15. श्रम विभाजन और जाति प्रथा | मेरी कल्पना का आदर्श समाज - Shram Vibhajan aur Jati Pratha | Meri Kalpana ka Adarsh Samaj - Class 12 - Aroh - 2
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Updated: 10 hours ago
Author: बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर
1. लेखक परिचय (Literary Profile)
साहित्यिक विशेषताएँ (Literary Traits): बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर आधुनिक भारतीय चिंतन के प्रमुख संवाहक और भारतीय संविधान के निर्माता हैं. वे सामाजिक समता, न्याय और मानवीय गरिमा के प्रबल पक्षधर थे. उनका लेखन तर्कपूर्ण, तथ्यपरक और वैचारिक स्पष्टता से ओत-प्रोत है, जो समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने का प्रयास करता है.
प्रमुख रचनाएँ (Key Works): कास्ट्स इन इंडिया, द अनटचेबल्स, एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट, बुद्धा एंड हिज धम्मा.
संपादन: मूक नायक, बहिष्कृत भारत, जनता.
2. पाठ का सार (Executive Summary)
प्रतिपाद्य (Central Theme): यह पाठ आंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण 'एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट' का अंश है. इसमें लेखक ने जाति प्रथा को 'श्रम विभाजन' का नहीं बल्कि 'श्रमिकों के विभाजन' का एक अस्वाभाविक रूप बताया है. उन्होंने एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की है जो स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता (भाईचारे) पर आधारित हो.
English Summary: Dr. Ambedkar critiques the caste system as an unnatural division of laborers that stifles individual choice and leads to economic inefficiency. He argues that true democracy is not just a form of government but a 'mode of associated living' based on liberty, equality, and fraternity.
Key Points:
जाति प्रथा व्यक्ति की रुचि या क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर पेशा निर्धारित करती है.
पेशा बदलने की अनुमति न होने के कारण जाति प्रथा भुखमरी और बेरोजगारी का कारण बनती है.
आदर्श समाज में 'बहुमुखी हितों' में सबका भाग होना चाहिए और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए.
लोकतंत्र वास्तव में सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति और समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है.
3. कठिन शब्दार्थ (Glossary)
शब्द | हिंदी अर्थ | English Context |
विडंबना | उपहास / मजाक | Irony |
अस्वाभाविक | जो प्राकृतिक न हो | Unnatural |
प्रतिष्ठित | स्थापित | Established |
भ्रातृता | भाईचारा | Fraternity |
उत्पीड़न | कष्ट देना / शोषण | Oppression |
व्यवहार्य | व्यवहार में लाने योग्य | Practicable |
4. साहित्यिक विश्लेषण (Literary Analysis)
मूल संवेदना (Core Sentiment): जातिवाद का समूल नाश और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना. लेखक ने तर्कों के माध्यम से सिद्ध किया है कि जाति प्रथा आर्थिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से हानिकारक है.
आदर्श समाज का ढांचा:
स्वतंत्रता: आवागमन, जीवन और शारीरिक सुरक्षा की स्वाधीनता.
समता: सभी को अपनी क्षमता के विकास के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना.
भ्रातृता: समाज में 'दूध-पानी के मिश्रण' की तरह भाईचारा होना चाहिए.
5. गद्यांश आधारित प्रश्न (Extract-Based Competency)
Extract 1: "यह विडंबना की ही बात है कि इस युग में भी 'जातिवाद' के पोषकों की कमी नहीं है। ... जाति प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का भी रूप लिए हुए है।"
Interpretation: लेखक ने किस बात को विडंबनापूर्ण माना है?
Author's Intent: 'श्रम विभाजन' और 'श्रमिक विभाजन' में क्या अंतर है?
Inference: जाति प्रथा को अस्वाभाविक विभाजन क्यों कहा गया है?
Extract 2: "लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है।"
Interpretation: लेखक के अनुसार लोकतंत्र की व्यापक परिभाषा क्या है?
Aesthetics: लोकतंत्र के लिए 'साथी' के प्रति कैसा भाव होना आवश्यक है?
Inference: क्या राजनीतिक स्वतंत्रता के बिना सामाजिक लोकतंत्र संभव है?
6. पाठ्यपुस्तक प्रश्नोत्तर (Textbook Q&A)
1. जाति प्रथा को श्रम विभाजन का एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
उत्तर: आंबेडकर के अनुसार श्रम विभाजन मनुष्य की रुचि पर आधारित होता है, जबकि जाति प्रथा जन्म आधारित है. यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा और आत्म-शक्ति को दबाकर उसे निष्क्रिय बना देती है.
2. जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का कारण कैसे बनती रही है?
उत्तर: जाति प्रथा व्यक्ति को पैतृक पेशा चुनने को विवश करती है. प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पेशा बदलने की अनुमति न होने के कारण, यदि वह पेशा जीवित रहने के लिए पर्याप्त न हो, तो व्यक्ति को भुखमरी और बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है.
3. लेखक के मत से 'दासता' (Slavery) की व्यापक परिभाषा क्या है?
उत्तर: दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं है. इसमें वह स्थिति भी सम्मिलित है जहाँ कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है.
4. आंबेडकर 'समता' को एक व्यवहार्य सिद्धांत क्यों मानते हैं?
उत्तर: यद्यपि जन्म और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से सभी मनुष्य समान नहीं होते, फिर भी राजनीतिज्ञ को सबके साथ समान व्यवहार करना पड़ता है क्योंकि मनुष्यों को श्रेणियों में बांटना संभव नहीं है. समता एक काल्पनिक सत्य होते हुए भी व्यवहार में श्रेष्ठ मार्ग है.
7. अभिव्यक्ति और माध्यम (Creative Writing Connection)
Topic: "21वीं सदी का भारत: जातिवाद से मुक्त समाज की चुनौतियाँ"
Key Points:
आधुनिक शिक्षा और संवैधानिक मूल्यों की भूमिका.
अंतर्जातीय विवाह और सामाजिक सद्भाव।
राजनीति में जातिवाद का प्रभाव और उसके दुष्परिणाम।
8. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण कथन (Key Quotes)
"जाति प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का भी रूप लिए हुए है।"
"लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति है।"
"भ्रातृता का दूसरा नाम लोकतंत्र है।"
9. सामान्य त्रुटियाँ (Common Student Errors)
Spelling: 'वाङ्मय', 'एनीहिलेशन' और 'भ्रातृता' की वर्तनी का विशेष ध्यान रखें.
Conceptual: लोकतंत्र को केवल चुनाव या सरकार मान लेना; आंबेडकर के अनुसार यह 'सामाजिक जुड़ाव' की प्रक्रिया है.
10. विगत वर्षों के बोर्ड प्रश्न (PYQs)
Short Answer (2 marks): आदर्श समाज के तीन प्रमुख तत्व कौन से हैं?
Model Answer: बाबा साहेब के अनुसार आदर्श समाज के तीन अनिवार्य तत्व हैं—स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता.
Long Answer (5 marks): "जाति प्रथा आर्थिक दृष्टि से भी एक हानिकारक प्रथा है।" पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
Model Answer: जाति प्रथा मनुष्य की व्यक्तिगत रुचि और क्षमता की उपेक्षा करती है. यह उसे एक ऐसे पेशे में बांध देती है जो आधुनिक तकनीक और बाजार की जरूरतों के अनुसार नहीं होता. पेशा बदलने की स्वतंत्रता न होने से आर्थिक असंतुलन, बेरोजगारी और उत्पादकता में कमी आती है, जो अंततः देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक है.
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