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    6 - भरत-राम का प्रेम / पद (Bharat-Ram Ka Prem / Pad) - Class 12 - Antara 2

    • 1 day ago
    • 13 min read

    भरत-राम का प्रेम / पद (Bharat-Ram Ka Prem / Pad)

    Class 12 - Hindi Elective (Antara Bhag 2) |

    Poet: गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas)



    1. कवि परिचय (Literary Profile)

    • साहित्यिक विशेषताएँ (Literary Traits): तुलसीदास 'भक्तिकाल' की सगुण धारा (रामभक्ति शाखा) के प्रतिनिधि कवि हैं। वे 'समन्वय के कवि' (Poet of Coordination) माने जाते हैं। उनका साहित्य लोक-मंगल (Public Welfare) की कामना से ओत-प्रोत है। उन्होंने अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार के साथ रचनाएँ की हैं।

    • प्रमुख रचनाएँ (Key Works):

      • महाकाव्य: रामचरितमानस (अवधी भाषा)।

      • मुक्तक काव्य: कवितावली, गीतावली (ब्रज भाषा), विनयपत्रिका, दोहावली।


    2. पाठ/कविता का सार (Executive Summary)

    (क) भरत-राम का प्रेम (रामचरितमानस से)

    • प्रतिपाद्य (Central Theme): यह अंश 'अयोध्याकांड' से लिया गया है। वनगमन के बाद जब भरत चित्रकूट में राम को मनाने जाते हैं, तब राजसभा में वे अपने मनोभाव व्यक्त करते हैं। भरत अपने बड़े भाई राम के प्रति अगाध प्रेम, श्रद्धा और अपनी आत्म-ग्लानि (Guilt) प्रकट करते हैं। वे राम के वनवास के लिए स्वयं को और अपनी माता कैकेयी को दोषी मानते हैं, लेकिन राम की उदारता का गुणगान करते हैं।

    • English Explanation: This excerpt highlights Bharat's immense love and reverence for his elder brother Ram. Speaking in the assembly at Chitrakoot, Bharat expresses deep guilt over Ram's exile, blaming his own fate and his mother, while praising Ram's forgiving and kind nature, recalling how Ram never let him lose even in childhood games.

    • Key Points:

      • राम का स्वभाव: वे अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते और खेल में हारकर भी भरत को जिता देते थे।

      • भरत की ग्लानि: वे राम के वनवास का कारण अपने दुर्भाग्य और माता की कुबुद्धि को मानते हैं।

      • भ्रातृ-प्रेम: भरत का प्रेम निस्वार्थ और त्याग से भरा है।

    (ख) पद (गीतावली से)

    • प्रतिपाद्य (Central Theme): इन पदों में माता कौशल्या की 'विरह-वेदना' (Pain of Separation) और 'वात्सल्य' (Motherly Love) का मार्मिक चित्रण है। राम के वन चले जाने के बाद, कौशल्या उनकी वस्तुओं को देखकर भावुक हो जाती हैं और घोड़ों से बात करती हैं।

    • English Explanation: These verses depict Mother Kausalya's heartbreaking sorrow after Ram's departure to the forest. She hallucinates his presence, looking at his childhood toys and shoes. In the second verse, she pleads with Ram to return once, not for her sake, but for his beloved horses that are withering away in grief.

    • Key Points:

      • पद 1: कौशल्या राम के बचपन के धनुष-बाण और जूतियों को देखकर उन्हें याद करती हैं और 'चित्रलिखित-सी' (Like a picture) स्तब्ध रह जाती हैं।

      • पद 2: कौशल्या घोड़ों की दयनीय दशा का वर्णन कर राम से एक बार वापस आने की गुहार लगाती हैं।


    2.1 पद्यांश अनुवाद (Line-by-Line Translation)

    (क) भरत-राम का प्रेम (रामचरितमानस - अवधी)

    पंक्ति (Original Line)

    हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

    English Translation

    पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े।।

    भरत जी सभा में रोमांचित शरीर (पुलकित) होकर खड़े हुए। उनके कमल जैसे नेत्रों (नीरज नयन) में प्रेम के आँसू उमड़ आए।

    Thrilled (shivering with emotion), Bharat stood up in the assembly; his lotus-eyes filled with tears of love.

    कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।।

    (भरत कहते हैं) मेरा कहना तो मुनिनाथ (वशिष्ठ जी) ने ही कह दिया/निभा दिया। इससे अधिक मैं अब क्या कहूँ?

    What I had to say has already been conveyed by the Sage (Vashishtha); what more can I say?

    मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।

    मैं अपने स्वामी (राम) का स्वभाव जानता हूँ। वे अपराधी पर भी कभी क्रोध (कोह) नहीं करते।

    I know the nature of my Lord; he never shows anger even towards an offender.

    मो पर कृपा सनेहु बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।

    मुझ पर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेल में भी कभी उनकी अप्रसन्नता/खीज (खुनिस) नहीं देखी।

    He has special affection for me; I have never seen him annoyed even in games.

    सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।

    बचपन से मैंने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी कभी मेरा मन नहीं तोड़ा (मेरी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं किया)।

    I never left his side since childhood, and he never broke my heart (never disappointed me).

    मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेंहूँ खेल जितावहिं मोही।।

    मैंने प्रभु की कृपा की रीति को अपने हृदय में अनुभव किया है। वे खेल में मेरे हारने पर भी मुझे जिता देते थे (जानबूझकर हार जाते थे)।

    I have realized the Lord's way of grace; he would let me win even when I lost the game.

    महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।

    मैंने भी प्रेम और संकोच के कारण उनके सामने कभी मुँह नहीं खोला (जुबान नहीं लड़ाई)।

    Out of love and hesitation, I too never spoke back (or raised my voice) in front of him.

    दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।

    मेरे ये प्रेम के प्यासे नेत्र आज तक उनके दर्शन से तृप्त नहीं हुए हैं।

    My eyes, thirsty for love, have not yet been satisfied with his sight (darshan).

    बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।।

    विधाता (भाग्य) मेरे इस दुलार को सहन नहीं कर सका। उसने मेरी नीच माता (कैकेयी) के बहाने (मिस) हमारे बीच अंतर डाल दिया।

    Fate could not tolerate my being loved so much; it created a rift between us using my mother as an excuse.

    यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा।।

    आज यह कहना भी मुझे शोभा नहीं देता (कि माँ बुरी है और मैं अच्छा हूँ)। अपनी समझ से कौन साधु और पवित्र हुआ है? (स्वयं को निर्दोष कहना ठीक नहीं)।

    Even saying this (blaming mother) does not suit me today. Who becomes saintly just by considering himself pure?

    मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।

    माता नीच/बुरी हैं और मैं साधु और सदाचारी हूँ—हृदय में ऐसा विचार लाना ही करोड़ों दुराचारों (कुचाली) के समान है।

    "Mother is bad and I am virtuous"—bringing such a thought to mind is equal to millions of sins.

    फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।।

    क्या कोदों (मोटा अनाज) की बाली में उत्तम धान (सुसाली) लग सकता है? क्या काली घोंघा (संबुक) मोती उत्पन्न कर सकती है? (अर्थात जैसी माँ, वैसा पुत्र)।

    Can coarse grain produce fine rice? Can a black snail produce a pearl? (Implying: I must be flawed if my mother is).

    सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।

    सपने में भी किसी को दोष का लेश (थोड़ा सा भी) नहीं है। यह तो मेरा दुर्भाग्य (अभाग) ही अथाह सागर जैसा गहरा है।

    Even in dreams, no one is to be blamed; it is my own misfortune that is deep as the ocean.

    बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।

    मैंने अपने पापों का परिणाम समझे बिना ही माता को कटु वचन (काकू) कहकर जलाया/दुखी किया।

    Without understanding the fruit of my own sins, I burnt (hurt) my mother by speaking harsh words.

    हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेंहि भल मोरा।।

    मैं अपने हृदय में सब ओर देख कर हार गया हूँ। अब एक ही प्रकार से मेरा भला हो सकता है।

    I have searched my heart and looked everywhere (in despair). My welfare is possible only in one way.

    गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।

    गुरु (वशिष्ठ) सर्वसमर्थ हैं और स्वामी सीता-राम हैं। इसलिए मुझे परिणाम अच्छा ही लग रहा है (राम जी सब सँभाल लेंगे)।

    The Guru is almighty and Sita-Ram are my masters; hence, I feel the outcome will be good.

