3.मनुष्यता - (Manushyata) - Class 10 - Sparsh Bhag 2
- Dec 7, 2025
- 9 min read
Updated: Dec 13, 2025

मनुष्यता (Manushyata)
Class 10 - Hindi Course B (Sparsh Bhag 2) |
Author: मैथिलीशरण गुप्त (Maithilisharan Gupt)
1. पाठ का सार (Quick Revision Summary)
मृत्यु और सुमृत्यु: कवि कहते हैं कि मनुष्य नश्वर (मरणशील) है, इसलिए मृत्यु से डरना नहीं चाहिए। हमें ऐसा जीवन जीना चाहिए कि मरने के बाद भी लोग हमें याद रखें। दूसरों के लिए जीने-मरने वाले की मृत्यु ही 'सुमृत्यु' (सम्मानजनक मृत्यु) कहलाती है।
English: Death and Honorable Death: The poet says that humans are mortal, so one should not fear death. We should live such a life that people remember us even after death. The death of one who lives and dies for others is called 'Sumrityu' (Honorable Death).
उदारता का महत्व: सरस्वती (विद्या की देवी) और धरती भी उसी उदार व्यक्ति का गुणगान करती हैं जो पूरी सृष्टि में अपनत्व का भाव रखता है। सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों की भलाई के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दे।
English: Importance of Generosity: Saraswati (Goddess of Knowledge) and the Earth also praise the generous person who holds a sense of belonging for the entire creation. A true human is one who sacrifices his life for the welfare of others.
पौराणिक उदाहरण: कवि ने रंतिदेव (जिन्होंने भूख से व्याकुल होकर भी अपनी थाली दान कर दी), दधीचि (जिन्होंने बज्र बनाने के लिए हड्डियाँ दान कीं), उशीनर (राजा शिवि) और कर्ण (कवच-कुंडल दान) के उदाहरण देकर त्याग और बलिदान का संदेश दिया है।
English: Mythological Examples: The poet has given the message of sacrifice through examples of Rantidev (who gave away his food despite being hungry), Dadhichi (who donated his bones for the weapon Vajra), Ushiinara (King Shibi), and Karna (who donated his armor).
सहानुभूति और अहंकार: कवि के अनुसार, सहानुभूति ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी है। हमें धन के घमंड में अंधा (मदांध) नहीं होना चाहिए क्योंकि ईश्वर (त्रिलोकनाथ) सबके साथ हैं, यहाँ कोई अनाथ नहीं है।
English: Sympathy and Ego: According to the poet, sympathy is the greatest wealth of a human being. We should not be blinded by the arrogance of wealth because God (Triloknath) is with everyone; no one is an orphan here.
विश्व-बंधुत्व (भाईचारा): हम सभी एक ही परमपिता परमात्मा की संतान हैं, इसलिए हम सब भाई-बंधु हैं। सबसे बड़ा पाप यह है कि एक भाई दूसरे भाई के कष्टों को दूर न करे। हमें मेलजोल बढ़ाकर एक साथ उन्नति के मार्ग पर चलना चाहिए।
English: Universal Brotherhood: We are all children of one Supreme Father, so we are all brothers. The greatest sin is if one brother does not remove the suffering of another. We should increase harmony and walk together on the path of progress.
2. शब्द-संपदा (Vocabulary)
शब्द (Word) | अर्थ (Hindi Meaning) | English Meaning |
मर्त्य | मरणशील / नश्वर | Mortal / Subject to death |
सुमृत्यु | अच्छी या सम्मानजनक मृत्यु | Honorable/Good Death |
वृथा | बेकार / व्यर्थ | Useless / Vain |
क्षुधार्त | भूख से व्याकुल (क्षुधा + ऋत) | Starving / Hungry |
करस्थ | हाथ में रखा हुआ | Held in hand |
परार्थ | दूसरों की भलाई के लिए | For the sake of others |
मदांध | गर्व/घमंड में अंधा | Blinded by arrogance |
अमर्त्य-अंक | देवता की गोद (स्वर्ग/अमरता) | Lap of Gods (Immortality) |
अभीष्ट | इच्छित / चाहा हुआ | Desired / Cherished |
विघ्न | बाधा / रुकावट | Obstacle |
3. चरित्र चित्रण (Character Sketches)
आदर्श मनुष्य (The Ideal Human)
परोपकारी और त्यागी (Altruistic & Sacrificial): आदर्श मनुष्य अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के हित के लिए जीता है। वह रंतिदेव और दधीचि की तरह समाज के लिए अपना सर्वस्व दान करने को तत्पर रहता है।
English: An ideal human lives not for himself but for the welfare of others. He is ready to sacrifice everything for society, like Rantidev and Dadhichi.
