10 - प्रेमघन की छाया-स्मृति (Premghan Ki Chhaya-Smriti)- Class 12 - Antara 2
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प्रेमघन की छाया-स्मृति (Premghan Ki Chhaya-Smriti) Class 12 - Hindi Elective (Antara Bhag 2) | Author: रामचंद्र शुक्ल (Ramchandra Shukla)
1. लेखक परिचय (Literary Profile)
साहित्यिक विशेषताएँ (Literary Traits): आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ आलोचक (Critic), इतिहासकार और निबंधकार माने जाते हैं। उनका लेखन विचार-प्रधान, तर्कपूर्ण और विश्लेषणात्मक है। उन्होंने हिंदी साहित्य को एक व्यवस्थित इतिहास और आलोचना की नई दृष्टि दी। उनकी गद्य शैली में 'तत्सम' शब्दावली के साथ-साथ मुहावरों का सटीक प्रयोग मिलता है ।
प्रमुख रचनाएँ (Key Works):
इतिहास ग्रंथ: हिंदी साहित्य का इतिहास (कालजयी रचना) ।
निबंध संग्रह: चिंतामणि (चार भाग), रस मीमांसा ।
संपादन: जायसी ग्रंथावली, भ्रमरगीत सार ।
2. पाठ का सार (Executive Summary)
प्रतिपाद्य (Central Theme): यह पाठ एक संस्मरणात्मक निबंध (Memoir) है। इसमें शुक्ल जी ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए यह बताया है कि कैसे उनके मन में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम जागृत हुआ। पाठ का केंद्र बिंदु 'भारतेंदु मंडल' के प्रमुख कवि उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' हैं। लेखक ने उनके व्यक्तित्व, रईसी ठाठ-बाट, और वाकपटुता (Wit) का अत्यंत रोचक और सजीव चित्रण किया है।
English Explanation: This chapter is a memoir by Ramchandra Shukla, tracing his early literary awakening. It focuses on his fascination with the Bhartendu circle of writers, specifically detailing his interactions and observations of Upadhyaya Badrinarayan Chaudhary 'Premghan'. The text highlights Premghan's aristocratic lifestyle, eccentric personality, and witty nature, which deeply influenced the young Shukla.
Key Points:
साहित्यिक वातावरण: लेखक के पिता फारसी और हिंदी कविता के प्रेमी थे। घर में 'रामचरितमानस' और 'रामचंद्रिका' का पाठ होता था ।
भारतेंदु से जुड़ाव: लेखक बचपन में 'राजा हरिश्चंद्र' और 'कवि हरिश्चंद्र' में भेद नहीं कर पाते थे। मिर्जापुर आने पर उन्हें पता चला कि भारतेंदु के मित्र 'प्रेमघन' वहीं रहते हैं ।
प्रेमघन की पहली झलक: लेखक ने बाल-मंडली के साथ जाकर प्रेमघन को पहली बार बरामदे में खंभे के सहारे खड़े देखा—लंबे बाल, रईसी अंदाज ।
हिन्दी प्रेमी मंडली: युवावस्था में लेखक को काशीप्रसाद जायसवाल, भगवानदास हालना जैसे हिंदी प्रेमियों का साथ मिला। उर्दू भाषी लोग इनकी मंडली को मजाक में 'निस्संदेह लोग' कहते थे ।
प्रेमघन का व्यक्तित्व: वे भारतीय रईस थे। उनके संवाद विलक्षण और वक्रता (टेढ़ापन/व्यंग्य) से भरे होते थे। वे नौकरों तक से अनोखे अंदाज में बात करते थे ।
3. कठिन शब्दार्थ (Glossary)
शब्द (Word) | अर्थ (Hindi Meaning) | English Context |
उत्कंठा | तीव्र इच्छा / लालसा | Curiosity / Eagerness |
लता-प्रतान | लताओं का फैलाव / झुंड | Creepers / Vines spreading |
पुरातत्त्व | प्राचीन इतिहास / पुरानी वस्तुएँ | Archeology / Antiquity |
समवयस्क | समान उम्र का | Contemporary / Same age |