    साधु साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।

    सभा ने 'साधु-साधु' (धन्य हो) कहकर प्रशंसा की। भरत कहते हैं—मैं गुरु और प्रभु के निकट इस पवित्र स्थल पर सत्य भाव से कहता हूँ...

    The assembly exclaimed "Noble! Noble!". (Bharat says) I speak the truth in this holy place, near my Guru and Lord...

    प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।

    ...कि यह मेरा प्रेम है या प्रपंच (छल), झूठ है या सच, यह मुनि वशिष्ठ और रघुकुल के राजा (राम) जानते हैं।

    ...Whether this is love or deception, false or true, Sage Vashishtha and Lord Ram know best.

    [(Extract 2 Summary for brevity: Bharat describes the sorrow of Ayodhya, blames himself as the root of all trouble, and mentions his journey barefoot to Chitrakoot)]

    (ख) पद (गीतावली - ब्रज)

    पद 1

    | पंक्ति (Original Line) | हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning) | English Translation |

    | :--- | :--- | :--- |

    | जननी निरखति बान धनुहियाँ। | माता कौशल्या राम के बचपन के बाण और छोटी धनुष (धनुहियाँ) को निहार रही हैं। | Mother Kausalya gazes at (Ram's) arrows and small bow. |

    | बार बार उर नैननि लावति प्रभुजू की ललित पनहियाँ।। | वे बार-बार प्रभु (राम) की सुंदर छोटी जूतियों (पनहियाँ) को अपने हृदय और आँखों से लगाती हैं। | Again and again, she presses the Lord's beautiful little shoes to her heart and eyes. |

    | कबहुँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सवारे। | कभी वह पहले की तरह (भ्रमवश) सुबह जाकर उन्हें प्रिय वचन कहकर जगाने लगती हैं। | Sometimes, like before, she goes to wake him up in the morning, speaking sweet words. |

    | "उठहु तात! बलि मातु बदन पर, अनुज सखा सब द्वारे"।। | "हे पुत्र (तात) उठो! माँ तुम्हारे मुख पर न्योछावर (बलि) जाती है। तुम्हारे छोटे भाई और मित्र सब द्वार पर खड़े हैं"। | "Wake up, son! Mother sacrifices herself for your face; your brothers and friends are at the door." |

    | कबहुँ कहति यों "बड़ी बार भइ जाहु भूप पहँ, भैया। | कभी कहती हैं, "भैया, बहुत देर हो गई है, अब राजा (दशरथ) के पास जाओ। | Sometimes she says, "It's very late, go to the King (Dashrath) now, dear brother. |

    | बंधु बोलि जेंइय जो भावै गई निछावरि मैया" | अपने भाइयों को बुलाकर जो मन भाए वह भोजन करो (जेंइय), माँ तुम पर वारी जाती है"। | Call your brothers and eat whatever you like; Mother adores you." |

    | कबहुँ समुझि वनगमन राम को रहि चकि चित्रलिखी सी। | कभी अचानक राम के वनगमन की बात याद करके वह चित्र (तस्वीर) की तरह हैरान/जड़ होकर रह जाती हैं। | Sometimes, remembering Ram's exile, she becomes stunned/motionless like a painted picture. |

    | तुलसीदास वह समय कहे तें लागति प्रीति सिखी सी।। | तुलसीदास कहते हैं कि उस समय उनकी दशा देखकर ऐसा लगता है जैसे मोरनी (सिखी) का प्रेम (वर्षा के प्रति) हो। | Tulsidas says, describing that moment, her love seems like that of a peahen (intense and painful). |

    पद 2

    | पंक्ति (Original Line) | हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning) | English Translation |

    | :--- | :--- | :--- |

    | राघौ! एक बार फिरि आवौ। | (कौशल्या कहती हैं) हे राघव (राम)! एक बार फिर (अयोध्या) वापस आ जाओ। | O Raghav! Come back once again. |

    | ए बर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ।। | अपने इन श्रेष्ठ घोड़ों (बर बाजि) को देखकर फिर भले ही वन को चले जाना। | Look at these excellent horses of yours, then you may return to the forest. |

    | जे पय प्याइ पोखि कर पंकज वार वार चुचुकारे। | जिन्हें तुम अपने कमल रूपी हाथों (कर पंकज) से बार-बार पानी/दूध पिलाकर पुचकारते थे और पालते थे। | The ones you nourished with water/milk, caressing them again and again with your lotus hands. |

