबंध का आरंभ कौटिल्य के अर्थशास्त्र से होता है, जो स्पष्ट करता है कि सच्चे सुख का आधार धर्म है और धर्म के निर्वहन के लिए धन आवश्यक है। एक स्वस्थ आर्थिक जीवन के तीन मुख्य स्तंभ बताए गए हैं: न्यायपूर्वक धन कमाना, उचित व्यय करना, और भविष्य के लिए बचत करना। लेखक छात्रों के बीच वित्तीय साक्षरता की आवश्यकता पर जोर देता है। छात्रों को फास्ट-फूड और दिखावे में माता-पिता की गाढ़ी कमाई बर्बाद नहीं करनी चाहिए। अंततः चाणक्य नीति का प्रमाण देते हुए निष्कर्ष निकाला गया है कि जैसे बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, वैसे ही निरंतर छोटी-छोटी बचत और उचित निवेश से व्यक्ति अभाव से मुक्त होकर आत्मनिर्भर और संपन्न बनता है।
ENGLISH:
The essay "Sukhasya Mulam Dharmah" emphasizes the crucial balance between wealth (Artha) and righteousness (Dharma) in human life. Drawing from Kautilya’s Arthashastra, it argues that true happiness stems from Dharma, which in turn requires financial stability. A healthy financial lifestyle rests on three pillars: ethical earning, mindful spending, and diligent saving. The essay strongly advocates for financial literacy among students, advising them against squandering their parents' hard-earned money on fast food and ostentatious displays. Citing Chanakya Niti, it concludes that just as drops of water fill a pitcher, consistent small savings and wise investments lead to self-reliance and lifelong prosperity.
SECTION 9 — केंद्रीय भाव एवं मूल्य
9A. विषय-वस्तु सारणी
विषय | पाठ में स्पष्टीकरण |
मुख्य विषय | छात्र जीवन में आर्थिक साक्षरता, धन का महत्त्व और उचित निवेश। (Importance of financial literacy, wealth, and proper investment in student life.) |
त्रिविध आर्थिक व्यवहार | न्यायपूर्ण कमाई, औचित्यपूर्ण व्यय, भविष्य के लिए संचय। (Ethical earning, appropriate spending, saving for the future.) |
धन और धर्म का संबंध | धन के बिना धर्म का पालन और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति संभव नहीं है। (Without wealth, following Dharma and fulfilling basic needs is impossible.) |
9B. मानवीय एवं सांस्कृतिक मूल्य
मितव्ययिता (सोच-समझकर खर्च करना / Frugality)
औचित्यपूर्णः व्ययः - आवश्यकतानुसारं व्ययः करणीयः ।
यह पाठ सिखाता है कि हमें अनावश्यक दिखावे और व्यसनों पर धन बर्बाद करने के बजाय आवश्यकता के अनुसार ही खर्च करना चाहिए।
(Teaches mindful spending over ostentatious waste.)
स्वावलम्बनम् (आत्मनिर्भरता / Self-reliance)
सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भवति ।
भविष्य के लिए धन बचाने की आदत व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाती है और संकट में दूसरों पर निर्भर नहीं रहने देती।
(Encourages independence through the habit of saving.)
सत्यनिष्ठा / अर्थशौचम् (आर्थिक पवित्रता / Financial Integrity)
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
यह मूल्य हमें प्रेरित करता है कि हमारी कमाई हमेशा ईमानदारी और न्यायपूर्ण मार्ग से होनी चाहिए, अनैतिक साधनों से नहीं।
(Promotes earning wealth only through ethical and righteous means.)
EXAM TIP:मूल्यपरक प्रश्न 2-4 अंकों के लिए नियमित आते हैं।Always name the value in Sanskrit first.
SECTION 10 — मुख्य विचार-बिंदु (Key Arguments)
१. अर्थोपार्जनस्य महत्त्वम् (Importance of Earning)
Sanskrit: यः जनः न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः धर्मपालनं कर्तुं समर्थः भवति।
Hindi: जो व्यक्ति ईमानदारी से धन कमाता है, केवल वही व्यक्ति सही ढंग से अपने धर्म (कर्तव्यों) का पालन कर सकता है। धन मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करता है।
English: Ethical earning is the foundation for fulfilling one's life duties.
