6. मनःपूतं समाचरेत् - Manahputam Samacaret - Class 9 - Sharada
- Jun 11
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SECTION 1 — पाठ परिचय
विवरण | जानकारी |
पाठ का नाम: | मनःपूतं समाचरेत् (Manaḥpūtaṃ Samācaret) |
विधा: | पद्य पाठ — सुभाषितानि (नीतिश्लोकाः) |
स्रोत/ग्रंथ: | सङ्कलितः (मनुस्मृतिः, श्रीमद्भगवद्गीता, सुभाषितरत्नभाण्डागारः, नीतिशतकम्, पञ्चतन्त्रम्, मालविकाग्निमित्रम्, किरातार्जुनीयम्) |
लेखक/कवि: | अनेक कवयः (मनुः, व्यासः, भर्तृहरिः, विष्णुशर्मा, कालिदासः, भारविः) |
छन्दः: | विविधानि छन्दांसि (अनुष्टुप्, वसन्ततिलका, वंशस्थम् इत्यादयः) |
पाठ्यपुस्तक: | शारदा, NCERT कक्षा 9 संस्कृत, 2026-27 |
परीक्षा खंड: | खंड-घ (साहित्य) — 25-30 अंक |
SECTION 2 — स्रोत/कवि परिचय
SANSKRIT: अस्मिन् पाठे विविधेभ्यः प्राचीनग्रन्थेभ्यः सुभाषितानि सङ्कलितानि सन्ति। महर्षिणा मनुना विरचिता 'मनुस्मृतिः' धर्मशास्त्रीयग्रन्थः अस्ति। महर्षिव्यास-रचिता 'श्रीमद्भगवद्गीता' अद्वितीया ज्ञानोपदेशिका अस्ति। भर्तृहरेः 'नीतिशतकम्' नीतिसाहित्यस्य, विष्णुशर्मणः 'पञ्चतन्त्रं' कथासाहित्यस्य च अमूल्यं रत्नम् अस्ति। महाकवेः कालिदासस्य 'मालविकाग्निमित्रम्' रूपकम्, तथा च भारवेः 'किरातार्जुनीयम्' महाकाव्यम् अस्ति। एतानि सुभाषितानि वर्तमानसमये अपि अतीव उपयोगीनि सन्ति।
हिंदी अनुवाद: इस पाठ में विभिन्न प्राचीन संस्कृत ग्रंथों से सुभाषित (सुंदर वचन) संकलित किए गए हैं। महर्षि मनु द्वारा रचित 'मनुस्मृति' एक धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है। महर्षि व्यास द्वारा रचित 'श्रीमद्भगवद्गीता' एक अद्वितीय ज्ञान-उपदेश है। भर्तृहरि का 'नीतिशतक' नीति साहित्य का और विष्णुशर्मा का 'पंचतंत्र' कथा साहित्य का अनमोल रत्न है। महाकवि कालिदास का 'मालविकाग्निमित्रम्' एक नाटक है और भारवि का 'किरातार्जुनीयम्' एक महाकाव्य है। ये सुभाषित आज के समय में भी बहुत उपयोगी हैं।
English: This chapter is a compilation of Subhashitas (didactic verses) from various classical Sanskrit texts. It includes verses from the 'Manu Smriti' (a treatise on Dharma by Sage Manu), the 'Bhagavad Gita' (spiritual discourse by Sage Vyasa), Bhartrihari's 'Niti Shatakam', Vishnu Sharma's 'Panchatantra', Kalidasa's play 'Malavikagnimitram', and Bharavi's epic 'Kiratarjuniyam'. These timeless verses remain highly relevant today.
EXAM TIP: परीक्षा में स्रोत परिचय 5 अंकों के दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में पूछा जाता है। (Focus on matching the Shloka to its correct source text and author, as multiple texts are compiled here.)