    | क्यों जीवहिं, मेरे राम लाडिले! ते अब निपट बिसारे।। | हे मेरे लाडले राम! वे घोड़े अब कैसे जिएंगे जिन्हें तुमने बिल्कुल भुला दिया है? | How will they survive, my darling Ram! You have completely forgotten them. |

    | भरत सौगुनी सार करत हैं अति प्रिय जानि तिहारे। | यद्यपि भरत तुम्हारी प्रिय वस्तु जानकर इनकी सौ गुनी देखभाल (सार) करते हैं। | Though Bharat takes care of them a hundred times more, knowing they are dear to you. |

    | तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे।। | फिर भी ये दिन-प्रतिदिन मुरझाते (झाँवरे) जा रहे हैं, जैसे कमल को बर्फ/पाला (हिम) मार गया हो। | Yet, day by day they wither, like a lotus struck by frost. |

    | सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन कहियो मातु संदेसो। | हे पथिक (राही)! सुन, यदि वन में तुझे राम मिलें, तो उनसे माता का यह संदेश कह देना। | Listen, O traveler! If you meet Ram in the forest, give him this message from his mother. |

    | तुलसी मोहिं और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो।। | तुलसीदास कहते हैं (कौशल्या के शब्दों में) कि मुझे अपनी और दूसरों की अपेक्षा इन घोड़ों की सबसे ज्यादा चिंता (अंदेसा) है। | Tulsidas says: I am more worried about them (horses) than about myself or anyone else. |

    3. कठिन शब्दार्थ (Glossary)

    शब्द (Word)

    अर्थ (Hindi Meaning)

    English Context

    नीरज नयन

    कमल रूपी नेत्र

    Lotus eyes

    कोह

    क्रोध

    Anger

    खुनिस

    खीज / नाराजगी

    Annoyance / Irritation

    मातु मंदि

    माता नीच/बुरी है

    Mother is bad/vile

    कोदव

    एक मोटा अनाज (छोटा चावल)

    Coarse grain

    संबुक

    घोंघा

    Snail

    पनहियाँ

    जूतियाँ

    Shoes / Footwear

    चित्रलिखी सी

    चित्र के समान स्थिर/जड़

    Motionless like a picture

    बाजि

    घोड़ा

    Horse

    हिममारे

    बर्फ/पाला मारा हुआ

    Frost-bitten / Withered

    4. साहित्यिक विश्लेषण (Literary Analysis)

    (क) भरत-राम का प्रेम (Ramcharitmanas)

    • भाव पक्ष (Thematic Aspect): यहाँ 'भ्रातृ-प्रेम' (Brotherly Love) और 'भक्ति' का अद्वितीय संगम है। भरत का आत्म-त्याग और राम की उदारता पाठकों को भाव-विभोर करती है। भरत का पश्चाताप 'सात्विक' है।

    • कला पक्ष (Artistic Aspect):

      • भाषा: ठेठ अवधी (Avadhi)।

      • छंद: दोहा और चौपाई

      • अलंकार:

        • अनुप्रास: "पुलकि सरीर", "नीरज नयन नेह", "साधु सुचि"।

        • दृष्टांत: कोदों और घोंघा का उदाहरण (फरइ कि कोदव...)।

        • उपमा: "मोर अभाग उदधि अवगाहू" (समुद्र जैसा गहरा दुर्भाग्य)।

    (ख) पद (Gitavali)

    • भाव पक्ष (Thematic Aspect): यहाँ 'वात्सल्य रस' (Vatsalya Ras - वियोग पक्ष) की प्रधानता है। माँ का पुत्र के प्रति प्रेम और पालतू पशुओं (घोड़ों) के प्रति संवेदना दिखाई गई है।

    • कला पक्ष (Artistic Aspect):

      • भाषा: मधुर ब्रज भाषा (Braj Bhasha)।

      • छंद: गेय पद (Lyrical Verses/Pad)।

      • अलंकार:

        • उपमा: "चित्रलिखी सी" (चित्र जैसी), "प्रीति सिखी सी" (मोरनी जैसी)।

        • उत्प्रेक्षा: "मनहुँ कमल हिममारे" (मानो कमल को पाला मार गया हो)।

        • पुनरुक्ति प्रकाश: "बार-बार", "दिनहिं दिन"।

    5. काव्यांश आधारित प्रश्न (Extract-Based Competency)

    संदर्भ 1 (भरत-राम का प्रेम):

    "मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।। मो पर कृपा सनेहु बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।"

    1. भरत राम के किस स्वभाव की चर्चा कर रहे हैं?

