11. तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र - (Teesri Kasam Ke Shilpkar Shailendra) - Class 10 - Sparsh Bhag 2
- Dec 8, 2025
- 10 min read
Updated: Dec 13, 2025

तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र (Teesri Kasam Ke Shilpkar Shailendra)
Class 10 - Hindi Course B (Sparsh Bhag 2) |
Author: प्रहलाद अग्रवाल (Prahlad Aggarwal)
1. पाठ का सार (Quick Revision Summary)
तीसरी कसम - एक काव्यात्मक फिल्म: 'तीसरी कसम' महान गीतकार शैलेंद्र द्वारा निर्मित पहली और आखिरी फिल्म थी। यह फणीश्वरनाथ रेणु की अमर कहानी 'मारे गए गुलफाम' पर आधारित थी। इसे फिल्म नहीं बल्कि 'सेल्युलाइड पर लिखी कविता' कहा जाता है।
English: Teesri Kasam - A Poetic Film: 'Teesri Kasam' was the first and last film produced by the great lyricist Shailendra. It was based on Phanishwarnath Renu's immortal story 'Mare Gaye Gulfam'. It is called a 'poem written on celluloid' rather than just a film.
शैलेंद्र की संवेदनशीलता: शैलेंद्र एक संवेदनशील कवि थे, न कि एक चतुर फिल्म निर्माता। उन्हें यश और धन की कामना नहीं थी, बल्कि वे आत्म-संतुष्टि चाहते थे। उन्होंने फिल्म में कोई समझौता नहीं किया और साहित्य के साथ पूरा न्याय किया।
English: Shailendra's Sensitivity: Shailendra was a sensitive poet, not a shrewd film producer. He did not desire fame and wealth but wanted self-satisfaction. He made no compromises in the film and did full justice to the literature.
राजकपूर का अभिनय: इस फिल्म में राजकपूर ने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया। वे एशिया के सबसे बड़े शोमैन थे, फिर भी उन्होंने एक भोले-भाले, देहाती गाड़ीवान 'हीरामन' के किरदार को इतनी शिद्दत से निभाया कि वे खुद हीरामन बन गए।
English: Raj Kapoor's Acting: Raj Kapoor delivered the best performance of his life in this film. Despite being Asia's greatest showman, he played the role of a naive, rustic cart-driver 'Hiraman' with such intensity that he became Hiraman himself.
व्यावसायिक असफलता लेकिन कलात्मक सफलता: फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बहुत सफल नहीं रही और इसे वितरक (Distributors) भी मुश्किल से मिले क्योंकि इसमें मसाला और उथलापन नहीं था। लेकिन इसे 'राष्ट्रपति स्वर्णपदक' मिला और मास्को फिल्म फेस्टिवल में भी सराहा गया।
English: Commercial Failure but Artistic Success: The film was not very successful at the box office and struggled to find distributors because it lacked masala and shallowness. However, it won the 'President's Gold Medal' and was appreciated at the Moscow Film Festival.
लोक तत्व और यथार्थ: फिल्म में लोक गीतों और ग्रामीण जीवन का सजीव चित्रण था। इसमें दुख को ग्लोरीफाई (महिमामंडित) नहीं किया गया, बल्कि जीवन के एक हिस्से के रूप में दिखाया गया। हीरामन और हीराबाई का मूक प्रेम और संवाद दर्शकों के दिल को छू लेता है।
English: Folk Elements and Reality: The film had a vivid depiction of folk songs and rural life. Sorrow was not glorified but shown as a part of life. The silent love and dialogue between Hiraman and Hirabai touch the audience's hearts.
शैलेंद्र और राजकपूर की दोस्ती: राजकपूर ने शैलेंद्र से दोस्ती के नाते फिल्म में काम करने के लिए केवल एक रुपया शगुन के तौर पर लिया। उन्होंने शैलेंद्र को फिल्म निर्माण के खतरों से आगाह भी किया था, लेकिन शैलेंद्र ने अपनी आदर्शवादी सोच के कारण फिल्म बनाई।
English: Shailendra and Raj Kapoor's Friendship: Raj Kapoor took only one rupee as a token for working in the film for the sake of friendship. He had warned Shailendra about the dangers of film production, but Shailendra made the film due to his idealistic thinking.