२. व्ययस्य सन्तुलनम् (Balance in Spending)
Sanskrit: येन व्ययेन स्वास्थ्यलाभः विद्यार्जनम् आत्मसुरक्षा वा भवेत्, सः व्ययः अवश्यं करणीयः ।
Hindi: धन वहीं खर्च करना चाहिए जहाँ स्वास्थ्य, शिक्षा या सुरक्षा का लाभ हो। दिखावे या बुरी आदतों (फास्ट फूड आदि) पर खर्च करना बर्बादी है।
English: Expenditure should be strictly prioritized for health, education, and security over luxury.
३. सञ्चयः निवेशश्च (Savings and Investment)
Sanskrit: जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः... लघु-लघुः सञ्चयोपि कालान्तरे महत्सम्पत्तिरूपेण वर्धते ।
Hindi: जिस तरह एक-एक बूँद से घड़ा भरता है, उसी तरह छोटी-छोटी बचत भविष्य में बहुत बड़ी संपत्ति बन जाती है। उचित निवेश भविष्य सुरक्षित करता है।
English: Consistent small savings, much like drops filling a pot, accumulate into significant wealth over time.
SECTION 11 — गद्यांश आधारित प्रश्न
गद्यांशः १
जीवने धर्मः, अर्थः, सुखम् इत्येतेषां त्रयाणां परस्परसम्बन्धः अविच्छिन्नः अस्ति। यः जनः न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः धर्मपालनं कर्तुं समर्थः भवति, धर्मपालनेन च दीर्घकालिकं सुखं लभते । सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा चेत्यादीनां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूर्तये धनम् आवश्यकम्। पर्याप्तधनस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति। स्वास्थ्यं, शिक्षा, सेवा, दानम् चेत्यादीनि कार्याणि बाधितानि भवन्ति ।
प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark):
पर्याप्तधनस्य अभावात् किम् कठिनं भवति?
(क) निद्रा (ख) स्वकर्तव्यपालनम्
(ग) क्रीडा (घ) भ्रमणम्
उत्तरम्: (ख)
हिंदी: गद्यांश के अनुसार पर्याप्त धन के अभाव में अपने कर्तव्यों का पालन करना कठिन हो जाता है।
English: Lack of sufficient funds makes it difficult to fulfill one's personal duties.
प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark):
मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत —
[ अर्थोपार्जनं / अविच्छिन्नः / बाधितानि ]
यः जनः न्यायपूर्वकम् _______ करोति, सः धर्मपालनं कर्तुं समर्थः भवति।
उत्तरम्: अर्थोपार्जनं
हिंदी: जो व्यक्ति न्यायपूर्वक 'धन कमाता है' (अर्थोपार्जन करता है)।
English: The person who justly engages in 'earning wealth'.
प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark):
'अविच्छिन्नः' इति पदस्य अर्थः अस्ति —
(क) निरन्तरः (अटूट) (ख) छिन्नः (टूटा हुआ)
(ग) अल्पः (घ) विशालः
उत्तरम्: (क)
हिंदी: अविच्छिन्न का अर्थ है जो कभी न टूटे या अलग न हो (निरंतर)।
English: Avicchinna means continuous or inseparable.
प्र.(iv) — प्रश्ननिर्माणम् (1 mark):
अधोलिखितवाक्ये रेखाङ्कितपदम् आश्रित्य प्रश्नं रचयत —
न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति।
उत्तरम्: कथम् अर्थोपार्जनं करोति?
हिंदी: 'न्यायपूर्वक' एक क्रिया-विशेषण (तरीका) है, इसलिए 'कथम्' (कैसे) का प्रयोग होगा।
English: 'Nyayapurvakam' indicates manner, so 'Katham' (how) is used.
गद्यांशः २
छात्रजीवने आर्थिकसाक्षरता - अनेकदा छात्राः मातापितृभ्यां कष्टार्जितधनस्य तुच्छकारणैः अपव्ययं कुर्वन्ति । जिह्वालालसापूर्त्यर्थं त्वरिताहारः, शीतपेयं, पुटीकृतभोजनं, तथैव व्यसनपदार्थानां सेवनं, प्रदर्शनकारिपरिधानं विलासितापूर्णम् आचरणं चेत्यादि यत्र प्रभूतः अपव्ययः भवति। एतैः न केवलं धनहानिः, स्वास्थ्यहानिरपि जायते। स्वास्थ्यहानिकारणात् पुनः धनव्ययो वर्धते।
प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark):
छात्राः कस्य धनस्य अपव्ययं कुर्वन्ति?