      • उत्तर: भरत बता रहे हैं कि राम अत्यंत दयालु और शांत स्वभाव के हैं। वे अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते और खेल में भी कभी खीजते नहीं हैं।

    2. 'खेलत खुनिस न कबहूँ देखी' का क्या आशय है?

      • उत्तर: इसका आशय है कि बचपन में खेल-खेल में भी राम ने कभी गुस्सा या नाराजगी नहीं दिखाई। वे हारकर भी भरत को जिता देते थे ताकि भरत का मन न टूटे।

    3. इस काव्यांश की भाषा कौन सी है?

      • उत्तर: अवधी भाषा।

    संदर्भ 2 (पद - गीतावली):

    "तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे।। सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन कहियो मातु संदेसो।"

    1. 'झाँवरे' कौन हो रहे हैं और क्यों?

      • उत्तर: राम के प्रिय 'घोड़े' दिन-प्रतिदिन कमजोर और मलिन (झाँवरे) होते जा रहे हैं क्योंकि वे राम के वियोग में दुखी हैं।

    2. 'मनहुँ कमल हिममारे' में कौन सा अलंकार है?

      • उत्तर: यहाँ 'उत्प्रेक्षा अलंकार' है। घोड़ों के कुम्हलाने की संभावना 'पाले से मारे गए कमल' से की गई है।

    3. माता कौशल्या पथिक से क्या संदेश भेजती हैं?

      • उत्तर: वे संदेश भेजती हैं कि राम एक बार आकर अपने घोड़ों को देख जाएं, अन्यथा वे जीवित नहीं रहेंगे।

    6. पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर (Textbook Q&A)

    A. बोधात्मक प्रश्न (Short Answer)

    • प्रश्न 1: 'हारेंहूँ खेल जितावहिं मोही' - भरत के इस कथन का क्या आशय है?

      • उत्तर: भरत कहना चाहते हैं कि राम उनसे इतना प्रेम करते थे कि बचपन में खेल के दौरान वे जानबूझकर हार जाते थे ताकि भरत को जीतने की खुशी मिले। यह राम के बड़प्पन और स्नेह को दर्शाता है।

    • प्रश्न 2: 'मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ' में राम की किन विशेषताओं की ओर संकेत है?

      • उत्तर: राम अपराधी पर क्रोध नहीं करते, छोटों पर विशेष स्नेह रखते हैं, और कभी किसी का मन नहीं तोड़ते। वे अत्यंत कोमल और क्षमाशील स्वभाव के हैं।

    • प्रश्न 3: 'रहि चकि चित्रलिखी सी' पंक्ति का मर्म अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।

      • उत्तर: माता कौशल्या राम के भ्रम में उन्हें जगाने जाती हैं, पर जब उन्हें वास्तविकता (राम के वनवास) का स्मरण होता है, तो वे अत्यधिक दुख के कारण जड़वत (stunned) हो जाती हैं। वे चित्र (तस्वीर) की तरह स्थिर रह जाती हैं, न हिल पाती हैं, न बोल पाती हैं।

    B. विश्लेषणात्मक प्रश्न (Long Answer)

    • प्रश्न 4: 'महीं सकल अनरथ कर मूला' पंक्ति द्वारा भरत के विचारों-भावों का स्पष्टीकरण कीजिए।

      • उत्तर: भरत अत्यधिक आत्म-ग्लानि (Guilt) में हैं। वे कहते हैं कि इस पृथ्वी (मही) पर हुए सारे अनर्थ (राम का वनवास, पिता की मृत्यु) का मूल कारण 'मैं' हूँ। अगर मेरा जन्म न होता या कैकेयी को मेरे लिए मोह न जागता, तो यह संकट नहीं आता। वे विनम्रतापूर्वक सारा दोष अपने माथे ले लेते हैं।