2. शब्द-संपदा (Vocabulary)
शब्द (Word) | अर्थ (Hindi Meaning) | English Meaning |
सैल्यूलाइड | फिल्म रील / कैमरा रील | Celluloid (Film Reel) |
शिद्दत | तीव्रता / पूरी लगन | Intensity / Passion |
याराना | दोस्ती / मित्रता | Friendship |
नावाकिफ | अनजान / अपरिचित | Unaware / Unfamiliar |
बमुश्किल | मुश्किल से / कठिनाई से | With difficulty |
ग्लोरीफाई | महिमामंडित करना / बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना | Glorify |
त्रासद | दुखद | Tragic |
खालिस | शुद्ध / मिलावट रहित | Pure |
भुच्च | गंवार / सीधा-सादा | Rustic / Naive |
किंवदंती | प्रचलित कथा / जनश्रुति | Legend |
उकडू | घुटने मोड़कर बैठना | Squatting |
अभिव्यक्ति | प्रकट करना | Expression |
3. चरित्र चित्रण (Character Sketches)
शैलेंद्र (Shailendra)
आदर्शवादी कवि और निर्माता (Idealist Poet & Producer): शैलेंद्र दिल से एक कवि थे। उन्होंने फिल्म निर्माण में व्यावसायिकता (Business) को हावी नहीं होने दिया। उनका उद्देश्य पैसा कमाना नहीं, बल्कि दर्शकों की रुचियों का परिष्कार करना और साहित्य को पर्दे पर उतारना था।
English: Shailendra was a poet at heart. He did not let commercialism dominate film production. His aim was not to make money but to refine the audience's tastes and bring literature to the screen.
संवेदनशील और दृढ़ (Sensitive & Firm): वे भावनाओं को महत्व देते थे। संगीतकार जयकिशन के कहने पर भी उन्होंने अपने गीत की पंक्ति नहीं बदली क्योंकि वे 'उथलेपन' के खिलाफ थे। वे जीवन के दुख में भी संघर्ष और उम्मीद का संदेश देते थे।
English: He valued emotions. He refused to change a line in his song even when composer Jaikishan asked, because he was against 'shallowness'. He gave a message of struggle and hope even in life's sorrows.
राजकपूर (Raj Kapoor)
समर्पित कलाकार और सच्चा दोस्त (Dedicated Artist & True Friend): राजकपूर ने दोस्ती की खातिर बिना फीस (सिर्फ 1 रुपया) लिए काम किया। एक बड़े स्टार होने के बावजूद उन्होंने हीरामन के किरदार में खुद को पूरी तरह ढाल लिया और अपनी स्टार छवि को आड़े नहीं आने दिया।
English: Raj Kapoor worked without a fee (taking only 1 rupee) for the sake of friendship. Despite being a big star, he completely molded himself into the character of Hiraman and did not let his star image get in the way.
हीरामन (Hiraman - Character): फिल्म में उनका किरदार एक भोले, देहाती गाड़ीवान का है जो केवल दिल की भाषा समझता है। वह हीराबाई पर जान छिड़कता है और उसकी मासूमियत दर्शकों को मोह लेती है।
English: His character in the film is that of a naive, rustic cart-driver who only understands the language of the heart. He dotes on Hirabai, and his innocence captivates the audience.
4. योग्यता-आधारित प्रश्न (Competency-Based Questions)
A. अभिकथन और तर्क (Assertion & Reasoning)
प्रश्न 1:
अभिकथन (A): 'तीसरी कसम' फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ी व्यावसायिक सफलता मिली।
तर्क (R): फिल्म में राजकपूर जैसे सुपरस्टार थे और शंकर-जयकिशन का संगीत था, जो दर्शकों को बहुत पसंद था।
उत्तर: (घ) A गलत है, R सही है। (फिल्म में स्टार और संगीत होने के बावजूद उसे व्यावसायिक सफलता नहीं मिली क्योंकि उसकी संवेदना आम वितरकों की समझ से परे थी)।
प्रश्न 2:
अभिकथन (A): शैलेंद्र ने 'तीसरी कसम' में साहित्य के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया।
तर्क (R): उन्होंने कहानी की मूल आत्मा, संवेदना और बारीक से बारीक घटनाओं को ज्यों का त्यों पर्दे पर उतारा, बिना किसी फिल्मी मसाले के।
उत्तर: (क) A और R दोनों सही हैं, तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
B. स्थिति-आधारित विश्लेषण (Situation Analysis)
स्थिति (Situation): आज कल कई फिल्में केवल पैसे कमाने के लिए बनाई जाती हैं, जिनमें कहानी का कोई सिर-पैर नहीं होता।
प्रश्न (Question): शैलेंद्र के व्यक्तित्व के आधार पर बताइए कि वे ऐसी फिल्मों के बारे में क्या सोचते?