(क) मित्रस्य (ख) विद्यालयस्य
(ग) मातापितृभ्यां कष्टार्जितधनस्य (घ) स्वस्य
उत्तरम्: (ग)
हिंदी: छात्र प्रायः माता-पिता द्वारा कष्ट से कमाए गए धन की बर्बादी करते हैं।
English: Students often waste the hard-earned money of their parents.
प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark):
मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत —
[ वर्धते / त्वरिताहारः / जिह्वालालसापूर्त्यर्थं ]
_______ , शीतपेयं, पुटीकृतभोजनं... यत्र प्रभूतः अपव्ययः भवति।
उत्तरम्: त्वरिताहारः
हिंदी: गद्यांश के क्रम में 'शीतपेय' से पहले 'त्वरिताहारः' (फास्ट फ़ूड) आया है।
English: 'Tvaritaharah' fits the sequence of junk food items listed.
प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark):
'त्वरिताहारः' इति पदस्य अर्थः अस्ति —
(क) सुस्वादु भोजनम् (ख) शीघ्रं निर्मितं भोजनम् (Fast Food)
(ग) फलाहारः (घ) शाकाहारः
उत्तरम्: (ख)
हिंदी: त्वरित मतलब 'जल्दी' और आहार मतलब 'भोजन', अर्थात् फास्ट फ़ूड।
English: Tvarita means quick and Aahara means food (Fast Food).
प्र.(iv) — प्रश्ननिर्माणम् (1 mark):
अधोलिखितवाक्ये रेखाङ्कितपदम् आश्रित्य प्रश्नं रचयत —
स्वास्थ्यहानिकारणात् पुनः धनव्ययः वर्धते।
उत्तरम्: स्वास्थ्यहानिकारणात् पुनः कः वर्धते?
हिंदी: 'धनव्ययः' पुल्लिंग प्रथमा विभक्ति एकवचन है, इसलिए 'कः' का प्रयोग होगा।
English: 'Dhanavyayah' is a masculine subject, replaced by the interrogative 'Kah'.
SECTION 12 — लघु उत्तरीय प्रश्न (3 Marks)
प्र१. गरुडपुराणे किम् उपदिष्टम् अस्ति?
मूल बिंदु 1 (VP1): ब्राह्मे मुहूर्ते जागरणम् (Waking up in Brahma Muhurta)
मूल बिंदु 2 (VP2): धर्मार्थयोः चिन्तनम् (Thinking about Dharma and Wealth)
उत्तरम् (Sanskrit):
गरुडपुराणे उपदिष्टम् अस्ति यत् मानवेन ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थाय धर्मस्य अर्थस्य च चिन्तनं कर्तव्यम्। अर्थात् दिनस्य आरम्भे जनैः धनस्य कर्तव्यस्य च विषये विचारः करणीयः।
हिंदी अनुवाद:
गरुडपुराण में यह उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को ब्रह्म मुहूर्त (सुबह-सुबह) उठकर धर्म और धन के बारे में सोचना चाहिए। अर्थात् दिन की शुरुआत में व्यक्ति को अपने कर्तव्यों और वित्त पर विचार करना चाहिए।
English:
It is instructed in the Garuda Purana that one should wake up during the Brahma Muhurta and contemplate Dharma (duty) and Artha (wealth). Meaning, the day should begin with thoughts on duties and finances.
प्र२. छात्रैः क्रियमाणः अपव्ययः कः अस्ति?
मूल बिंदु 1 (VP1): त्वरिताहारः शीतपेयं च (Fast food and cold drinks)
मूल बिंदु 2 (VP2): विलासितापूर्णम् आचरणम् (Luxurious behavior and show-off)
उत्तरम् (Sanskrit):
छात्राः जिह्वालालसापूर्त्यर्थं त्वरिताहारस्य (fast food), शीतपेयस्य, पुटीकृतभोजनस्य च सेवने अपव्ययं कुर्वन्ति। एतदतिरिक्तं प्रदर्शनकारिपरिधानं विलासितापूर्णम् आचरणं च छात्राणां धनस्य अपव्ययः अस्ति।
हिंदी अनुवाद:
छात्र अपनी जीभ की लालसा पूरी करने के लिए फास्ट फूड, कोल्ड ड्रिंक और पैकेटबंद खाने में पैसों की बर्बादी करते हैं। इसके अतिरिक्त दिखावटी कपड़े पहनना और विलासितापूर्ण (लग्जरी) जीवनशैली जीना भी छात्रों द्वारा किया जाने वाला अपव्यय है।
English:
Students waste money to satisfy their taste buds by consuming fast food, cold drinks, and packaged food. Additionally, spending on showy clothing and maintaining a luxurious lifestyle constitute the unnecessary expenses of students.
