4. हरिद्वार - (Haridwar)- Class 8 - Malhar
- Dec 28, 2025
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Updated: Jan 1

Author: भारतेंदु हरिश्चंद्र (Bharatendu Harishchandra)
1. पाठ का सार (Quick Revision Summary)
पाठ का परिचय: यह पाठ हिंदी साहित्य के जनक माने जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखा गया एक यात्रा-वृत्तांत है। यह वृत्तांत एक पत्र के रूप में है, जिसे उन्होंने 14 अक्टूबर 1871 को 'कविवचन सुधा' पत्रिका के संपादक को लिखा था। इसमें उन्होंने अपनी हरिद्वार यात्रा का अत्यंत रोचक और सजीव वर्णन किया है।
English: Introduction to the Lesson: This lesson is a travelogue written by Bharatendu Harishchandra, considered the father of Hindi literature. This account is in the form of a letter written on 14th October 1871 to the editor of the magazine 'Kavivachan Sudha'. In this, he has given a very interesting and vivid description of his visit to Haridwar.
हरिद्वार का प्राकृतिक सौंदर्य: लेखक लिखते हैं कि हरिद्वार तीन ओर से हरे-भरे पर्वतों से घिरा है। यहाँ के वृक्ष तपस्वी साधुओं की तरह एक पैर पर खड़े होकर धूप, वर्षा और ठंड सहते हैं। ये वृक्ष इतने परोपकारी (सज्जन) हैं कि पत्थर मारने पर भी फल देते हैं। गंगा का जल अत्यंत शीतल, स्वच्छ और अमृत जैसा मीठा है।
English: Natural Beauty of Haridwar: The author writes that Haridwar is surrounded by green mountains on three sides. The trees here stand on one leg like ascetic sadhus, enduring sun, rain, and cold. These trees are so benevolent (noble) that they give fruit even when hit with stones. The water of the Ganga is extremely cold, clean, and sweet like nectar.
गंगा और घाट: यहाँ गंगा दो धाराओं में बँट गई है- एक मुख्य गंगा और दूसरी नीलधारा। यहाँ 'हरि की पैड़ी' (पौड़ी) नामक पक्का घाट है जहाँ लोग स्नान करते हैं। लेखक को यहाँ गंगा के वेग और कलकल ध्वनि में बहुत आनंद आता है।
English: Ganga and Ghats: Here the Ganga is divided into two streams - the main Ganga and the Neil Dhara. There is a concrete ghat called 'Hari ki Pauri' where people bathe. The author finds great joy in the speed and murmuring sound of the Ganga here.
आध्यात्मिक अनुभव: लेखक कहते हैं कि हरिद्वार में प्रवेश करते ही मन शुद्ध हो जाता है। यहाँ काम, क्रोध और मोह जैसे विकार नहीं रहते। यहाँ का वातावरण इतना पवित्र है कि मन में अपने आप ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता है।
English: Spiritual Experience: The author says that the mind gets purified as soon as one enters Haridwar. Vices like lust, anger, and attachment do not exist here. The atmosphere here is so pure that knowledge, detachment, and devotion naturally arise in the mind.
भोजन का सुख: एक दिन लेखक ने गंगा तट पर पत्थरों पर ही रसोई बनाई और भोजन किया। गंगा के ठंडे छींटे उन पर पड़ रहे थे। लेखक मानते हैं कि पत्थर पर भोजन करने का वह सुख सोने की थाली में भोजन करने से कहीं बढ़कर था।
English: Joy of Food: One day, the author cooked and ate food on the stones on the banks of the Ganga. Cold splashes of Ganga water were falling on them. The author believes that the joy of eating on a stone was far greater than eating on a gold plate.