उत्तर (Answer): शैलेंद्र ऐसी फिल्मों के सख्त खिलाफ होते। उनका मानना था कि कलाकार का कर्तव्य दर्शकों की रुचियों को सुधारना (परिष्कार करना) है, न कि उनके सामने उथलापन परोसना। वे फिल्म को कला और संदेश का माध्यम मानते थे, न कि केवल धन कमाने का जरिया।
स्थिति (Situation): आपका मित्र किसी प्रोजेक्ट में इसलिए हिस्सा नहीं लेना चाहता क्योंकि उसमें पैसे कम मिल रहे हैं, जबकि वह प्रोजेक्ट समाज के लिए बहुत अच्छा है।
प्रश्न (Question): राजकपूर द्वारा 'तीसरी कसम' में किए गए कार्य का उदाहरण देकर आप उसे कैसे समझाएंगे?
उत्तर (Answer): मैं उसे राजकपूर का उदाहरण दूंगा जिन्होंने अपने दोस्त शैलेंद्र की फिल्म में काम करने के लिए फीस नहीं ली, बल्कि सिर्फ 1 रुपया शगुन लिया। उन्होंने पैसे से ज्यादा दोस्ती और एक अच्छी कलात्मक फिल्म (प्रोजेक्ट) को महत्व दिया। कभी-कभी आत्म-संतुष्टि और अच्छे काम का मूल्य पैसे से ज्यादा होता है।
C. आशय स्पष्टीकरण (Intent/Inference)
प्रश्न 1: "वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।"
उत्तर: लेखक का आशय है कि शैलेंद्र एक व्यावहारिक दुनियादार व्यक्ति नहीं थे। फिल्म बनाते समय उनका ध्यान मुनाफा कमाने या शोहरत पाने पर नहीं था। वे तो अपनी रचनात्मकता को पर्दे पर उतारकर अपनी आत्मा को संतुष्ट करना चाहते थे, चाहे उसमें आर्थिक नुकसान ही क्यों न हो।
प्रश्न 2: "व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।"
उत्तर: शैलेंद्र के गीतों और जीवन दर्शन का यह निचोड़ है। उनके अनुसार, दुख या पीड़ा मनुष्य को हराने के लिए नहीं आती, बल्कि उसे संघर्ष करने और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उनके गीतों में करुणा के साथ-साथ जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण (जूझने का संकेत) भी मिलता है।
5. प्रश्न-उत्तर (Subjective Q&A)
A. लघु उत्तरीय (Short Answer - 30-40 Words)
प्रश्न 1: 'तीसरी कसम' फिल्म को 'सेल्युलाइड पर लिखी कविता' क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि यह फिल्म सामान्य फिल्मों की तरह नहीं थी। इसमें एक कवि (शैलेंद्र) की संवेदना, भावनाओं की गहराई और चित्रात्मकता थी। यह रील पर उतरी हुई एक भावपूर्ण कविता जैसी थी जो दर्शकों के दिलों को छू लेती थी।
प्रश्न 2: फिल्म 'तीसरी कसम' को वितरक (Distributors) क्यों नहीं मिल रहे थे?
उत्तर: वितरक केवल मुनाफा देखते हैं। 'तीसरी कसम' में न तो कोई भड़काऊ मसाला था, न ही वह व्यापारिक फार्मूले पर बनी थी। उसकी संवेदना और करुणा वितरकों की 'दो से चार बनाने' (मुनाफा कमाने) की समझ से परे थी।
प्रश्न 3: राजकपूर ने शैलेंद्र को फिल्म निर्माण के खतरों से आगाह क्यों किया?