अमला | कर्मचारी मंडल | Staff / Officials |
वाकिफ | जानकार / परिचित | Acquainted / Aware |
तबीयतदारी | रईसी मिजाज / शौकीनी | Aristocratic temperament |
विलक्षण वक्रता | अनोखा टेढ़ापन / व्यंग्यपूर्ण शैली | Unique wit / Sarcasm |
परिपाटी | परंपरा / रीति | Tradition / Custom |
घनचक्कर | मूर्ख / चक्कर में डालने वाला | Fool / Confusing person |
4. साहित्यिक विश्लेषण (Literary Analysis) - PROSE
मूल संवेदना (Core Sentiment)
पाठ में 'साहित्यिक संस्कारों के निर्माण' (Formation of literary values) की प्रक्रिया को दिखाया गया है। एक किशोर मन कैसे अपने आदर्शों (Idols) को देखता है और उनसे प्रभावित होता है, इसका मनोवैज्ञानिक चित्रण है। यह पाठ हिंदी भाषा के विकास के उस दौर को भी दिखाता है जब हिंदी और उर्दू के बीच एक सांस्कृतिक संघर्ष चल रहा था (नागरी vs उर्दू)।
चरित्र चित्रण (Character Sketch) - बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'
हिंदुस्तानी रईस: वे वसंत पंचमी, होली आदि त्योहारों पर खूब उत्सव मनाते थे। उनके रहन-सहन में नजाकत और शान थी ।
शारीरिक वेशभूषा: कंधों तक लटकते बाल, बरामदे में टहलना, पीछे पान की तश्तरी लिए नौकर का होना ।
वाकपटुता (Wit): उनकी बातों में सीधापन नहीं, बल्कि एक 'विलक्षण वक्रता' (Humorous twist) होती थी। वे लोगों को 'बनाने' (मूर्ख बनाने/मजाक करने) में माहिर थे ।
भाषा-प्रेम: वे 'नागरी' को ही असली भाषा मानते थे और मिर्जापुर को 'मीरजापुर' (लक्ष्मीपुर) लिखते थे ।
5. गद्यांश आधारित प्रश्न (Extract-Based Competency)
संदर्भ 1:
"लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी। दोनों कंधों पर बाल बिखरे हुए थे। एक हाथ खंभे पर था। देखते ही देखते यह मूर्ति दृष्टि से ओझल हो गई। बस, यही पहली झाँकी थी।"
'मूर्ति' शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है?
उत्तर: 'मूर्ति' शब्द का प्रयोग उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' के लिए किया गया है।
लेखक ने उन्हें किस अवस्था में देखा?
उत्तर: लेखक ने उन्हें अपने घर के बरामदे में लताओं के बीच खंभे का सहारा लेकर खड़े देखा। उनके बाल कंधों तक बिखरे हुए थे, जो उनके रईसी और कलात्मक व्यक्तित्व को दर्शाता है।
'पहली झाँकी' का लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: यह झाँकी लेखक के बाल-मन पर गहरी छाप छोड़ गई। इसने उनकी साहित्य और साहित्यकारों के प्रति जिज्ञासा (कुतूहल) को और बढ़ा दिया।
संदर्भ 2:
"मेरे मुहल्ले में कोई मुसलमान सब-जज आ गए थे... पिता जी ने मेरा परिचय देते हुए उनसे कहा-'इन्हें हिंदी का बड़ा शौक है।' चट जवाब मिला-'आपको बताने की जरूरत नहीं। मैं तो इनकी सूरत देखते ही इस बात से वाकिफ़ हो गया'।"
सब-जज साहब ने लेखक के बारे में क्या टिप्पणी की?
उत्तर: उन्होंने व्यंग्य में कहा कि लेखक की सूरत देखकर ही पता चलता है कि उन्हें हिंदी का शौक है।
इस कथन में 'सूरत' से क्या व्यंजना (Implication) निकलती है?
उत्तर: उस समय उर्दू-भाषी लोग हिंदी बोलने वालों को थोड़ा गंवार या पुराने ख्यालों का ('निस्संदेह लोग') मानते थे। यह टिप्पणी उसी सांस्कृतिक पूर्वाग्रह (Prejudice) को दर्शाती है।
लेखक और उनकी मंडली की बोली को लोग क्या कहते थे?