SECTION 3 — मूल पाठ
श्लोकः १ दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् । सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥ १श्लोकः २ धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ २॥श्लोकः ३ यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ३॥श्लोकः ४ अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः। अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम् ॥ ४॥श्लोकः ५ प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः । विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥ ५ ॥श्लोकः ६ उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ॥ ६ ॥श्लोकः ७ पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ७॥श्लोकः ८ सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् । वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥ ८ ॥
SECTION 4 — श्लोकार्थ
श्लोकः १ (मनुस्मृतिः)
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् । सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥ १॥
PART A — अन्वयः: दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनःपूतं समाचरेत्। Hindi note: श्लोक के सभी पद स्वाभाविक गद्य क्रम में ही हैं, केवल क्रियाओं को अंत में रखा गया है।
PART B — शब्दार्थ:
संस्कृत पद | हिंदी अर्थ | English |
दृष्टिपूतम् | पवित्र दृष्टि से (देखकर) | Purified by sight |
न्यसेत् | रखना चाहिए | Should place |
वस्त्रपूतम् | कपड़े से छना हुआ | Purified by cloth |
सत्यपूताम् | सत्य से पवित्र | Purified by truth |
वाचं वदेत् | वाणी बोलनी चाहिए | Should speak words |
मनःपूतम् | मन से पवित्र | Purified by mind |
समाचरेत् | आचरण करना चाहिए | Should behave/act |
PART C — हिंदी भावार्थ: आँखों से अच्छी तरह देखकर ही (मार्ग पर) कदम रखना चाहिए, कपड़े से छानकर ही जल पीना चाहिए, सत्य से पवित्र करके (सोच-समझकर) ही बात बोलनी चाहिए, और मन से पवित्र (शुद्ध विचार वाला) आचरण ही करना चाहिए। यह श्लोक हमें जीवन के हर कार्य में पवित्रता और सावधानी बरतने की शिक्षा देता है।
PART D — English Meaning: One should step forward only after verifying the path with their eyes, drink water purified by a cloth, speak words purified by truth, and act with a conduct purified by the mind. The shloka teaches that thorough purity and carefulness must be applied to every daily action.
PART E — साहित्यिक विशेषता:
अलंकारः: अनुप्रासः ('पूत' शब्द की बार-बार आवृत्ति)।
रसः: शान्तरसः।
श्लोकः २ (मनुस्मृतिः)
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ २॥
PART A — अन्वयः: धृतिः क्षमा दमः अस्तेयं शौचम् इन्द्रियनिग्रहः धीः विद्या सत्यम् अक्रोधः [च इति] दशकं धर्मलक्षणं [भवति]। Hindi note: दस लक्षणों को क्रमानुसार रखकर 'भवति' क्रिया अध्याहृत की गई है।
PART B — शब्दार्थ:
संस्कृत पद | हिंदी अर्थ | English |
धृतिः | धैर्य | Patience |
दमः | मन पर नियंत्रण | Mental self-control |
अस्तेयम् | चोरी न करना | Non-stealing |
शौचम् | पवित्रता | Purity |
इन्द्रियनिग्रहः | इन्द्रियों को वश में रखना | Sensory restraint |
धीः | (सात्त्विक) बुद्धि | Wisdom / Intelligence |
अक्रोधः | क्रोध न करना | Absence of anger |
PART C — हिंदी भावार्थ: धैर्य, क्षमा, मन पर संयम, चोरी न करना, शरीर और मन की पवित्रता, इन्द्रियों पर नियंत्रण, सात्त्विक बुद्धि, विद्या, सत्य बोलना और क्रोध न करना—ये दस धर्म के लक्षण हैं। जो व्यक्ति इन दस गुणों को अपनाता है, वही वास्तव में धार्मिक है।
PART D — English Meaning: Patience, forgiveness, mental control, non-stealing, purity, sensory restraint, wisdom, true knowledge, truthfulness, and the absence of anger—these are the ten characteristics of Dharma. True righteousness lies in practicing these ten virtues in daily life.
PART E — साहित्यिक विशेषता:
अलंकारः: स्वभावोक्तिः।
रसः: शान्तरसः।
श्लोकः ३ (श्रीमद्भगवद्गीता)
यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ३॥
PART A — अन्वयः: श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतरः जनः तत् तत् एव [आचरति]। सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते। Hindi note: प्रथम पंक्ति में 'आचरति' क्रिया अध्याहृत है। क्रम सीधा रखा गया है।
PART B — शब्दार्थ:
संस्कृत पद | हिंदी अर्थ | English |
आचरति | व्यवहार करता है | Behaves / Acts |
श्रेष्ठः | महान् व्यक्ति / नेता | Great person / Leader |
इतरः जनः | अन्य (साधारण) लोग | Other/Common people |
प्रमाणम् | आदर्श / नियम | Standard / Ideal |
कुरुते | करता / स्थापित करता है | Sets / Establishes |
लोकः | संसार / समाज | The world / Society |
अनुवर्तते | अनुसरण करता है | Follows |
PART C — हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ (महान) व्यक्ति जैसा-जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग भी बिल्कुल वैसा ही आचरण करते हैं। वह महापुरुष जिस बात को प्रामाणिक (आदर्श) मानकर करता है, पूरी दुनिया उसी का अनुसरण करती है। इसलिए श्रेष्ठ लोगों का आचरण हमेशा आदर्श होना चाहिए।
PART D — English Meaning: Whatever a great person does, the common people follow exactly that. Whatever standard he sets, the entire world emulates it. It emphasizes the heavy responsibility of leaders to set the right moral example for society.