    • प्रश्न 5: 'फरइ कि कोदव बालि सुसाली...' पंक्ति में छिपे भाव और शिल्प सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।

      • उत्तर:

        • भाव: भरत कहते हैं कि जैसे कोदों (मोटे अनाज) से उत्तम धान नहीं उग सकता और घोंघे से मोती नहीं मिल सकता, वैसे ही कैकेयी जैसी माता से मेरे जैसा साधु पुत्र कैसे हो सकता है? वे स्वयं को अपनी माँ के पापों का भागीदार मानते हैं।

        • शिल्प: इसमें 'दृष्टांत अलंकार' (Example) का सुंदर प्रयोग है। भाषा अवधी है और शैली प्रश्नात्मक है।

    • प्रश्न 6: गीतावली के पद 'राघौ एक बार फिरि आवौ' में निहित करुणा और संदेश को स्पष्ट कीजिए।

      • उत्तर: इस पद में वात्सल्य और करुणा की पराकाष्ठा है। माँ कौशल्या अपने लिए नहीं, बल्कि मूक पशुओं (घोड़ों) की खातिर राम को बुला रही हैं। संदेश यह है कि राम का प्रेम केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं था, पशु भी उनके वियोग में प्राण त्यागने को तत्पर हैं। यह राम के व्यापक प्रेम को दर्शाता है।

    7. अभिव्यक्ति और माध्यम (Creative Writing Connection)

    • संबंधित आलेख विषय: "भाई हो तो भरत जैसा" या "माँ का वात्सल्य: वियोग के दर्पण में"

    • मुख्य बिंदु:

      • आज के दौर में संपत्ति के लिए भाइयों का झगड़ा बनाम भरत का त्याग।

      • भरत का राज्य को ठुकराना और राम की चरण पादुका मांगना।

      • कौशल्या की पीड़ा—हर माँ की पीड़ा जो संतान से दूर है।

    8. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण कथन (Key Quotes)

    1. "हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेंहि भल मोरा।।" (निराशा में आशा की किरण - राम पर विश्वास)।

    2. "कबहुँ समुझि वनगमन राम को रहि चकि चित्रलिखी सी।" (कौशल्या की वियोग अवस्था)।

    3. "तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे।" (घोड़ों की दशा का वर्णन)।

    9. सामान्य त्रुटियाँ (Common Student Errors)

    • भाषा: छात्र अक्सर 'रामचरितमानस' के अंश को ब्रज और 'गीतावली' को अवधी समझ लेते हैं।

      • सही: रामचरितमानस = अवधी, गीतावली = ब्रज

    • पात्र: 'पथिक' से संदेश भेजने वाली कौशल्या हैं, न कि सीता या उर्मिला।

    • संदर्भ: भरत 'चित्रकूट' की सभा में बोल रहे हैं, अयोध्या में नहीं।

    10. विगत वर्षों के बोर्ड प्रश्न (PYQs)

    • प्रश्न 1 (लघु - 2 अंक): भरत ने अपनी माँ कैकेयी के लिए किन उपमानों (उदाहरणों) का प्रयोग किया?

      • उत्तर: भरत ने माँ के लिए 'कोदव' (मोटा अनाज) और 'संबुक' (काली घोंघा) जैसे उपमानों का प्रयोग किया, जो तुच्छता के प्रतीक हैं।

    • प्रश्न 2 (लघु - 2 अंक): कौशल्या राम को जगाते समय क्या कहती हैं?

      • उत्तर: वे कहती हैं- "बेटा, उठो! तुम्हारा मुँह देखकर माँ न्योछावर होती है। बाहर तुम्हारे छोटे भाई और मित्र तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। पिताजी के पास जाओ।"

    • प्रश्न 3 (दीर्घ - 5 अंक): सिद्ध कीजिए कि तुलसीदास का भाषा पर पूरा अधिकार था।

      • उत्तर: तुलसीदास ने 'भरत-राम का प्रेम' में ठेठ अवधी का प्रयोग किया है जो दोहा-चौपाई छंद में अत्यंत स्वाभाविक है। वहीं 'पद' में उन्होंने ब्रज भाषा का माधुर्य बिखेरा है जिसमें वात्सल्य और संगीत है। दोनों भाषाओं पर उनका समान और असाधारण अधिकार था, जो इन रचनाओं से सिद्ध होता है।

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