तीर्थ और विशेषताएँ: यहाँ के पंडे (पुजारी) बहुत संतोषी हैं। यहाँ की 'कुशा' (घास) बहुत विशेष है जिससे मसालों (दालचीनी/जावित्री) जैसी सुगंध आती है। लेखक कनखल, चंडी देवी और विल्व पर्वत जैसे स्थानों का भी ज़िक्र करते हैं।
English: Pilgrimage and Features: The pandas (priests) here are very contented. The 'Kusha' (grass) here is very special, smelling like spices (cinnamon/mace). The author also mentions places like Kankhal, Chandi Devi, and Bilva Parvat.
2. शब्द-संपदा (Vocabulary)
शब्द (Word) | अर्थ (Hindi Meaning) | English Meaning |
वल्ली | लता / बेल | Creeper / Vine |
मनोरथ | मन की इच्छा / कामना | Desire / Wish |
बधिक | शिकारी / वध करने वाला | Hunter / Killer |
कल्लोल | लहर / क्रीड़ा (खेलना) | Wave / Play / Frolic |
मिष्ट | मीठा | Sweet |
पावन | पवित्र | Holy / Pure |
विरक्त | जिसे दुनिया से मोह न हो / त्यागी | Detached / Ascetic |
मौनावलंबन | चुप हो जाना / मौन धारण करना | To observe silence |
बिछायत | बिछावन / कालीन | Bedding / Carpet |
स्थानदान | जगह देना (छापना) | To give space (publish) |
3. चरित्र चित्रण (Character Sketches)
लेखक (भारतेंदु हरिश्चंद्र)
प्रकृति प्रेमी और संवेदनशील (Nature Lover & Sensitive): लेखक प्रकृति के सूक्ष्म सौंदर्य को देखते हैं। उन्हें लताओं में सज्जनों का प्रेम और वृक्षों में साधुओं की तपस्या दिखाई देती है। वे शहरी सुखों की तुलना में प्राकृतिक सादगी (पत्थर पर भोजन) को अधिक महत्व देते हैं।
English: The author observes the subtle beauty of nature. He sees the love of noble people in creepers and the penance of sadhus in trees. He values natural simplicity (eating on a stone) more than urban comforts.
भक्त हृदय (Devout Heart): हरिद्वार की पवित्रता उन्हें भीतर तक छू जाती है। वे गंगा को केवल नदी नहीं, बल्कि साक्षात देवता मानते हैं। उनका मन भक्ति और वैराग्य से भर जाता है।
English: The purity of Haridwar touches him deeply. He considers the Ganga not just a river, but a living deity. His mind gets filled with devotion and detachment.
प्रकृति (मानवीकरण)
परोपकारी और तपस्वी (Benevolent & Ascetic): पाठ में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। वृक्ष 'तपस्या' करते हैं और 'सज्जन' हैं जो पत्थर मारने पर भी फल देते हैं। गंगा 'कीर्ति की लता' सी है और वायु 'पावन' करती है।
English: Nature is personified in the text. Trees perform 'penance' and are 'noble' giving fruit even when hit with stones. Ganga is like a 'vine of fame' and the wind 'purifies'.
4. योग्यता-आधारित प्रश्न (Competency-Based Questions)
A. अभिकथन और तर्क (Assertion & Reasoning)
प्रश्न 1: अभिकथन (A): लेखक ने कहा कि वृक्षों के जन्म धन्य हैं।
तर्क (R): वृक्ष परोपकारी होते हैं; वे अपनी हर चीज़ (फल, फूल, छाया, लकड़ी, राख) दूसरों के कल्याण के लिए दे देते हैं, कोई भी उनसे खाली हाथ (विमुख) नहीं लौटता।
उत्तर: (क) A और R दोनों सही हैं, तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
प्रश्न 2: अभिकथन (A): लेखक ने पत्थर पर भोजन करने के सुख को सोने की थाली के सुख से बढ़कर बताया। तर्क (R): लेखक के पास हरिद्वार में सोने की थाली उपलब्ध नहीं थी, इसलिए उन्हें मजबूरी में पत्थर पर खाना पड़ा।
उत्तर: (ग) A सही है, R गलत है। (उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि गंगा तट के प्राकृतिक वातावरण और मानसिक शांति ने उस साधारण भोजन को भी अद्वितीय बना दिया था, मजबूरी के कारण नहीं)।
B. स्थिति-आधारित विश्लेषण (Situation Analysis)
स्थिति (Situation): आज कल लोग तीर्थ स्थानों पर जाकर गंदगी फैलाते हैं और शोर मचाते हैं।
प्रश्न (Question): 'हरिद्वार' पाठ में वर्णित वातावरण से तुलना करते हुए बताइए कि हमें तीर्थ स्थानों पर कैसा व्यवहार करना चाहिए?