PART E — साहित्यिक विशेषता:
अलंकारः: दृष्टान्तः / यमकम् (यत्-यत्, तत्-तत्)।
रसः: शान्तरसः।
श्लोकः ४ (सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः। अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम् ॥ ४॥
PART A — अन्वयः: सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन [सिध्यन्ति]। सकलाः कलाः अभ्यासात् [सिध्यन्ति]। ध्यानमौनादि [अपि] अभ्यासात् [सिध्यति]। अभ्यासस्य दुष्करं किम् [अस्ति]? Hindi note: प्रत्येक वाक्यखण्ड में 'सिध्यन्ति' (सिद्ध होती हैं) क्रिया जोड़ी गई है।
PART B — शब्दार्थ:
संस्कृत पद | हिंदी अर्थ | English |
सर्वाः | सभी | All |
क्रियाः | कार्य / काम | Actions / Tasks |
सकलाः | सम्पूर्ण | Entire / All |
कलाः | कलाएं (गायन, वादन आदि) | Arts / Skills |
ध्यानमौनादि | ध्यान और मौन आदि | Meditation, silence, etc. |
दुष्करम् | कठिन / असंभव | Difficult / Impossible |
PART C — हिंदी भावार्थ: निरंतर अभ्यास करने से ही सभी कार्य सिद्ध (सफल) होते हैं। अभ्यास से ही मनुष्य सारी कलाओं में निपुण होता है। यहाँ तक कि ध्यान लगाना और मौन रहना जैसी कठिन साधनाएँ भी अभ्यास से ही सिद्ध होती हैं। अतः अभ्यास के लिए इस संसार में क्या कठिन है? (अर्थात् अभ्यास से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है)।
PART D — English Meaning: All actions are perfected through continuous practice. All arts and skills are mastered through practice. Even advanced spiritual disciplines like meditation and silence are achieved through practice. Is there anything too difficult to achieve through practice? (Nothing is impossible with practice).
PART E — साहित्यिक विशेषता:
अलंकारः: आक्षेपः / अनुप्रासः (अभ्यास शब्द की आवृत्ति)।
रसः: वीररसः (उत्साह)।
श्लोकः ५ (नीतिशतकम्)
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः । विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥ ५ ॥
PART A — अन्वयः: नीचैः विघ्नभयेन [कार्यं] न खलु प्रारभ्यते। मध्याः [कार्यं] प्रारभ्य विघ्नविहताः विरमन्ति। उत्तमजनाः [कार्यं] प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनः अपि प्रतिहन्यमानाः न परित्यजन्ति। Hindi note: तीन प्रकार के लोगों (नीच, मध्य, उत्तम) के अनुसार वाक्यों को तीन भागों में विभक्त किया गया है।
PART B — शब्दार्थ:
संस्कृत पद | हिंदी अर्थ | English |
नीचैः | निम्न कोटि के लोगों द्वारा | By lowly people |
विघ्नभयेन | बाधाओं के डर से | Due to fear of obstacles |
प्रारभ्यते | शुरू किया जाता है | Is started |
मध्याः | मध्यम कोटि के लोग | Mediocre people |
विघ्नविहताः | बाधाओं से घबराकर | Struck by obstacles |
विरमन्ति | रुक जाते हैं / छोड़ देते हैं | Stop / Quit |
प्रतिहन्यमानाः | रोके जाने पर / प्रहार होने पर भी | Being repeatedly struck |
उत्तमजनाः | श्रेष्ठ लोग | The best people |
न परित्यजन्ति | नहीं छोड़ते हैं | Do not give up |
PART C — हिंदी भावार्थ: निम्न श्रेणी के लोग रास्ते में आने वाली बाधाओं के डर से कोई नया काम शुरू ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के लोग काम शुरू तो करते हैं, लेकिन बाधाएँ आने पर घबराकर उसे बीच में ही रोक देते हैं। परन्तु उत्तम (श्रेष्ठ) श्रेणी के लोग काम शुरू करने के बाद, बार-बार बाधाएं आने पर भी उस काम को पूरा किए बिना नहीं छोड़ते।
PART D — English Meaning: Lowly people do not even initiate a task fearing future obstacles. Mediocre people start a task but quit halfway when struck by difficulties. However, the best of people, having started a task, never give it up even if they are repeatedly battered by obstacles until they succeed.