विनम्र और विवेकशील (Humble & Wise): उसे अपनी संपत्ति का अहंकार नहीं होता। वह जानता है कि ईश्वर सबका रक्षक है। वह भेदभाव भूलकर सभी मनुष्यों को अपना बंधु (भाई) मानता है।
English: He is not arrogant about his wealth. He knows that God is the protector of all. Forgetting discrimination, he considers all humans as his brothers.
4. योग्यता-आधारित प्रश्न (Competency-Based Questions)
A. अभिकथन और तर्क (Assertion & Reasoning)
प्रश्न 1:
अभिकथन (A): कवि ने 'मृत्यु' से न डरने की सलाह दी है।
तर्क (R): मनुष्य का शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है, और परोपकार करने वाले की कीर्ति मरने के बाद भी जीवित रहती है।
उत्तर: (क) A और R दोनों सही हैं, तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
प्रश्न 2:
अभिकथन (A): हमें धन-संपत्ति प्राप्त होने पर गर्व करना चाहिए।
तर्क (R): त्रिलोकनाथ (ईश्वर) दयालु हैं और वे सबके साथ हैं, इसलिए कोई भी व्यक्ति अनाथ या कमजोर नहीं है।
उत्तर: (घ) A गलत है, R सही है। (कवि ने धन के मद में अंधा न होने की सलाह दी है)।
B. स्थिति-आधारित विश्लेषण (Situation Analysis)
स्थिति (Situation): एक अमीर व्यक्ति सड़क पर घायल पड़े व्यक्ति को अनदेखा करके चला जाता है, जबकि एक गरीब मजदूर अपनी दिहाड़ी छोड़कर उसे अस्पताल पहुँचाता है।
प्रश्न (Question): 'मनुष्यता' कविता के आधार पर बताइए कि इनमें से किसे 'पशु-प्रवृत्ति' कहा जाएगा और किसे 'सच्चा मनुष्य'?
उत्तर (Answer): अमीर व्यक्ति का व्यवहार 'पशु-प्रवृत्ति' है क्योंकि पशु केवल अपने (चरने/खाने) के बारे में सोचता है। गरीब मजदूर 'सच्चा मनुष्य' है क्योंकि उसने "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे" पंक्ति को चरितार्थ किया है।
स्थिति (Situation): कक्षा में छात्रों के दो समूह अलग-अलग धर्मों के कारण आपस में बात नहीं करते।
प्रश्न (Question): मैथिलीशरण गुप्त जी के विचारों का प्रयोग करके आप उन्हें कैसे समझाएंगे?
उत्तर (Answer): मैं उन्हें समझाऊंगा कि "पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है"। हम सबके कर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारी आत्मा एक है (अंतरैक्य)। हमें "अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ" बनकर एक साथ चलना चाहिए, न कि भेदभाव करना चाहिए।
C. आशय स्पष्टीकरण (Intent/Inference)
प्रश्न 1: "सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही"
उत्तर: कवि का आशय है कि दूसरों के दुख में दुखी होना और दया भाव रखना ही मनुष्य की सबसे बड़ी दौलत (महाविभूति) है। धन-दौलत नश्वर है, लेकिन करुणा और परोपकार स्थायी संपत्ति है जो ईश्वर को भी वश में कर लेती है।
प्रश्न 2: "चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए"
उत्तर: इसका अर्थ है कि मनुष्य को अपने जीवन के निर्धारित लक्ष्य (परोपकार और मानवता) के रास्ते पर खुशी-खुशी आगे बढ़ना चाहिए। रास्ते में आने वाली मुसीबतों और बाधाओं को हँसते हुए दूर करना चाहिए और आपसी मेलजोल कम नहीं होने देना चाहिए।
5. प्रश्न-उत्तर (Subjective Q&A)
A. लघु उत्तरीय (Short Answer - 30-40 Words)
प्रश्न 1: कवि ने दधीचि और कर्ण का उदाहरण क्यों दिया है?