उत्तर: लोग उन्हें 'निस्संदेह लोग' कहते थे क्योंकि वे अपनी बातचीत में 'निस्संदेह' जैसे तत्सम हिंदी शब्दों का प्रयोग करते थे ।
6. पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर (Textbook Q&A)
A. बोधात्मक प्रश्न (Short Answer)
प्रश्न 1: लेखक ने अपने पिता जी की किन-किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
उत्तर: लेखक के पिता फारसी के अच्छे ज्ञाता और पुरानी हिंदी कविता के प्रेमी थे। उन्हें रात में परिवार को इकट्ठा कर 'रामचरितमानस' और 'रामचंद्रिका' को चित्ताकर्षक ढंग से पढ़कर सुनाना पसंद था। वे भारतेंदु के नाटकों के भी प्रशंसक थे ।
प्रश्न 2: बचपन में लेखक के मन में भारतेंदु जी के संबंध में कैसी भावना जगी रहती थी?
उत्तर: बचपन में लेखक 'सत्य हरिश्चंद्र' नाटक के नायक राजा हरिश्चंद्र और कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र में कोई अंतर नहीं कर पाते थे। उनके बाल-मन में दोनों मिलकर एक अपूर्व माधुर्य और आदर्श की भावना जगाते थे ।
प्रश्न 3: उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' की पहली झलक लेखक ने किस प्रकार देखी?
उत्तर: लेखक ने बाल-मंडली के साथ डेढ़ मील का सफर तय किया। प्रेमघन के घर के नीचे का बरामदा खाली था, लेकिन ऊपर लताओं के बीच वे खंभे पर हाथ रखे, बालों को कंधों पर बिखराए एक मूर्ति की तरह खड़े दिखाई दिए ।
प्रश्न 4: लेखक का हिंदी साहित्य के प्रति झुकाव किस तरह बढ़ता गया?
उत्तर: पिता जी के साहित्यिक संस्कारों, भारतेंदु मंडल के प्रभाव और पंडित केदारनाथ पाठक के पुस्तकालय से पुस्तकें ला-लाकर पढ़ने से लेखक का झुकाव हिंदी के नूतन साहित्य की ओर बढ़ता गया ।
प्रश्न 5: 'निस्संदेह' शब्द को लेकर लेखक ने किस प्रसंग का जिक्र किया है?
उत्तर: लेखक जिस मोहल्ले में रहते थे, वहाँ अधिकतर उर्दू-भाषी वकील और अफसर थे। लेखक और उनके मित्र शुद्ध हिंदी बोलते थे और बातचीत में 'निस्संदेह' शब्द का प्रयोग करते थे। यह शब्द उर्दू कानों को अजीब लगता था, इसलिए उन लोगों ने लेखक की मंडली का नाम ही 'निस्संदेह लोग' रख दिया था ।
B. विश्लेषणात्मक प्रश्न (Long Answer)
प्रश्न 6: "इस पुरातत्व की दृष्टि में प्रेम और कुतूहल का अद्भुत मिश्रण रहता था।" यह कथन किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
उत्तर: यह कथन उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' के संदर्भ में है। लेखक और उनकी युवा मंडली के लिए प्रेमघन एक 'पुरानी चीज़' (पुरातत्व) की तरह थे—एक बीते हुए रईसी जमाने के प्रतिनिधि। लेखक के मन में उनके प्रति वरिष्ठ साहित्यकार होने का प्रेम (सम्मान) था और उनके अनोखे व्यक्तित्व को जानने का कुतूहल (Curiosity) था ।
प्रश्न 7: प्रस्तुत संस्मरण में लेखक ने चौधरी साहब के व्यक्तित्व के किन-किन पहलुओं को उजागर किया है?