PART E — साहित्यिक विशेषता:
अलंकारः: यथासङ्ख्यम् / स्वभावोक्तिः।
रसः: वीररसः।
श्लोकः ६ (पञ्चतन्त्रम्)
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ॥ ६ ॥
PART A — अन्वयः: लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति, 'दैवेन देयम्' इति कापुरुषाः वदन्ति। दैवं निहत्य आत्मशक्त्या पौरुषं कुरु, यत्ने कृते यदि न सिध्यति, [तर्हि] अत्र कः दोषः? Hindi note: 'उपैति' क्रिया को मध्य में लाया गया है और श्लोक को सम्बोधन के रूप में अन्वित किया गया है।
PART B — शब्दार्थ:
संस्कृत पद | हिंदी अर्थ | English |
उद्योगिनम् | परिश्रमी को | To the industrious |
पुरुषसिंहम् | शेर के समान वीर पुरुष को | Lion-like brave man |
उपैति | प्राप्त होती है / पास आती है | Approaches |
दैवेन देयम् | भाग्य से मिलेगा | Fate will give |
कापुरुषाः | कायर लोग | Cowards |
निहत्य | छोड़कर / पराजित करके | Abandoning / Having crossed |
पौरुषम् | परिश्रम / पुरुषार्थ | Hard work / Human effort |
आत्मशक्त्या | अपनी शक्ति से | With one's own power |
PART C — हिंदी भावार्थ: धन-सम्पत्ति (लक्ष्मी) केवल परिश्रमी और सिंह के समान वीर पुरुष के पास ही आती है, 'भाग्य में होगा तो मिलेगा' ऐसा तो केवल कायर लोग कहते हैं। इसलिए भाग्य का भरोसा छोड़कर अपनी पूरी शक्ति से मेहनत (पुरुषार्थ) करो। यदि पूरी कोशिश करने पर भी सफलता न मिले, तो इसमें तुम्हारा क्या दोष है? (अर्थात् मनुष्य के हाथ में केवल कर्म है)।
PART D — English Meaning: Prosperity (Lakshmi) approaches only the industrious and lion-hearted man. Only cowards make excuses saying, 'Destiny will provide.' Abandon reliance on fate and exert human effort with all your strength. If you fail despite making an honest effort, what fault is there in you? The lesson is to prioritize hard work over fatalism.
PART E — साहित्यिक विशेषता:
अलंकारः: रूपकम् (पुरुषसिंहम्), अर्थान्तरन्यासः।
रसः: वीररसः।
श्लोकः ७ (मालविकाग्निमित्रम्)
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ७॥
PART A — अन्वयः: सर्वं पुराणम् इति एव साधु न [भवति], नवं काव्यम् इति च अपि अवद्यं न [भवति]। सन्तः परीक्ष्य अन्यतरत् भजन्ते, मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः [भवति]। Hindi note: 'भवति' क्रिया को जोड़कर अर्थ स्पष्ट किया गया है।
PART B — शब्दार्थ:
संस्कृत पद | हिंदी अर्थ | English |
पुराणम् | पुराना | Old / Ancient |
साधु | अच्छा / सही | Good / Right |
नवम् | नया | New |
अवद्यम् | बुरा / निन्दनीय | Bad / Blameworthy |
सन्तः | सज्जन / समझदार लोग | Wise men |
परीक्ष्य | परख कर / जाच कर | Having examined |
अन्यतरत् | दोनों में से किसी एक को | Either of the two |
परप्रत्ययनेयबुद्धिः | दूसरों के विचारों से चलने वाली बुद्धि | Mind led by others' opinions |
PART C — हिंदी भावार्थ: कोई भी चीज़ सिर्फ पुरानी होने के कारण अच्छी नहीं होती, और कोई नई कविता सिर्फ नई होने के कारण बुरी या निंदनीय नहीं होती। समझदार (सज्जन) लोग खुद परख कर दोनों में से जो बेहतर हो उसे अपनाते हैं, जबकि मूर्ख व्यक्ति वह होता है जिसकी बुद्धि हमेशा दूसरों के विचारों से निर्देशित होती है।
PART D — English Meaning: Not everything old is necessarily good, nor is a new literary work bad simply because it is new. Wise individuals critically examine both and adopt whichever is better, whereas a fool's mind is easily swayed and led by the beliefs and opinions of others.
PART E — साहित्यिक विशेषता:
अलंकारः: दृष्टान्तः / अर्थान्तरन्यासः।
रसः: शान्तरसः।
श्लोकः ८ (किरातार्जुनीयम्)
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् । वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥ ८ ॥
PART A — अन्वयः: सहसा क्रियां न विदधीत, अविवेकः परमापदां पदम् [अस्ति]। हि गुणलुब्धाः सम्पदः विमृश्यकारिणं स्वयमेव वृणते। Hindi note: अन्वय में कर्ता और कर्म को उचित स्थान पर रखा गया है।
PART B — शब्दार्थ:
संस्कृत पद | हिंदी अर्थ | English |
सहसा | अचानक / बिना सोचे | Hastily / Suddenly |
विदधीत | करना चाहिए | Should do/act |
क्रियां | कार्य को | Action |
अविवेकः | बिना विचारे काम करना | Thoughtlessness / Ignorance |
परमापदाम् | घोर विपत्तियों का | Of great disasters |
पदम् | स्थान / घर | Abode / Place |
विमृश्यकारिणम् | सोच-समझकर काम करने वाले को | One who acts thoughtfully |
गुणलुब्धाः | गुणों पर मुग्ध होने वाली | Attracted to merits |
वृणते | चुनती हैं | Choose |
PART C — हिंदी भावार्थ: मनुष्य को बिना सोचे-समझे अचानक कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि अज्ञानता (बिना विचारे काम करना) बड़ी-बड़ी विपत्तियों का घर है। जो व्यक्ति सोच-समझकर कार्य करता है, संपत्तियाँ (सफलताएँ) उसके अच्छे गुणों पर मुग्ध होकर स्वयं ही उसका वरण (चुनाव) कर लेती हैं।
PART D — English Meaning: One should not act hastily without prior thought, for lack of discrimination is the ultimate abode of great disasters. Indeed, prosperity and success, naturally attracted to good qualities, automatically choose the person who acts thoughtfully and deliberately.