उत्तर (Answer): पाठ में हरिद्वार का वातावरण अत्यंत शांत, निर्मल और पवित्र बताया गया है, जहाँ क्रोध और इच्छाओं का कोई स्थान नहीं है। आज के पर्यटकों को इससे सीख लेनी चाहिए। हमें तीर्थ स्थानों की पवित्रता और शांति बनाए रखनी चाहिए। वहाँ गंदगी फैलाना या शोर मचाना उस 'पुण्यभूमि' का अपमान है। हमें वहाँ सादगी और संयम से रहना चाहिए।
C. आशय स्पष्टीकरण (Intent/Inference)
प्रश्न 1: "सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।"
उत्तर: इस पंक्ति में वृक्षों की तुलना सज्जन (परोपकारी) व्यक्तियों से की गई है। जैसे दुष्ट व्यक्ति द्वारा कष्ट (पत्थर) देने पर भी सज्जन व्यक्ति उसका भला ही करता है, वैसे ही वृक्ष भी पत्थर मारने वाले को बदले में मीठे फल देते हैं। यह प्रकृति की असीम उदारता को दर्शाता है।
प्रश्न 2: "एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।"
उत्तर: यह पंक्ति वहाँ के पंडों (पुजारियों) के संतोषी स्वभाव को दर्शाती है। इसका आशय है कि वे लालची नहीं हैं। उन्हें जो थोड़ा-बहुत (एक पैसा) भी मिल जाता है, वे उसी में संतुष्ट रहते हैं और उसे ही लाख रुपये के बराबर अनमोल मानते हैं।
5. प्रश्न-उत्तर (Subjective Q&A)
A. लघु उत्तरीय (Short Answer - 30-40 Words)
प्रश्न 1: लेखक ने हरिद्वार की भूमि को 'पुण्यभूमि' क्यों कहा है?
उत्तर: लेखक के अनुसार, हरिद्वार में प्रवेश करते ही मन शुद्ध हो जाता है। यहाँ का वातावरण इतना पवित्र है कि मन से बुरे विचार निकल जाते हैं और ज्ञान, वैराग्य व भक्ति का भाव जागृत होता है। इसलिए इसे पुण्यभूमि कहा गया है।
प्रश्न 2: गंगाजल की क्या विशेषताएँ बताई गई हैं?
उत्तर: गंगाजल अत्यंत शीतल, स्वच्छ, श्वेत और अमृत जैसा मीठा है। लेखक ने इसकी मिठास की तुलना 'चीनी के पने को बर्फ में जमाकर' किए गए शरबत से की है। इसका स्पर्श और वेग मन को पावन कर देता है।
प्रश्न 3: हरिद्वार में पक्षियों का व्यवहार कैसा है?
उत्तर: हरिद्वार में पक्षी बहुत निडर हैं। वे नगर के दुष्ट शिकारियों (बधिकों) के भय से मुक्त होकर पेड़ों पर चहचहाते हैं और कल्लोल (क्रीड़ा) करते हैं। यह दर्शाता है कि वहाँ जीव-जंतु भी सुरक्षित महसूस करते हैं।
प्रश्न 4: लेखक ने किस दृश्य को 'हरे गलीचे' जैसा बताया है?