उत्तर: राजकपूर फिल्म जगत के दांव-पेच और जोखिमों से परिचित थे। वे जानते थे कि शैलेंद्र एक भावुक कवि हैं और उनमें व्यावसायिक सूझबूझ की कमी है। एक सच्चे मित्र होने के नाते उन्होंने शैलेंद्र को असफलता के प्रति सचेत किया।
प्रश्न 4: शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं - इसका क्या अर्थ है?
उत्तर: राजकपूर अपनी आँखों और अभिनय से जो भावनाएँ व्यक्त करते थे, शैलेंद्र अपने गीतों के माध्यम से उन भावनाओं को शब्दों में पिरो देते थे। दोनों की कला एक-दूसरे की पूरक थी।
प्रश्न 5: फिल्म में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफ़ाई क्यों नहीं किया गया?
उत्तर: अक्सर फिल्मों में दर्शकों की सहानुभूति बटोरने के लिए दुख को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर और वीभत्स रूप में दिखाया जाता है। लेकिन 'तीसरी कसम' में दुख को जीवन के एक सहज और स्वाभाविक हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया गया, जो यथार्थ (Reality) के करीब था।
प्रश्न 6: "तीसरी कसम" में राजकपूर के अभिनय की क्या विशेषता थी?
उत्तर: इस फिल्म में राजकपूर ने 'अभिनय' नहीं किया, बल्कि वे किरदार में पूरी तरह ढल गए। उन्होंने अपनी स्टार छवि छोड़कर एक देहाती गाड़ीवान हीरामन की मासूमियत और भोलेपन को जीवंत कर दिया। यह उनके अभिनय का चर्मोत्कर्ष था।
प्रश्न 7: शैलेंद्र ने गीत "रातों दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ" में बदलाव क्यों नहीं किया?
उत्तर: संगीतकार जयकिशन का मानना था कि दर्शक 'दस दिशाएँ' नहीं समझेंगे। लेकिन शैलेंद्र का मानना था कि दर्शकों को उथला साहित्य नहीं देना चाहिए। वे दर्शकों की रुचि को परिष्कृत करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने साहित्यिक स्तर से समझौता नहीं किया।
प्रश्न 8: हीरामन और हीराबाई के प्रेम को मूक भाषा में कैसे व्यक्त किया गया?
उत्तर: हीरामन और हीराबाई का प्रेम संवादों से ज्यादा आँखों और मौन से व्यक्त हुआ। जब हीरामन पूछता है "मन समझती हैं न आप?", तो हीराबाई जुबान से नहीं बल्कि अपनी आँखों से जवाब देती है। यह फिल्म सूक्ष्म भावनाओं और मौन की भाषा का अद्भुत उदाहरण थी।
B. दीर्घ उत्तरीय/मूल्यपरक (Long/Value-Based - 100 Words)
प्रश्न 1: शैलेंद्र एक 'कवि हृदय' फिल्म निर्माता थे। 'तीसरी कसम' फिल्म के निर्माण के संदर्भ में इस कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
उत्तर: शैलेंद्र मूलतः एक संवेदनशील कवि थे। जब उन्होंने 'तीसरी कसम' बनाई, तो उन्होंने बाजार के नियमों की परवाह नहीं की। उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी की मूल आत्मा को बचाए रखा। उन्होंने फिल्म में सस्ता मनोरंजन डालने के बजाय लोक-तत्वों, मानवीय संवेदनाओं और जीवन के यथार्थ को प्रमुखता दी। फिल्म में दुख और प्रेम का चित्रण इतना गहरा और कलात्मक था कि वह केवल एक सच्चा कवि ही कर सकता था। उन्हें पैसे से ज्यादा आत्म-संतुष्टि प्यारी थी। फिल्म की कलात्मक सफलता और व्यावसायिक असफलता दोनों ही यह सिद्ध करती हैं कि वे एक 'कवि हृदय' निर्माता थे, व्यापारी नहीं।