प्र३. "सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्" इत्यस्य तात्पर्यं किम्?
मूल बिंदु 1 (VP1): अर्थशौचस्य सर्वोपरिता (Supremacy of financial purity)
मूल बिंदु 2 (VP2): न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम् (Ethical earning)
उत्तरम् (Sanskrit):
अस्य तात्पर्यम् अस्ति यत् मनुष्यस्य सर्वेषु पवित्रतासु 'अर्थशौचम्' अर्थात् आर्थिकपवित्रता सर्वोपरि अस्ति। यः जनः न्यायपूर्णमार्गेण धनार्जनं करोति, अनैतिकं व्यवहारं न करोति, स एव यथार्थरूपेण पवित्रः भवति।
हिंदी अनुवाद:
इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य की सभी प्रकार की पवित्रताओं में 'आर्थिक पवित्रता' (ईमानदारी की कमाई) सबसे श्रेष्ठ है। जो व्यक्ति न्याय के रास्ते से धन कमाता है और अनैतिक काम नहीं करता, वही वास्तव में पवित्र है।
English:
This implies that among all forms of purity, 'financial purity' (ethical earning) is paramount. A person who earns wealth through righteous paths and avoids unethical practices is the one who is truly pure.
प्र४. जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः किं भवति, अस्य कः सन्देशः?
मूल बिंदु 1 (VP1): क्रमशः घटस्य पूर्णता (Gradual filling of the pot)
मूल बिंदु 2 (VP2): सञ्चयस्य महत्त्वम् (Importance of consistent saving)
उत्तरम् (Sanskrit):
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः घटः पूर्यते। अस्य सन्देशः अस्ति यत् यथा जलबिन्दुभिः घटः पूर्यते, तथैव प्रतिदिनम् अल्पधनस्य सञ्चयेन कालान्तरे सा लघ्वी राशिः अपि महत्सम्पत्तिरूपेण वर्धते।
हिंदी अनुवाद:
पानी की एक-एक बूँद गिरने से धीरे-धीरे घड़ा भर जाता है। इसका संदेश यह है कि जैसे बूँदों से घड़ा भरता है, वैसे ही रोज थोड़ा-थोड़ा धन बचाने से समय बीतने पर वह छोटी सी रकम भी बहुत बड़ी संपत्ति बन जाती है।
English:
A pot gets filled gradually by the falling of water drops. The message is that just as drops fill a pot, small daily savings accumulate over time to become a vast amount of wealth.
SECTION 13 — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 Marks)
प्र१. "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः" इति सूक्तेः आशयं पाठस्य आधारेण सविस्तरं स्पष्टीकुरुत।
मूल बिंदु 1 (VP1): धर्मार्थसुखानाम् अविच्छिन्नसम्बन्धः (Inseparable link between duty, wealth, and joy)
मूल बिंदु 2 (VP2): मूलभूत-आवश्यकतानां पूर्तिः (Fulfillment of basic needs)
मूल बिंदु 3 (VP3): न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम् (Ethical earning)
मूल बिंदु 4 (VP4): कर्तव्यपालने धनस्य भूमिका (Role of wealth in duty)
उत्तरम् (Sanskrit):
कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे वर्णितं यत् "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः।" अस्य आशयः अस्ति यत् अस्माकं जीवने वास्तविकसुखस्य आधारः धर्मः अस्ति, परन्तु धर्मपालनार्थं धनम् अतीव आवश्यकम् अस्ति। जीवने धर्म-अर्थ-सुखानां परस्परसम्बन्धः अविच्छिन्नः भवति। सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, स्वास्थ्यसेवा च इत्यादीनां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूर्तये धनं विना न किमपि सम्भवम्। पर्याप्तधनस्य अभावात् मनुष्यः स्वकर्तव्यपालनं कर्तुं न शक्नोति। यः जनः न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः एव यथार्थरूपेण धर्मपालनं करोति दीर्घकालिकं सुखं च लभते।
हिंदी अनुवाद:
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में बताया गया है कि "सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल धन है।" इसका आशय यह है कि हमारे जीवन में सच्चे सुख का आधार धर्म (सही आचरण) है, लेकिन धर्म का पालन करने के लिए धन बहुत आवश्यक है। जीवन में धर्म, धन और सुख का आपस में गहरा (अटूट) संबंध है। सामान्य जीवन में भोजन, कपड़े, घर और स्वास्थ्य सेवा जैसी बुनियादी जरूरतों को धन के बिना पूरा नहीं किया जा सकता। पर्याप्त धन के अभाव में व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर सकता। जो व्यक्ति ईमानदारी से पैसा कमाता है, वही वास्तव में धर्म का पालन कर सकता है और स्थायी सुख प्राप्त करता है।
English:
It is stated in Kautilya's Arthashastra that "The root of happiness is Dharma, and the root of Dharma is Artha (wealth)." This means that while true happiness is based on righteous conduct, wealth is essential to practice that righteousness. The relationship between Dharma, wealth, and happiness is inseparable. In daily life, basic necessities like food, clothing, shelter, and healthcare cannot be met without money. Without sufficient wealth, a person cannot fulfill their duties. Only someone who earns wealth ethically can truly practice Dharma and achieve long-lasting happiness.