PART E — साहित्यिक विशेषता:
अलंकारः: अर्थान्तरन्यासः।
रसः: शान्तरसः।
EXAM TIP: CBSE में 'श्लोकस्य अन्वयं पूरयत' और 'भावार्थं लिखत' — ये दोनों सर्वाधिक पूछे जाते हैं। (Anvaya completion and Bhavarth writing are the most frequently tested questions. Shloka 5 and 6 are prime targets for values-based questions.)
SECTION 8 — सारांश
HINDI: प्रस्तुत पाठ "मनःपूतं समाचरेत्" मनुस्मृति, भगवद्गीता, पञ्चतन्त्र आदि विभिन्न संस्कृत ग्रंथों का एक अद्वितीय सुभाषित-संग्रह है। यह पाठ हमें सिखाता है कि जीवन में सफलता और शांति के लिए पवित्र मन और श्रेष्ठ आचरण सबसे आवश्यक है। मनुष्य को हर कार्य—देखना, बोलना, जल पीना—पूरी पवित्रता से करना चाहिए। धर्म के दस लक्षणों (जैसे क्षमा, धैर्य, अक्रोध आदि) का पालन करना चाहिए, क्योंकि एक श्रेष्ठ व्यक्ति का ही समाज अनुसरण करता है। पाठ अभ्यास की अपार महिमा और परिश्रम (उद्यम) का महत्त्व बताता है कि उत्तम कोटि के लोग बाधाओं से नहीं डरते और सिंह के समान वीर पुरुष भाग्य पर नहीं, बल्कि अपने कर्म पर विश्वास करते हैं। इसके अतिरिक्त, बिना सोचे-समझे कोई काम नहीं करना चाहिए और हर पुरानी या नई वस्तु को अपनी बुद्धि से परख कर ही अपनाना चाहिए।
ENGLISH: The chapter "Manahputam Samacharet" is a profound collection of Subhashitas (didactic verses) compiled from classical texts like Manu Smriti, Panchatantra, and Bhagavad Gita. It teaches that a pure mind and noble conduct are essential for a successful life. One must act with complete purity in thought, speech, and sight. The verses outline the ten characteristics of Dharma and note that society emulates the standard set by great leaders. The text heavily emphasizes the power of relentless practice and hard work, asserting that the best individuals never quit despite severe obstacles. Furthermore, one should rely on one's own effort rather than fate, act thoughtfully instead of hastily, and evaluate everything critically with one's own intellect rather than blindly following others.
SECTION 9 — केंद्रीय भाव एवं मूल्य
9A. विषय-वस्तु सारणी
विषय | पाठ में स्पष्टीकरण |
मुख्य विषय | मन की पवित्रता, श्रेष्ठ आचरण, अभ्यास और उद्यम का महत्त्व। (Purity of mind, noble conduct, and the importance of practice and hard work.) |
नैतिक मार्गदर्शन | बिना विचारे काम न करना और दूसरों के अंधानुकरण से बचना। (Avoiding hasty actions and blind imitation.) |
प्रधान रस + स्थायी भाव | शान्तरसः (स्थायी भाव: निर्वेदः) तथा वीररसः (उत्साहः)। |
9B. मानवीय एवं सांस्कृतिक मूल्य
उद्यमः / परिश्रमः (कठोर परिश्रम / Hard work)
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः... दैवं निहत्य कुरु पौरुषम्।
भाग्य के भरोसे न बैठकर अपने कर्म और परिश्रम से लक्ष्य प्राप्त करने की शिक्षा मिलती है।
(Achieving goals through self-effort and perseverance rather than relying on fate.)
विवेकः (सोच-समझकर निर्णय लेना / Thoughtfulness)
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
यह श्लोक सिखाता है कि बिना सोचे-समझे कोई कार्य न करें, क्योंकि जल्दबाज़ी विपत्तियों का कारण बनती है।
(Acting carefully and thoughtfully to avoid disasters.)
धर्मनिष्ठा (धर्म का पालन / Righteousness)
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः... दशकं धर्मलक्षणम्।
धैर्य, क्षमा, सत्य और अक्रोध जैसे धर्म के दस लक्षणों को अपने दैनिक जीवन में उतारने की प्रेरणा मिलती है।
(Adopting the ten traits of Dharma like patience, truth, and forgiveness.)