प्रश्न 2: "कलाकार का कर्तव्य है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करे।" आज के सिनेमा और मीडिया के संदर्भ में इस कथन पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर: शैलेंद्र का यह विचार आज के दौर में अत्यंत प्रासंगिक है। आज अधिकांश फिल्मकार और मीडिया वाले "जनता यही चाहती है" के नाम पर हिंसा, अश्लीलता और उथलापन परोसते हैं। वे दर्शकों की रुचि को गिरते स्तर पर ही रखना चाहते हैं ताकि उनका मुनाफा हो। लेकिन सच्चा कलाकार वही है जो समाज को ऊपर उठाए, न कि नीचे गिराए। उसे दर्शकों को बेहतर, सार्थक और विचारशील सामग्री देनी चाहिए ताकि उनकी सोच और समझ (रुचि) का स्तर सुधरे (परिष्कार हो)। यदि शैलेंद्र जैसे निर्माता आज होते, तो शायद सिनेमा समाज को दिशा देने का काम करता, न कि केवल मनोरंजन का।
प्रश्न 3: 'तीसरी कसम' फिल्म भारतीय ग्रामीण जीवन और लोक-संस्कृति का दर्पण है। पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 'तीसरी कसम' हिंदी सिनेमा की उन चुनिंदा फिल्मों में से है जिसमें भारतीय गाँव की मिट्टी की खुशबू है। फिल्म में नौटंकी, गाड़ीवान, मेलों और लोकगीतों का सजीव चित्रण है। "चलत मुसाफिर मोह लियो रे" और "सजनवा बैरी हो गए हमार" जैसे गीत लोक-धुनों पर आधारित हैं। गाड़ीवानों की आपसी बातचीत, हीराबाई की पालकी के पीछे दौड़ते बच्चों का हुजूम, और हीरामन का भोलापन - यह सब ग्रामीण भारत की असली तस्वीर पेश करते हैं। फिल्म में कोई बनावटीपन नहीं है, बल्कि जीवन का सहज और स्वाभाविक रूप है, जो इसे लोक-संस्कृति का सच्चा दस्तावेज बनाता है।
6. व्याकरण (Integrated Grammar)
(Based on Class 10 Hindi Course B - Sparsh Pattern)
प्रश्न 1: पदबंध पहचानिए: "छींट की सस्ती साड़ी में लिपटी हीराबाई ने अभिनय की ऊँचाइयों को छू लिया।" (रेखांकित: छींट की सस्ती साड़ी में लिपटी)
उत्तर: विशेषण पदबंध (यह हीराबाई की विशेषता बता रहा है)।
प्रश्न 2: समास विग्रह और भेद बताइए: "आत्म-संतुष्टि"
उत्तर: आत्मा की संतुष्टि - तत्पुरुष समास (संबंध तत्पुरुष)।
प्रश्न 3: मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग: "चक्कर खा जाना"
उत्तर: अर्थ: भ्रमित होना / समझ न पाना / हैरान होना।
वाक्य: शैलेंद्र की आदर्शवादी बातें सुनकर बड़े-बड़े व्यावसायिक निर्माता भी चक्कर खा जाते थे।
प्रश्न 4: संधि विच्छेद कीजिए: "सर्वोत्कृष्ट"
उत्तर: सर्व + उत्कृष्ट (गुण संधि)।
7. सामान्य त्रुटियाँ (Common Student Errors)
फिल्म की सफलता/असफलता:
त्रुटि: छात्र लिखते हैं कि फिल्म पूरी तरह फ्लॉप थी।
सुधार: फिल्म व्यावसायिक रूप से (पैसे कमाने में) असफल थी, लेकिन कलात्मक रूप से (पुरस्कार और प्रशंसा में) बेहद सफल थी। उसे राष्ट्रपति स्वर्णपदक मिला था।
कहानी का लेखक:
त्रुटि: छात्र कहानी का लेखक शैलेंद्र को मान लेते हैं।
सुधार: मूल कहानी फणीश्वरनाथ रेणु की है ('मारे गए गुलफाम')। शैलेंद्र फिल्म के निर्माता (Producer) थे।
राजकपूर की भूमिका:
त्रुटि: छात्र राजकपूर को फिल्म का निर्देशक (Director) बताते हैं।
सुधार: राजकपूर फिल्म के मुख्य अभिनेता (Actor) थे। फिल्म के निर्माता शैलेंद्र थे।
End
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