प्र२. स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः कतिविधः भवति? छात्रजीवने आर्थिकसाक्षरतायाः सञ्चयस्य च किं महत्त्वम् अस्ति?
मूल बिंदु 1 (VP1): त्रिविधः आर्थिकव्यवहारः (Three types of financial behavior)
मूल बिंदु 2 (VP2): अपव्ययात् रक्षणम् (Protection from unnecessary waste)
मूल बिंदु 3 (VP3): उचितनिवेशस्य लाभः (Benefits of proper investment)
मूल बिंदु 4 (VP4): स्वावलम्बनस्य प्राप्तिः (Attainment of self-reliance)
उत्तरम् (Sanskrit):
स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः त्रिविधः भवति — न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम्, औचित्यपूर्णः व्ययः, भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः च। छात्रजीवने अस्य महती आवश्यकता अस्ति। प्रायः छात्राः मातापितृभ्यां कष्टेन अर्जितस्य धनस्य त्वरिताहार-शीतपेय-विलासितादिषु अपव्ययं कुर्वन्ति। एतेन धनहानिः स्वास्थ्यहानिः च भवति। अतः छात्रैः आर्थिकसाक्षरता ज्ञातव्या। 'जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः' इति नीत्यनुसारं छात्रैः प्रतिदिनम् अल्पधनस्य सञ्चयः करणीयः। सञ्चितधनस्य उचितस्थाने (यथा- नियतनिक्षेपे) निवेशः करणीयः। सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भवति भविष्ये च संकटकाले कस्यापि आर्थिकसहायतां न अपेक्षते।
हिंदी अनुवाद:
स्वस्थ आर्थिक व्यवहार तीन प्रकार का होता है — न्यायपूर्ण कमाई, सही खर्च, और भविष्य के लिए बचत। छात्र जीवन में इसकी बहुत आवश्यकता है। अक्सर छात्र माता-पिता द्वारा कष्ट से कमाए गए धन को फास्ट-फूड, कोल्ड-ड्रिंक और दिखावे में बर्बाद कर देते हैं। इससे धन और स्वास्थ्य दोनों की हानि होती है। इसलिए छात्रों को आर्थिक रूप से साक्षर होना चाहिए। 'बूँद-बूँद से घड़ा भरता है' इस नीति के अनुसार छात्रों को हर दिन थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाना चाहिए। बचाए गए धन का उचित स्थान (जैसे- फिक्स्ड डिपॉजिट आदि) पर निवेश करना चाहिए। बचत की आदत से व्यक्ति आत्मनिर्भर बनता है और भविष्य में संकट के समय किसी से आर्थिक मदद नहीं माँगनी पड़ती।
English:
A healthy financial lifestyle is of three types: ethical earning, appropriate spending, and saving for the future. This is highly necessary in student life. Students often waste their parents' hard-earned money on fast food, cold drinks, and luxury. This causes both financial and health losses. Therefore, students must be financially literate. Following the principle that "drops of water fill a pot," students should save small amounts of money daily. The saved money should be invested in proper schemes (like fixed deposits). The habit of saving makes a person self-reliant, ensuring they do not have to seek financial help from anyone during future crises.
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