उत्तर:
रईसी ठाठ: लंबे बाल, त्योहारों पर उत्सव, नौकरों की फौज।
विलक्षण संवाद: सीधी बात न करना। नौकर से गिलास गिरने पर कहना- "कारे बचा त नाहीं" ।
हास्य-व्यंग्य: 'घनचक्कर' का अर्थ पूछने पर पड़ोसी को मूर्ख बनाना ।
निश्चिंतता: लैम्प की बत्ती भभकने पर खुद न बुझाकर नौकर को आवाज देते रहना ("जब फूट जाई तबै चलत आवह") ।
प्रश्न 8: 'भारतेंदु जी के मकान के नीचे का यह हृदय-परिचय बहुत शीघ्र गहरी मैत्री में परिणत हो गया।' कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक एक बारात में काशी गए थे। वहाँ चौखंभा में घूमते हुए उन्होंने पं. केदारनाथ पाठक को एक घर से निकलते देखा, जो भारतेंदु जी का घर था। भारतेंदु जी के प्रति लेखक की अगाध श्रद्धा थी। उस घर को भावविभोर होकर देखते हुए लेखक की आँखों में जो प्रेम उमड़ा, उसे पाठक जी ने पहचान लिया। इसी 'हृदय-परिचय' (समान संवेदना) ने उन्हें गहरा मित्र बना दिया ।
7. अभिव्यक्ति और माध्यम (Creative Writing Connection)
संबंधित आलेख विषय: "साहित्य और समाज का रिश्ता" या "मेरे जीवन का अविस्मरणीय संस्मरण"
मुख्य बिंदु:
बचपन के संस्कार जीवन भर की दिशा तय करते हैं (शुक्ल जी का उदाहरण)।
साहित्यकार केवल रचनाएँ नहीं करता, वह अपने व्यक्तित्व से एक युग का निर्माण करता है (प्रेमघन और भारतेंदु मंडल)।
भाषा संस्कृति की पहचान होती है (हिंदी vs उर्दू प्रसंग)।
8. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण कथन (Key Quotes)
"बातों की काँट-छाँट का क्या कहना है! जो बातें उनके मुँह से निकलती थीं, उनमें एक विलक्षण वक्रता रहती थी।" (प्रेमघन की वाकशैली पर)।
"मैं तो इनकी सूरत देखते ही इस बात से 'वाकिफ़' हो गया।" (सब-जज का व्यंग्य हिंदी प्रेमियों पर)।
"खंभा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाने की।" (वामनाचार्य गिरि द्वारा प्रेमघन पर कसा गया कवित्त) ।
9. सामान्य त्रुटियाँ (Common Student Errors)
पात्र भ्रम: छात्र अक्सर 'प्रेमघन' और 'भारतेंदु' में भ्रमित हो जाते हैं। याद रखें, पाठ में प्रेमघन का प्रत्यक्ष वर्णन है, भारतेंदु का केवल संदर्भ है।
वर्तनी: 'रामचंद्र शुक्ल' (सही), 'रामचन्द्र शुक्ल' (स्वीकार्य, पर मानक वर्तनी 'चंद्र' है)। 'प्रेमघन' (सही)।
शहर: लेखक के बचपन का शहर मिर्जापुर है, और भारतेंदु का घर काशी (बनारस) में है।
10. विगत वर्षों के बोर्ड प्रश्न (PYQs)
प्रश्न 1 (लघु - 2 अंक): लेखक ने प्रेमघन की छाया-स्मृति में अपने पिता की किन रुचियों का वर्णन किया है?
उत्तर: पिता जी को फारसी और हिंदी कविता का ज्ञान था। वे दोनों भाषाओं की उक्तियों को मिलाने में आनंद लेते थे। उन्हें रामचरितमानस, रामचंद्रिका और भारतेंदु के नाटक पढ़ना-सुनाना प्रिय था।
प्रश्न 2 (लघु - 2 अंक): 'निस्संदेह लोग' किसे और क्यों कहा जाता था?
उत्तर: लेखक और उनके मित्रों की मंडली को उर्दू भाषी वकील/मुख्तार 'निस्संदेह लोग' कहते थे, क्योंकि वे बातचीत में हिंदी के तत्सम शब्द 'निस्संदेह' का बार-बार प्रयोग करते थे।
प्रश्न 3 (दीर्घ - 5 अंक): प्रेमघन के व्यक्तित्व की उन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए जिन्होंने लेखक को प्रभावित किया।
उत्तर: प्रेमघन का व्यक्तित्व चुंबकीय था।
उनका रईसी अंदाज (बाल, वेशभूषा) लेखक को आकर्षित करता था।
उनकी संवाद शैली (Dialogue delivery) निराली थी; वे कभी सीधी बात नहीं करते थे।
उनका हिंदी प्रेम—वे मिर्जापुर को 'मीरजापुर' (लक्ष्मीपुर) लिखते थे।
उनका विनोद-भाव—लैम्प गिरने की घटना या घनचक्कर का अर्थ पूछना, उनकी हास्य-वृत्ति को दर्शाता है।
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