उत्तर: कवि ने यह बताने के लिए इनका उदाहरण दिया है कि सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों की भलाई के लिए शरीर का मोह नहीं करता। दधीचि ने अस्थियाँ और कर्ण ने अपना शरीर-चर्म (कवच) दान कर अमरता प्राप्त की।
प्रश्न 2: 'पशु-प्रवृत्ति' और 'मनुष्य-प्रवृत्ति' में क्या अंतर है?
उत्तर: 'पशु-प्रवृत्ति' का अर्थ है केवल अपने सुख और पेट भरने (आप आप ही चरे) तक सीमित रहना। जबकि 'मनुष्य-प्रवृत्ति' का अर्थ है अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के हित के लिए जीना और त्याग करना।
प्रश्न 3: "रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में" - इस पंक्ति द्वारा कवि क्या चेतावनी दे रहे हैं?
उत्तर: कवि चेतावनी दे रहे हैं कि धन (वित्त) तुच्छ और नश्वर है। इसके अहंकार में अंधे होकर दूसरों को अनाथ या कमजोर नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ईश्वर सभी के नाथ (रक्षक) हैं।
प्रश्न 4: 'सुमृत्यु' से कवि का क्या तात्पर्य है? यह कैसे प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर: 'सुमृत्यु' का अर्थ है ऐसी मृत्यु जिसे लोग याद रखें। यह परोपकार और त्यागपूर्ण जीवन जीने से प्राप्त होती है। जो मनुष्य दूसरों के लिए जीता और मरता है, वह मरने के बाद भी अमर हो जाता है।
प्रश्न 5: "मनुष्य मात्र बंधु है" - इस कथन का महत्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यह कथन विश्व-बंधुत्व की भावना को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं। यह विचार समाज से जाति, धर्म और रंग के भेदभाव को मिटाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 6: कवि ने बुद्ध के 'विरुद्धवाद' का उल्लेख किस संदर्भ में किया है?
उत्तर: बुद्ध ने करुणावश तत्कालीन पारंपरिक मान्यताओं का विरोध किया था। उनकी दया और परोपकार के कारण ही विनीत लोकवर्ग (संसार) उनके सामने नतमस्तक हो गया। परोपकार ही सच्चे सम्मान का आधार है।
प्रश्न 7: "अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े" - पंक्ति का भाव क्या है?
उत्तर: भाव यह है कि जो लोग परोपकार करते हुए एक-दूसरे का सहारा बनते हैं, उनका स्वागत करने के लिए देवता भी अपनी बाहें फैलाकर (स्वबाहु) आकाश में खड़े रहते हैं। ऐसे लोगों को देवत्व प्राप्त होता है।
प्रश्न 8: कविता के अंत में कवि 'समर्थ भाव' किसे कहते हैं?
उत्तर: कवि के अनुसार, 'समर्थ भाव' वह है जब मनुष्य स्वयं तरते (उद्धार करते) हुए दूसरों को भी तारे। अर्थात अपनी उन्नति के साथ-साथ दूसरों का भी कल्याण करे। यही सच्ची सार्थकता है।
B. दीर्घ उत्तरीय/मूल्यपरक (Long/Value-Based - 100 Words)
प्रश्न 1: वर्तमान समय में 'मनुष्यता' कविता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए। क्या आज हम "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे" आदर्श का पालन कर रहे हैं?