उत्तर: वर्षा ऋतु के कारण हरिद्वार में चारों ओर हरियाली छाई हुई थी। यह हरी घास और वनस्पति ऐसी लग रही थी मानो यात्रियों के विश्राम के लिए धरती पर 'हरा गलीचा' (Carpet) बिछा दिया गया हो।
B. दीर्घ उत्तरीय/मूल्यपरक (Long/Value-Based - 100 Words)
प्रश्न 1: 'हरिद्वार' पाठ के आधार पर प्रकृति और मानव के संबंध पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: यह पाठ प्रकृति और मानव के गहरे और आत्मीय संबंधों को दर्शाता है। लेखक के लिए प्रकृति निर्जीव नहीं, बल्कि सजीव और मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण है।
प्रेरक: वृक्ष और लताएँ सज्जनता और परोपकार की शिक्षा देते हैं।
शांतिदाता: गंगा का तट और पर्वतों की हवा मन को शांति और वैराग्य देती है।
साथी: लेखक प्रकृति के बीच (पत्थर पर भोजन करके) जो सुख पाते हैं, वह भौतिक सुखों से श्रेष्ठ है। यह पाठ संदेश देता है कि प्रकृति के सानिध्य में ही मनुष्य को सच्ची खुशी और ईश्वर की अनुभूति होती है।
प्रश्न 2: पत्र विधा (Letter Format) की क्या विशेषताएँ इस पाठ में देखने को मिलती हैं? उदाहरण सहित लिखिए। उत्तर: यह पाठ एक पत्र के रूप में लिखा गया है, जिसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
संबोधन: पत्र की शुरुआत एक औपचारिक और आदरपूर्ण संबोधन से होती है- "श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!"
व्यक्तिगत अनुभव: इसमें लेखक ने अपने निजी अनुभवों और भावनाओं ("मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही...") का वर्णन किया है।
संवादात्मक शैली: लेखक पाठक (संपादक) से सीधे बात कर रहे हैं।
समापन: अंत में लेखक "आपका मित्र यात्री" लिखकर पत्र समाप्त करते हैं और पत्र छापने का निवेदन ("स्थानदान दीजिएगा") करते हैं।
6. व्याकरण (Integrated Grammar)
(Based on the text exercises)
प्रश्न 1: आदरार्थ बहुवचन (Honorific Plural) का प्रयोग करते हुए रिक्त स्थान भरिए:
डॉक्टर साहब बहुत विद्वान हैं।
मेरे पिता जी सो रहे हैं।
गंगा जी भारत की प्रमुख नदी हैं। (यहाँ गंगा जी को आदर देने के लिए 'हैं' का प्रयोग हुआ है)।
प्रश्न 2: काल (Tense) पहचानिए:
"यह भूमि तीन ओर पर्वतों से घिरी है।" - वर्तमान काल
"चित्त में भक्ति का उदय होता था।" - भूतकाल
"आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।" - भविष्यत काल
प्रश्न 3: तुलनात्मक वाक्यों को पहचानिए (Simile/Metaphor):
वृक्ष: तपस्या करते साधुओं जैसे।
लताएँ (वल्ली): सज्जनों के शुभ मनोरथों (इच्छाओं) जैसी।
गंगा की धारा: राजा भगीरथ की कीर्ति (यश) की लता जैसी।
गंगाजल: चीनी के पने (शरबत) जैसा मीठा।
7. सामान्य त्रुटियाँ (Common Student Errors)
नदी का नाम:
त्रुटि: छात्र अक्सर 'नीलधारा' को भूल जाते हैं।
सुधार: हरिद्वार में गंगा दो धाराओं में है- मुख्य गंगा और नीलधारा।
लेखक का नाम:
त्रुटि: छात्र लेखक का नाम गलत लिखते हैं।
सुधार: पाठ के लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं।
पत्र किसको लिखा:
त्रुटि: छात्र सोचते हैं मित्र को लिखा।
सुधार: यह पत्र 'कविवचन सुधा' पत्रिका के संपादक को लिखा गया था (जो उनके मित्रवत थे, पर पत्र संपादक के नाम था)।
End
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