EXAM TIP: मूल्यपरक प्रश्न 2-4 अंकों के लिए नियमित आते हैं। Always name the value in Sanskrit first (e.g., उद्यमः, विवेकः).
SECTION 11 — पद्यांश आधारित प्रश्न
पद्यांशः १
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः । विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥ ५ ॥
प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark): के विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभन्ते? (क) उत्तमजनाः (ख) नीचैः (ग) मध्याः (घ) शूराः उत्तरम्: (ख) हिंदी: नीच श्रेणी के लोग विघ्नों (बाधाओं) के डर से काम शुरू ही नहीं करते। English: Lowly people do not start a task fearing obstacles.
प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark): मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत — [ विरमन्ति / प्रतिहन्यमानाः / नीचैः ] विघ्नैः पुनः पुनरपि _______ प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति। उत्तरम्: प्रतिहन्यमानाः हिंदी: बार-बार विघ्नों द्वारा 'रोके जाने पर भी' (प्रतिहन्यमानाः) उत्तम लोग काम नहीं छोड़ते। English: Even if repeatedly 'struck' (pratihanyamanah) by obstacles, the best people don't quit.
प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark): 'परित्यजन्ति' इति पदस्य अर्थः अस्ति — (क) त्यजन्ति (छोड़ देते हैं) (ख) गृह्णन्ति (ग) पश्यन्ति (घ) धावन्ति उत्तरम्: (क) हिंदी: परित्यजन्ति का अर्थ है पूरी तरह से छोड़ देना या त्याग देना। English: Parityajanti means to completely give up or abandon.
प्र.(iv) — अलंकार पहचान (1 mark): 'अधोलिखितायां पङ्क्तौ कः अलंकारः अस्ति?' — विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः (क) अनुप्रासः (ख) उपमा (ग) रूपकम् (घ) यमकम् उत्तरम्: (क) हिंदी: 'प' वर्ण की निरंतर आवृत्ति (पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः) के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है। English: The repetition of the consonant 'p' qualifies this as Anuprasa Alankar.
पद्यांशः २
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् । वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥ ८ ॥
प्र.(i) — अर्थबोध (1 mark): सम्पदः कीदृशं जनं वृणते? (क) अविवेकिनम् (ख) विमृश्यकारिणम् (ग) सहसाकारिणम् (घ) कापुरुषम् उत्तरम्: (ख) हिंदी: संपत्तियाँ (सफलताएँ) केवल सोच-समझकर कार्य करने वाले (विमृश्यकारिणम्) को ही चुनती हैं। English: Prosperity chooses the person who acts thoughtfully (Vimrishyakarina).
प्र.(ii) — अन्वय पूर्तिः (1 mark): मञ्जूषातः पदं चित्वा अन्वयं पूरयत — [ पदम् / अविवेकः / सम्पदः ] सहसा क्रियां न विदधीत, _______ परमापदां पदम् [अस्ति]। उत्तरम्: अविवेकः हिंदी: बिना सोचे-समझे काम करना अर्थात् 'अज्ञानता' (अविवेकः) घोर विपत्तियों का घर है। English: Thoughtlessness (Avivekah) is the root cause of extreme disasters.
प्र.(iii) — शब्दार्थ (1 mark): 'आपदाम्' इति पदस्य अर्थः अस्ति — (क) विपत्तीनाम् (ख) सम्पत्तीनाम् (ग) नदीनाम् (घ) पर्वतानाम् उत्तरम्: (क) हिंदी: आपदाम् का अर्थ है 'मुसीबतों का' या 'विपत्तियों का'। English: Aapadam means of troubles or disasters.
प्र.(iv) — अलंकार पहचान (1 mark): 'अधोलिखितायां पङ्क्तौ कः अलंकारः अस्ति?' — सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् (क) उपमा (ख) अनुप्रासः (ग) रूपकम् (घ) दृष्टान्तः उत्तरम्: (ख) हिंदी: 'प' वर्ण की आवृत्ति (परमापदां पदम्) होने के कारण यहाँ अनुप्रास है। English: Repetition of the 'p' sound identifies it as Anuprasa Alankar.
SECTION 12 — लघु उत्तरीय प्रश्न (3 Marks)
प्र१. श्रेष्ठः जनः यत् आचरति तस्य कः प्रभावः भवति? मूल बिंदु 1 (VP1): इतरः जनः अपि तदेव आचरति (Other people do the same) मूल बिंदु 2 (VP2): लोकः तस्य प्रमाणम् अनुवर्तते (The world follows his standard)
उत्तरम्: श्रेष्ठः जनः यद्यत् आचरति, सामान्यः जनः अपि तदेव आचरति। सः महापुरुषः यत् प्रमाणं कुरुते, सम्पूर्णः लोकः तस्य एव अनुसरणम् अनुवर्तते वा। अतः श्रेष्ठजनस्य आचरणम् आदर्शरूपं भवति।
हिंदी अनुवाद: श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा-जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह महापुरुष जिस बात को प्रामाणिक मान लेता है, पूरी दुनिया उसी का अनुसरण करती है। अतः श्रेष्ठ लोगों का आचरण आदर्श होता है।
English: Whatever a great person does, the common people also do the same. Whatever standard that great person sets, the entire world follows it. Therefore, the conduct of noble people serves as an ideal for society.