उत्तर: आज के भौतिकवादी और स्वार्थी युग में 'मनुष्यता' कविता की प्रासंगिकता बहुत अधिक बढ़ गई है। आज मनुष्य धन और सत्ता की दौड़ में 'पशु-प्रवृत्ति' अपना रहा है और केवल अपने स्वार्थ (आप आप ही चरे) की चिंता कर रहा है। समाज में ईर्ष्या, द्वेष और भेदभाव बढ़ रहा है। ऐसे समय में गुप्त जी का यह संदेश कि "सहानुभूति चाहिए" और "मनुष्य मात्र बंधु है", हमें मानवता की राह दिखाता है। यदि हम दूसरों के दुख को नहीं समझते, तो हम कहलाने मात्र के मनुष्य हैं। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए इस कविता के मूल्यों को अपनाना अनिवार्य है।
प्रश्न 2: परोपकार ही मनुष्य का असली आभूषण है। 'मनुष्यता' कविता के आधार पर रंतिदेव और उशीनर के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए सिद्ध कीजिए।
उत्तर: 'मनुष्यता' कविता स्पष्ट करती है कि शरीर नश्वर है, लेकिन परोपकार की कीर्ति अमर है। रंतिदेव एक राजा थे, जिन्होंने स्वयं 48 दिनों तक भूखे रहने के बावजूद, अपने हाथ में आया भोजन (करस्थ थाल) एक भूख से तड़पते व्यक्ति को दे दिया। उशीनर (राजा शिवि) ने एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया। इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि इन महापुरुषों ने क्षणभंगुर शरीर की चिंता न करके 'परार्थ' (दूसरों की भलाई) को चुना। यही त्याग उन्हें आज भी पूजनीय बनाता है। अतः परोपकार ही मनुष्य की सच्ची पहचान और आभूषण है।
प्रश्न 3: "अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी" - इस पंक्ति का आशय स्पष्ट करते हुए बताइए कि धर्म और संप्रदाय के नाम पर होने वाले झगड़ों को कैसे रोका जा सकता है?
उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि यद्यपि हमारे रास्ते (धर्म/संप्रदाय) अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारा लक्ष्य एक ही है - मानवता और ईश्वर की प्राप्ति। हमें तर्क-वितर्क और झगड़ों से ऊपर उठकर (अतर्क), सावधानीपूर्वक (सतर्क) एक साथ आगे बढ़ना चाहिए। आज धर्म के नाम पर होने वाले झगड़ों का मुख्य कारण अज्ञान और 'बाह्य भेद' (कर्मफल/रीति-रिवाज) पर ध्यान देना है। यदि हम कवि के इस संदेश को समझ लें कि "अन्तरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं" (आत्मा एक है) और हम सब एक ही पिता की संतान हैं, तो सांप्रदायिक वैमनस्य समाप्त हो सकता है और विश्व में शांति स्थापित हो सकती है।
6. व्याकरण (Integrated Grammar)
(Based on Class 10 Hindi Course B - Sparsh Pattern)
प्रश्न 1: पदबंध पहचानिए: "भूख से व्याकुल रंतिदेव ने अपना भोजन दे दिया।" (रेखांकित: भूख से व्याकुल)
उत्तर: विशेषण पदबंध (यह रंतिदेव की विशेषता बता रहा है)।
प्रश्न 2: समास विग्रह और भेद बताइए: "त्रिलोकनाथ"
उत्तर: तीनों लोकों का नाथ (स्वामी) है जो (अर्थात् ईश्वर) - बहुव्रीहि समास।
प्रश्न 3: मुहावरे का अर्थ बताइए: "प्राण न्योछावर करना"
उत्तर: बलिदान देना / दूसरों के लिए जीवन दे देना।
7. सामान्य त्रुटियाँ (Common Student Errors)
'मर्त्य' और 'मृत्यु' में भ्रम:
त्रुटि: छात्र 'मर्त्य' का अर्थ 'मृत्यु' समझ लेते हैं।
सुधार: 'मर्त्य' का अर्थ है 'मरणशील' (Mortal - जिसका मरना तय है), जबकि 'मृत्यु' का अर्थ है 'मौत' (Death)।
पौराणिक पात्रों के दान में भ्रम:
त्रुटि: छात्र अक्सर भूल जाते हैं कि किसने क्या दान दिया (जैसे कर्ण ने हड्डियाँ दीं - यह गलत है)।
सुधार: याद रखें - दधीचि ने अस्थियाँ (हड्डियाँ), कर्ण ने कवच-कुंडल (चर्म), और उशीनर ने अपना मांस दिया।
'पशु-प्रवृत्ति' की व्याख्या:
त्रुटि: छात्र इसे 'जानवरों जैसा व्यवहार' (क्रूरता) लिखते हैं।
सुधार: यहाँ पशु-प्रवृत्ति का अर्थ 'क्रूरता' नहीं, बल्कि 'केवल अपने पेट भरने तक सीमित रहना' (स्वार्थ) है।
End
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