प्र२. उत्तमजनाः कार्याणि कदा न परित्यजन्ति? मूल बिंदु 1 (VP1): कार्यं प्रारभ्य (After starting the work) मूल बिंदु 2 (VP2): विघ्नैः पुनः पुनः प्रतिहन्यमानाः अपि (Even if repeatedly struck by obstacles)
उत्तरम्: उत्तमजनाः (श्रेष्ठाः) एकवारं कार्यं प्रारभ्य तस्य मध्ये विघ्नैः पुनः पुनः प्रतिहन्यमानाः (बाधिताः) अपि तत् कार्यं न परित्यजन्ति। ते बाधाभ्यः न बिभ्यति।
हिंदी अनुवाद: उत्तम (श्रेष्ठ) श्रेणी के लोग एक बार काम शुरू करने के बाद, उसके बीच में बाधाओं द्वारा बार-बार रोके जाने (प्रहार किए जाने) पर भी उस काम को नहीं छोड़ते। वे रुकावटों से डरते नहीं हैं।
English: The best of people, having once started a task, do not give it up even if they are repeatedly battered by obstacles in the middle of it. They do not fear difficulties.
प्र३. लक्ष्मीः कीदृशं पुरुषम् उपैति, कापुरुषाः च किं वदन्ति? मूल बिंदु 1 (VP1): उद्योगिनं पुरुषसिंहं लक्ष्मीः उपैति (Wealth goes to the industrious lion-like man) मूल बिंदु 2 (VP2): 'दैवेन देयम्' इति कापुरुषाः वदन्ति ('Fate will give' is said by cowards)
उत्तरम्: लक्ष्मीः (सम्पत्तिः) केवलम् उद्योगिनं (परिश्रमशीलं) पुरुषसिंहम् एव उपैति। ये कापुरुषाः (कायरजनाः) भवन्ति, ते एव वदन्ति यत् 'दैवेन देयम्' अर्थात् भाग्येन एव सर्वं प्राप्यते इति।
हिंदी अनुवाद: धन-सम्पत्ति (लक्ष्मी) केवल परिश्रमी और सिंह के समान वीर पुरुष को ही प्राप्त होती है। जो कायर लोग होते हैं, वे ही कहते हैं कि 'भाग्य से मिलेगा' अर्थात् सब कुछ किस्मत से ही मिलता है।
English: Prosperity (Lakshmi) goes only to the industrious, lion-hearted man. It is only the cowards who say that 'Destiny will provide,' meaning everything is attained merely through fate.
प्र४. 'सहसा विदधीत न क्रियाम्' इत्यस्य कः भावः अस्ति? मूल बिंदु 1 (VP1): अविवेकः आपदां पदम् (Thoughtlessness is the root of disasters) मूल बिंदु 2 (VP2): विमृश्यकारिणं सम्पदः वृणते (Wealth chooses the thoughtful)
उत्तरम्: अस्य भावः अस्ति यत् मनुष्येण सहसा (अकस्मात्) विना विचारेण किमपि कार्यं न करणीयम्। अविवेकः महान्तीनां विपत्तीनां कारणं भवति। यः जनः विमृश्य (विचारपूर्वकं) कार्यं करोति, सम्पदः स्वयमेव तं वृणते।
हिंदी अनुवाद: इसका भाव यह है कि मनुष्य को अचानक बिना सोचे-समझे कोई काम नहीं करना चाहिए। बिना विचारे काम करना घोर विपत्तियों का कारण बनता है। जो व्यक्ति सोच-समझकर काम करता है, संपत्तियाँ खुद उसे चुन लेती हैं।
English: The meaning is that a person should not act hastily without thinking. Thoughtlessness is the cause of great disasters. Prosperity automatically chooses the person who acts thoughtfully and deliberately.
SECTION 13 — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 Marks)
प्र१. पाठस्य आधारेण धर्मस्य दश लक्षणानि कानि सन्ति? तेषां जीवने किम् महत्त्वम् अस्ति? मूल बिंदु 1 (VP1): धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम् (Patience, forgiveness, self-control, non-stealing) मूल बिंदु 2 (VP2): शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः (Purity, control of senses) मूल बिंदु 3 (VP3): धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः (Wisdom, knowledge, truth, absence of anger) मूल बिंदु 4 (VP4): एतेषां पालनेन जीवनस्य साफल्यम् (Success in life by following these)
उत्तरम्: मनुस्मृतौ धर्मस्य दश लक्षणानि वर्णितानि सन्ति। तानि सन्ति — धृतिः (धैर्यम्), क्षमा, दमः (मनसः नियन्त्रणम्), अस्तेयम् (चोरी न करणीयम्), शौचम् (पवित्रता), इन्द्रियनिग्रहः, धीः (बुद्धिः), विद्या, सत्यम्, अक्रोधः च। जीवने एतेषां दशानां लक्षणानां महती आवश्यकता अस्ति। यः जनः एतेषां पालनेन 'मनःपूतं समाचरेत्', सः समाजे श्रेष्ठः भवति। तस्य आचरणं दृष्ट्वा अन्ये जनाः अपि सन्मार्गम् अनुसरन्ति। एतैः मूल्यैः एव मानवजीवनं सार्थकं शान्तिपूर्णं च भवति।
हिंदी अनुवाद: मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं। वे हैं — धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रियों पर वश, सात्त्विक बुद्धि, विद्या, सत्य बोलना और क्रोध न करना। जीवन में इन दस लक्षणों की बहुत आवश्यकता है। जो व्यक्ति इनका पालन करके मन से पवित्र आचरण करता है, वह समाज में श्रेष्ठ बनता है। उसका आचरण देखकर अन्य लोग भी सही रास्ते पर चलते हैं। इन्हीं मूल्यों से मानव जीवन सार्थक और शांतिपूर्ण होता है।
English: Ten characteristics of Dharma are described in the Manu Smriti. They are — patience, forgiveness, mental control, non-stealing, purity, sensory restraint, wisdom, knowledge, truth, and absence of anger. These ten traits are highly necessary in life. A person who practices these and acts with a pure mind becomes great in society. Seeing his conduct, other people also follow the right path. Human life becomes meaningful and peaceful only through these values.
प्र२. 'पुराणमित्येव न साधु सर्वम्' इति श्लोकस्य आधारेण सतां मूढानां च बुद्धेः भेदं स्पष्टीकुरुत। मूल बिंदु 1 (VP1): पुराणम् नवम् इति कृत्वा निर्णयः न करणीयः (Don't judge just by old or new) मूल बिंदु 2 (VP2): सन्तः परीक्ष्य अन्यतरत् भजन्ते (Wise men examine and then choose) मूल बिंदु 3 (VP3): मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः भवति (Fools are led by others' opinions) मूल बिंदु 4 (VP4): स्वविवेकस्य उपयोगः आवश्यकः (Use of one's own discretion is essential)
उत्तरम्: महाकवेः कालिदासस्य श्लोकस्य आधारेण सतां मूढानां च बुद्धेः महान् भेदः अस्ति। केवलं पुराणम् (प्राचीनम्) अस्ति इति कारणेन सर्वं श्रेष्ठं न भवति, तथैव नवम् (नूतनम्) अस्ति इति कारणेन किमपि अवद्यं (निन्दनीयं) न भवति। ये सन्तः (सज्जनाः) भवन्ति, ते स्वबुद्ध्या पुराणस्य नवस्य च परीक्षणं कुर्वन्ति, ततः यत् उत्तमं तत् भजन्ते। परन्तु मूढः (मूर्खः) जनः 'परप्रत्ययनेयबुद्धिः' भवति, अर्थात् सः अन्येषां विचारेण एव चालितः भवति। अतः मनुष्येण सर्वदा अन्धभक्तिं त्यक्त्वा स्वविवेकस्य उपयोगः करणीयः।
हिंदी अनुवाद: महाकवि कालिदास के श्लोक के आधार पर सज्जनों और मूर्खों की बुद्धि में बहुत बड़ा अंतर है। केवल पुरानी होने के कारण हर चीज़ श्रेष्ठ नहीं होती, और नई होने के कारण कोई चीज़ निंदनीय (बुरी) नहीं होती। जो सज्जन (समझदार) लोग होते हैं, वे अपनी बुद्धि से पुरानी और नई चीज़ों को परखते हैं, और फिर जो बेहतर हो उसे अपनाते हैं। लेकिन मूर्ख व्यक्ति 'परप्रत्ययनेयबुद्धि' होता है, अर्थात् वह दूसरों के विचारों के पीछे-पीछे चलता है। इसलिए मनुष्य को हमेशा अंधभक्ति छोड़कर अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।
English: Based on the verse by the great poet Kalidasa, there is a huge difference between the intellect of the wise and the foolish. Not everything is great just because it is old, nor is anything blameworthy just because it is new. Wise men examine both the old and the new with their own intellect, and then adopt whichever is better. However, a fool has a mind led by others, meaning he is driven entirely by the opinions of other people. Therefore, a person should always abandon blind faith and use their own discretion.
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